सऊदी अरब जाकर क्यों फंस जाते हैं मज़दूर?

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- Author, अशोक कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
तेल की दौलत से मालामाल सऊदी अरब दुनिया भर के लाखों कामगारों की मंज़िल रहा है, लेकिन आजकल वहां हज़ारों भारतीय मज़दूर फ़ाक़ाकशी को मजबूर हैं.
सऊदी अरब में लगभग दस हज़ार लोग बेरोगज़ार हो गए हैं और उन्हें महीनों से वेतन नहीं मिला है.
अब भारत सरकार से गुहार लगाने के सिवाय उनके पास कोई चारा नहीं है. भारत सरकार ने तत्परता दिखाई. इन लोगों तक खाना पहुंचाया और हर मदद का वादा भी किया.
लेकिन जिस देश में लाखों विदेशी कामगार काम करते हैं, उनके हित और अधिकारों की रक्षा करने की क्या ज़िम्मेदारी वहां की सरकार पर नहीं आती है?
मध्य पूर्व मामलों के जानकार और जेएनयू में प्रोफेसर कमाल पाशा कहते हैं, “वहां का लेबर मार्केट फ्री मार्केट कहा जाता है. आधिकारिक तौर पर सरकार इसमें शामिल नहीं है. ये काम कंपनियों को दिया गया है. मान लीजिए कोई कंपनी काम कर रही है तो उन्हें परमिट दिया जाता है कि वो इतने मज़दूर, प्लंबर, मिस्त्री या इलेक्ट्रिशियन वो ले कर आ सकते हैं.”
वो बताते हैं, “सरकार का काम सिर्फ़ वीज़ा मंज़ूर करना है, फिर कंपनी मज़दूरों से किस तरह का सलूक करती है, कितना वेतन देती है या फिर क्या करती है, इस बारे में सरकार कोई दख़ल नहीं देती है.”

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कहा तो यहां तक जाता है कि सऊदी अरब में सरकार वीज़ा नीलाम करती है और जो कंपनी सबसे ज़्यादा पैसा देती है, उसे बड़ी संख्या में वीज़ा दिए जाते हैं.
फिर यही कंपनियां भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, थाईलैंड या फ़िलीपींस जैसे देशों से अकसर एजेंटों के ज़रिए नौकरी पर लोगों को रखती हैं.
इनमें से कोई दूध पहुंचाता है, कोई अस्पतालों में सफ़ाई करता है, कोई कूड़ा उठाता है, कोई बढ़ई है, कोई प्लंबर और कोई नाई.
इन लोगों के भेजे पैसे से न सिर्फ़ उनका परिवार चलता है, उनके देश का खज़ाना भी भरता है. सऊदी अरब में रहने वाले भारतीय भारत को हर साल अरबों डॉलर की रक़म भेजते हैं.
भारतीयों मज़दूरों की मौजूदा समस्या को उनकी कंपनी की आर्थिक मुश्किलों से जोड़ कर देखा जा रहा है लेकिन सऊदी अरब में विदेशी कामगारों के शोषण के मामले तो अकसर सामने आते हैं.
कई साल तक सऊदी अरब में तैनात रहे पूर्व राजनयिक ज़िक्र उर रहमान कहते हैं, “उनके श्रम मंत्रालय के क़ानून सख़्त हैं. लेकिन जहां उनका क़ानून लागू नहीं होता, वहां वो दख़लंदाज़ी नहीं करते हैं.”
वो कहते हैं, “जहां तक शोषण की बात है तो इसके लिए भी उनके यहां क़ानून हैं लेकिन बहुत सारे लोगों को इन क़ानूनों के बारे में जानकारी नहीं होती है और वो सीधे दूतावासों में आ जाते हैं.”

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मानवाधिकार संगठन एम्नेस्टी इंटरनेशनल का कहना है कि बीते 25 साल में भारत से जितने लोग सऊदी अरब गए हैं, उतने किसी खाड़ी देश में नहीं गए हैं.
ऐसे में हज़ारों भारतीयों को अगर खाने के लाले पड़ जाएं तो क्या समझा जाए, अरब न्यूज के पूर्व संपादक और सऊदी विश्लेषक ख़ालेद अल-मैना कहते हैं कि इससे सऊदी अरब की 'प्रतिष्ठा को धक्का' लगता है.
वो कहते हैं, “मज़दूरों के साथ बहुत नाइंसाफ़ी हुई है. मज़दूर अपने पेट के लिए आते हैं, अपने परिवार और बच्चों को छोड़कर आते हैं. ऐसे में उन्हें वेतन तो समय पर मिलना चाहिए. लेकिन कोई सात महीने तो कोई आठ महीने से बैठा है और कोई उनकी मदद नहीं कर रहा है. इसके लिए हम सब ज़िम्मेदार हैं.”
सऊदी अरब में काम करने वाले भारतीयों की संख्या लगभग तीस लाख है. अगर अन्य देशों से वहां पहुंचे कामगारों को भी इसमें जोड़ दिया जाए तो तादाद 90 लाख के आसपास पहुंचती है.
विदेशी कामगारों के शोषण की कहानियां अंतरराष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियां बनती हैं. उन्हें जिस वेतन का वादा किया जाता है वो नहीं मिलता और वो भी देर से दिया जाता है. काम के हालात ठीक नहीं होते. यहां तक कि पासपोर्ट भी कंपनी रख लेती है. कर्मचारी तभी अपने देश जा सकता है जब कंपनी चाहेगी, भले ही कर्मचारी की जो मजबूरी हो.

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फिर भी सऊदी अरब ग़रीब मज़दूरों को लुभाता है.
प्रोफेसर कमाल पाशा कहते हैं, “भारत में कोई ड्राइवर पांच, छह या दस हज़ार रुपए में काम करता है तो वहां उसे 25 से 30 हज़ार रुपए आराम से मिलते हैं. वहां चूंकि खाने पीने का ख़र्च कम है, इसलिए कोई भी 10 से 15 हज़ार रुपए बचा लेता है और इसलिए वो लोग वहां जाते हैं.”
एशिया और अफ्रीका के देशों से बड़ी संख्या में लोग सऊदी अरब जाते हैं. इसीलिए शायद सऊदी अरब को ये चिंता करने की ज़रूरत ही नहीं है कि वहां काम करने वालों की कमी होगी. ऐसे में कम वेतन और कम सुविधाओं पर भी लोग आसानी से तैयार हो जाते हैं.
कम ख़र्च में ज़्यादा मुनाफ़ा कमाने वाला अर्थशास्त्र, कामगारों के शोषण की ज़मीन तैयार करता है. पूर्व राजनयिक ज़िक्र उर रहमान कहते हैं कि सऊदी अरब में ऐसे मामलों में सख़्त कार्रवाई होती है, बशर्ते मामला अधिकारियों या फिर भारतीय दूतावास तक पहुंचे.

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वो कहते हैं, “कोई भी बात अगर हमारे दूतावास या उनके मंत्रालय की जानकारी में आती है तो वहां उस पर सख़्त कार्रवाई होती है. बहुत सारे स्पॉन्सर्स को जेल होती है, उन पर जुर्माना लगता है और दंड लगाया जाता है. अगर ऐसा नहीं होता और मामला एकतरफ़ा होता है तो ये बताइए कि 30 लाख भारतीय वहां कैसे होते?”
लेकिन मानवाधिकार संगठन ह्यूमन राइट्स वॉच की 2014 की एक रिपोर्ट कहती है कि रोज़ी रोटी की तलाश में विदेश जाने वाले ये लोग अदालत और कहचरी जाने से घबराते हैं.
“उन्हें इस बात का डर सताता है कि अगर कंपनी के ख़िलाफ़ शिकायत लगाई तो उन पर कार्रवाई हो सकती है और यहां तक कि उनकी नौकरी भी जा सकती है.”
सऊदी अरब में सबसे बड़े धार्मिक नेता ग्रांड मुफ़्ती शेख़ अब्दुल अज़ीज़ अल शेख कह चुके हैं कि विदेशी कामगारों का शोषण पूरी तरह के ग़ैर इस्लामी है.
ये बात उन्होंने अब नहीं, 14 साल पहले 2002 में कही थी. लेकिन प्रोफ़ेसर कमाल पाशा कहते हैं कि सैद्धांतिक रुख़ अपनी जगह है लेकिन ज़मीनी हालात अलग ही हैं.
भारत सरकार हस्तक्षेप कर भले ही हजारों भारतीयों की मौजूदा समस्या को हल कर ले, लेकिन जब तक अपने घर में नौकरी के पर्याप्त मौके नहीं होंगे तब तक ग़रीबी और मुफ़लिसी में रहने वालों को सऊदी अरब जैसे खाड़ी देश अपनी तरफ़ खींचते रहेंगे.
और शायद लौट-लौट कर ऐसे संकट सामने आते रहेंगे.
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