बॉलीवुड में हिन्दुत्व फ्लॉप क्यों?

- Author, शकील अख़्तर
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
भारत के रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने पिछले दिनों एक समारोह में अपने समर्थकों से कहा कि जो भी 'देश' के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाए उसे बिल्कुल उसी तरह सबक़ सिखाने की ज़रूरत है जिस तरह उन्होंने देश के एक प्रसिद्ध अभिनेता को सिखाया.
हालांकि उन्होंने आमिर ख़ान का नाम नहीं लिया था लेकिन उनका इशारा आमिर की ही तरफ़ था.
कुछ महीने पहले आमिर ख़ान ने देश के हालात पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा था कि भाजपा के सत्ता में आने के बाद देश में असहिष्णुता इतनी बढ़ गई है कि उनकी पत्नी ने घबरा कर पूछा था कि क्या उन्हें देश छोड़ना पड़ सकता है.
आमिर के इस बयान के बाद देश में गंभीर प्रतिक्रिया हुई थी. विशेष रूप से भाजपा ने उनके बयान की कड़ी आलोचना की थी और कट्टरपंथी हिंदू संगठनों ने उनके बहिष्कार का अभियान चला रखा है.
आमिर के ख़िलाफ़ इन संगठनों का अभियान इतना व्यवस्थित और प्रभावी था कि एक ई-कॉमर्स कंपनी को अपने विज्ञापनों से आमिर को हटाना पड़ा.

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पर्रिकर का कहना था, "उनके लोगों ने ही कंपनी को नुक़सान पहुंचाया है."
बॉलीवुड कला और संस्कृति का महत्वपूर्ण केंद्र है. हालांकि ज़्यादातर हिंदी फ़िल्में शुद्ध मनोरंजक प्रकृति की होती हैं लेकिन इन फ़िल्मों में अमूमन हमेशा सकारात्मक संदेश दिए जाते रहे हैं.
देश के हालात जैसे भी रहे हों हिंदी फ़िल्मों ने भारत की मिली जुली सभ्यता और संस्कृति और विशेषकर धर्मनिरपेक्ष मूल्यों का प्रतिनिधित्व किया है. बॉलीवुड एक संस्था के तौर पर एक आदर्श सेक्यूलर इंस्टिट्यूशन है. यह हमेशा संकीर्ण अवधारणाओं के ख़िलाफ़ रहा है.
लेकिन बॉलीवुड एक लंबे अरसे से उदार और राष्ट्रवादी विचारों के टकराव की चपेट में भी है. विशेष रूप से फ़िल्म जगत के तीन प्रमुख अदाकार शाहरुख़ ख़ान, आमिर ख़ान और सलमान ख़ान अक्सर राष्ट्रवादी राजनीति का शिकार बने हैं.

एक बिंदु पर पूरी फ़िल्म बिरादरी उदारवादी और राष्ट्रवादियों के बीच विभाजित होती हुई नज़र आ गई थी. लेकिन यह पहला अवसर है कि जब देश के कई हिंदू संगठनों ने एक अभिनेता के ख़िलाफ़ उसके विचारों के लिए आर्थिक बहिष्कार का एक संगठित अभियान चला रखा है.
अगर रक्षा मंत्री के सबक़ सिखाने के बयान पर विश्वास करें तो यह आंदोलन ज़ाहिर है उनकी पार्टी के इशारे ही चलाया जा रहा है. उनसे पहले भाजपा के एक सांसद आदित्यनाथ ने आमिर और शाहरुख़ का ज़िक्र करते हुए कहा था कि उन्हें हिंदुओं ने शोहरत और दौलत दी है और वे अब उन्हें धूल चटाएंगे.
इन कलाकारों के ख़िलाफ़ नफ़रत और बहिष्कार का अभियान अब तक पूरी तरह नाकाम होता हुआ नज़र आ रहा है.

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बॉलीवुड की कई फ़िल्में इस टकराव और तनाव के मुश्किल दौर में रिलीज़ हुई हैं. इन सभी में सकारात्मक संदेश दिए गए हैं और वे सभी फ़िल्में ख़ूब लोकप्रिय हुई हैं. सलमान ख़ान के एक विवादास्पद और ग़ैर-ज़िम्मेदाराना बयान के बावजूद उनकी हाल में रिलीज़ होने वाली फ़िल्म 'सुल्तान' ने सफलता के पिछले सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए.
फ़िल्म की केंद्रीय भूमिका में सभी किरदार मुस्लिम दिखाए गए हैं.
लेकिन बॉलीवुड के मूल्यों की सबसे बड़ी परीक्षा क्रिसमस के वक़्त होगी जब आमिर ख़ान की फ़िल्म 'दंगल' रिलीज़ होगी. आमिर के ख़िलाफ़ सोशल मीडिया पर बहिष्कार अभियान पूरे ज़ोरों पर है. फ़िल्म रिलीज़ होने का समय जैसे-जैसे क़रीब आएगा यह अभियान और तेज़ होगा.

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मनोहर पर्रिकर और सभी दक्षिणपंथी संगठनों को यह अच्छी तरह मालूम है कि आमिर देश के दुश्मन नहीं हैं. उनकी यह मुहिम दरअसल विचारों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के ख़िलाफ़ है.
प्रेक्षकों का मनना है कि इस आंदोलन से यह संगठन उन विचारों और अवधारणाओं को दबाना चाहते हैं जो इनके दक्षिणपंथी संगठनों के हिंदू राष्ट्रवाद के विचारों से मेल नहीं रखतें.
फ़िल्में, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का एक शक्तिशाली माध्यम है. बॉलीवुड अपनी फ़िल्मों से सकारात्मक संदेश देता रहा है. आमिर के विचार से बहुत से लोग सहमत नहीं हैं, लेकिन वे इस बात से भी सहमत नहीं हैं कि आमिर को अपने विचारों की अभिव्यक्ति का अधिकार नहीं है.
आमिर की फ़िल्म 'दंगल' 'से यह पता चल सकेगा कि मनोहर पर्रिकर और उनके समर्थकों ने आमिर को असहिष्णुता की स्थिति पर चिंता व्यक्त करने के लिए वाक़ई सबक़ सिखा दिया है या अतीत की तरह इस बार भी संकीर्ण अवधारणाओं को बॉलीवुड से मुंह की खानी पड़ी है.
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