अफ़्रीकियों पर हमले क्यों होते हैं?

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- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
दिल्ली के साकेत इलाक़े में सैकड़ों अफ़्रीकी रहते हैं. इनमें से एक अफ़्रीकी पहले मुंबई में रहा करते थे जहाँ उनसे मेरी दोस्ती हुई थी.
कुछ महीने पहले फेसबुक से पता चला कि वो अब इस दुनिया में नहीं रहे. मैंने उनके कई दोस्तों से उनकी अचानक मौत के बारे में पूछा. किसी का जवाब नहीं आया.
जोज़ेफ किरिया भारत में अफ्रीकियों के ख़िलाफ़ हो रहे भेदभाव पर एक किताब लिख रहे थे, इसमें उनका अपना अनुभव भी शामिल था.
उन्होंने एक बार मुझसे पूछा था कि भारतीयों के ख़िलाफ़ नस्ली भेदभाव अमरीका और यूरोप में आमतौर से होता है. "जो ख़ुद पीड़ित हो वो अपने घर में वही अपराध हमारे साथ क्यों करता है?"
क्या इसका जवाब ये है कि हम ख़ुद भी नस्लवादी हैं? क्या हम गोरे रंग को काले रंग पर तरजीह नहीं देते? क्या कालिया, हब्शी और नीग्रो जैसे शब्द भारत में रह रहे अफ़्रीकी नागरिकों के लिए इस्तेमाल नहीं करते?

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यही नहीं, भारत में उनके बारे में आम धारणा है कि अफ़्रीकी लोग ड्रग्स की तस्करी करते हैं, अफ़्रीकी महिलाएं देह व्यापार करती हैं.
मुंबई में एक महिला ने मुझसे कहा था <link type="page"><caption> अफ़्रीकी टकले और डरावने</caption><url href="http://www.bbc.com/hindi/multimedia/2013/03/130314_nigerians_india_zubair_pa" platform="highweb"/></link> लगते हैं.
ज़रा उनकी शिकायतों पर ग़ौर करें. उन्हें किराए का घर आसानी से नहीं मिलता, पुलिस उन्हें कई बार केवल शक के आधार पर हिरासत में ले लेती है.
कभी-कभी भेदभाव की ये भावना उनके ख़िलाफ़ हमले और हत्या में नज़र आती है.
इसके विपरीत अफ़्रीकी ये कहते हैं कि उनके यहां भारत और भारतीय मूल के लोगों को काफ़ी सम्मान मिलता है. उनके साथ भेदभाव नहीं होता.

बल्कि अफ़्रीकी देशों में भारत की छवि काफ़ी अच्छी है. वो पूछते हैं कि भारत में उनके ख़िलाफ़ हिंसा का अफ़्रीकी अपने देशों में बदला लेने लगें तो क्या होगा?
भारत सरकार, ख़ासतौर से विदेश मंत्रालय, अफ़्रीकियों के ख़िलाफ़ पिछले कुछ सालों में बढ़ते हमलों से काफ़ी चिंतित है.
भारत और अफ़्रीका के बीच रिश्ते मज़बूत और ऐतिहासिक हैं.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले साल दिल्ली में अफ़्रीका-भारत शिखर सम्मलेन में कहा था, "भारत और अफ़्रीका के बीच मज़बूत भावनात्मक संबंध को हम और मज़बूत बनना चाहते हैं."
भारत के अफ़्रीकी देशों से कई स्तर पर रिश्ते हैं, और ये रिश्ते अटूट हैं. पिछले साल हुए <link type="page"><caption> सम्मेलन</caption><url href=" http://www.iafs.in/home.php " platform="highweb"/></link> में सभी 54 अफ़्रीकी देशों ने भाग लिया था. ये दोनों पक्ष के बीच तीसरा शिखर सम्मलेन था.
पिछले हफ़्ते दिल्ली में कांगो के एक नागरिक की हत्या के बाद अफ़्रीकी देशों के राजदूतों ने इस पर कड़े शब्दों में अपनी नाराज़गी जताई थी.

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विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने उन्हें आश्वासन दिया कि अपराधियों के ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई की जाएगी.
भारत सरकार चिंतित है. उसने अफ़्रीका में 50 अरब डॉलर निवेश कर रखा है.
भारत 70 अरब डॉलर के सालाना कारोबार के साथ अफ़्रीका का चौथा सबसे बड़ा ट्रेडिंग पार्टनर है.
लेकिन भारत, अफ़्रीका में चीन से मुक़ाबला करने में विफल है. चीन और अफ़्रीका के बीच सालाना कारोबार 200 अरब डॉलर का है.

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दिलचस्प ये है कि अफ़्रीका में भारतीय निवेश में निजी कंपनियों की हिस्सेदारी ज़बरदस्त है जबकि चीन का सारा निवेश सरकारी पैसे पर निर्धारित है.
दूसरे ये कि भारत, अफ़्रीका में चीन के मुक़ाबले कहीं अधिक लोकप्रिय है. ये कोई भी अफ़्रीकी आपको बता सकता है. भारतीय मूल के लोगों की साख भी वहां अच्छी है.
लेकिन भारत में अगर अफ़्रीकी नागरिकों के ख़िलाफ़ भेदभाव और हिंसा पर रोक नहीं लगाई गई तो अफ़्रीकी देशों में भारतीय हित को नुक़सान हो सकता है. भारतीय मूल के लोगों के ख़िलाफ़ नाराज़गी भी बढ़ सकती है.
युगांडा से 1973 में भारतीय मूल के हज़ारों लोगों को निकाला जा चुका है. भारतीय मूल के लोग इसे अब तक भूल नहीं सके हैं.

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भारत सरकार ने अफ़्रीकी लोगों की सुरक्षा के इंतज़ाम का वादा किया है. भारतीयों को जागरुक करने के लिए एक मुहिम शुरू की गई है.
ज़रूरत भारत में मानसिकता बदलने की है. इसमें समय लग सकता है लेकिन ये एक ज़रूरी क़दम है.
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