इनके लिए ये हरे-भरे 'पेड़ ही औलाद हैं'

बुंदेलखंड कई साल से सूखे की मार झेल रहा है.

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इमेज कैप्शन, बुंदेलखंड कई साल से सूखे की मार झेल रहा है.
    • Author, समीरात्मज मिश्र
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए

सूखे और जल संकट से जूझ रहे बुंदेलखंड में अवैध खनन करने वाले हैं, जंगलों को काटकर मैदान बनाने वाले भी हैं, तो वहीं भैयाराम यादव भी हैं, जिन्होंने जंगलों को बचाने और नए पेड़ों को लगाने की क़सम खा रखी है.

भैयाराम ने अपना पूरा जीवन ही पेड़ों को समर्पित कर दिया है.

भैयाराम चित्रकूट ज़िले में भरत कूप इलाक़े के पहाड़ी जंगल में मिट्टी के एक छोटे से घर में रहते हैं.

इनके घर में दो-एक कपड़ों और कुछ बर्तनों के अलावा हमें और कुछ नहीं दिखा.

लेकिन भैयाराम उस उजाड़ जंगल में ऐसी संपत्ति खड़ी कर रहे हैं, जो आने वाली पीढ़ियों को जीवन देने वाली है.

भैयाराम यादव ने अपनी मेहनत से सूखी धरती पर चालीस हज़ार पेड़ लगा दिए हैं.

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इमेज कैप्शन, भैयाराम यादव ने अपनी मेहनत से सूखी धरती पर चालीस हज़ार पेड़ लगा दिए हैं.

चित्रकूट की इस पथरीली पहाड़ी ज़मीन पर पिछले आठ-दस सालों में भैयाराम ने चालीस हज़ार पेड़ लगा दिए हैं.

वन विभाग के अधिकारी भी इन पेड़ों की संख्या की पुष्टि करते हैं.

बांदा चित्रकूट परिक्षेत्र के वन संरक्षक केएल मीणा भी भैयाराम की तारीफ़ करते हैं और कहते हैं कि उनसे बाक़ी लोगों को प्रेरणा लेनी चाहिए.

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भैयाराम बताते हैं कि पेड़ लगाने का काम उन्होंने साल 2007 से शुरू किया और इसकी प्रेरणा उन्हें अपने पिताजी से मिली.

वो बताते हैं, “मेरे एक बेटा था, उसकी अपने ननिहाल में बीमारी से मौत हो गई. बाद में पत्नी भी नहीं रही. फिर मैंने इन्हीं पेड़ों को अपना बेटा समझ लिया और ये मेरे लिए आज भी औलाद की ही तरह हैं.”

भैयाराम के लगाए पेड़ आज बड़े हो गए हैं. सूखे की मार और पानी का संकट भी कुछ हद तक झेल ले रहे हैं, लेकिन नन्हें पेड़ों को इस स्थिति तक पहुंचाने के लिए उन्होंने जो जतन किया, उसे सुनकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं.

ये पूछने पर कि इनकी सिंचाई के लिए पानी कहां से लाते थे, क्योंकि बुंदेलखंड में भी चित्रकूट में ही सबसे ज़्यादा पानी का संकट रहता है.

बुंदेलखंड के चित्रकूट इलाक़े में पानी की समस्या सबसे ज़्यादा है.

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इस पर भैयाराम का कहना था कि दो घड़ों को एक कांवर बनाकर वो अपने दोनों कंधों पर लादकर लाते थे और पेड़ों को पानी देते थे.

इस तरह से दिन में आठ दस घंटे वो पानी लाने और पेड़ों को सींचने का काम नियमित रूप से करते थे, जो आज भी जारी है.

हालांकि उनके पुराने पेड़ अब बड़े हो गए हैं लेकिन पेड़ लगाने का सिलसिला अभी थमा नहीं है.

अपने पेड़ों को दिखाने के लिए भैयाराम, जब हमें जंगल में कुछ और अंदर ले गए तो एक और बात उन्होंने बताई. उनका कहना था कि पहाड़ के नीचे जिस कच्ची सड़क पर हम लोग चल रहे हैं, वह भी उन्हीं की बनाई हुई है.

तीन किमी लंबी सड़क भैयाराम ने छह महीने मेहनत करके बनाई वो भी इसलिए ताकि वन विभाग के अधिकारी अपनी कार से वहां आ सकें और उनके पेड़ों की गिनती कर सकें.

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भैयाराम ने अपने इस जुनूनी सफ़र में सिर्फ़ क़ुदरती तकलीफ़ों को ही नहीं सहा, बल्कि उनके सामने दूसरे संकट भी आए.

वो बताते हैं कि लोग पहले उन्हें पागल समझते थे, मज़ाक उड़ाते थे, बकरियां छोड़ देते थे, यहां तक कि धमकी भी देते थे. लेकिन भैयाराम अपने अभियान में डटे रहे.

उसी गांव के लोग आज उनकी प्रशंसा करते नहीं थकते. रास्ते में हमारी मुलाक़ात रामजी त्रिपाठी से हुई. उनका कहना था कि भैयाराम से गांव के कई लड़कों ने भी सबक लिया है और जंगल में नहीं तो कम से कम अपनी ज़मीनों पर पेड़ लगाए हैं.

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रामजी त्रिपाठी कहते हैं कि उन्होंने ख़ुद क़रीब चार सौ पेड़ लगाए हैं और वो भी भैयाराम की लगन देखकर.

एक तरफ़ भैयाराम की आठ दस साल की मेहनत का अर्थ जंगल में उनके लगाए पेड़ बयां कर रहे हैं.

वहीं बुंदेलखंड पैकेज के क़रीब दो सौ करोड़ रुपये सिर्फ़ पेड़ों के नाम पर ख़र्च कर दिए गए और स्थानीय लोगों की मानें तो ये पेड़ ज़मीन पर कहीं नहीं दिखे, सिर्फ़ कागजों पर ही होंगे.

लेकिन जंगलों को बचाने और हरा भरा करने के लिए भैयाराम की एक ख़्वाहिश है. वो चाहते हैं कि यदि सरकार मनरेगा के तहत पेड़ लगाने और उनके रखरखाव के काम को भी शामिल कर ले तो बहुत अच्छा होगा.

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