अवैध कब्ज़े ने छीन लिया पानी

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    • Author, समीरात्मज मिश्र
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए

झांसी ज़िले के मऊरानीपुर से टीकमगढ़ के रास्ते में एक नदी दिखी जिसका नाम है, गरबई. स्थानीय भाषा में लोगों ने कुछ और भी नाम गिनाए. नदी पूरी तरह से सूख चुकी थी.

नदी किनारे मंदिर में रामायण पाठ चल रहा था और पास के एक हैंडपंप से पानी लेने के लिए कई लोग खड़े थे. वहीं कुछ लोगों से बात हुई तो पता चला कि कुछ समय पहले तक ये नदी पानी से लबालब भरी रहती थी और कोई इसे पैदल चलकर पार नहीं कर सकता था.

मंदिर के पुजारी ने बताया कि गरबई नाम इसका इसीलिए पड़ा. लेकिन आज इस नदी में पानी की एक बूंद भी नहीं है.

ये एक नदी की ही नहीं, बल्कि तालाबों, कुंओं और बड़े सरोवरों की भी हक़ीक़त है.

ये हालत उस बुंदेलखंड की है जिसके हर इलाके में बड़े-बड़े तालाब और जगह-जगह कुंए दिखते थे. तालाब और कुंए आज भी हैं लेकिन उनमें पानी नहीं है. यही वजह है कि लोगों को पानी के लिए दर-दर भटकना पड़ रहा है.

नदियां तो प्रकृति ने दी हैं लेकिन तालाबों, झीलों और सरोवरों का निर्माण समय-समय पर यहां के स्थानीय राजाओं ने कराए हैं. सबसे ज़्यादा सरोवर चंदेल राजाओं ने बनवाए जिनकी इंजीनियरिंग और जगह के चुनाव का लोग आज भी लोहा मानते हैं.

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मध्य प्रदेश के पन्ना ज़िले में तीन बड़े सरोवर हैं. सामाजिक कार्यकर्ता सुदीप श्रीवास्तव हमें लोकपाल सरोवर ले गए.

उन्होंने बताया कि इसकी बनावट ऐसी है कि पहाड़ से नीचे गिरने वाली पानी की एक बूंद बेकार नहीं जा सकती.

स्थानीय लोगों का कहना है कि इस तालाब से ही नहर निकली हुई थी जिससे लोगों को और खेतों को पानी की आपूर्ति की जाती थी. नहर के अवशेष अब कहीं-कहीं दिखते हैं और स्थानीय लोगों ने उसे पाटकर छोटे-छोटे घर बना लिए हैं.

पन्ना के ज़िलाधिकारी शिवनारायण सिंह चौहान बताते हैं कि इन बड़े तालाबों से ज़िले के छोटे तालाबों को भी ज़रूरत पड़ने पर पानी की आपूर्ति की जाती थी. उनका कहना है कि तालाब को साफ़ करके और गहरा किया जा रहा है लेकिन अतिक्रमण को वो ज़्यादा बड़ी समस्या नहीं मानते हैं.

यदि बात उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड के ज़िलों की हो, तो सरकारी आँकड़ों में भी बड़ी संख्या में तालाबों पर अवैध कब्ज़े किए गए हैं.

राजस्व विभाग के आँकड़ों से पता चलता है कि नवंबर 2013 तक प्रदेश में छोटे बड़े कुल मिलाकर 8,75,345 तालाब थे. इनमें झील, जलाशय और कुएं भी शामिल हैं.

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इनमें से 1,12,043 जल स्रोतों पर अवैध अतिक्रमण है. राजस्व विभाग का कहना है कि अब तक 65 हज़ार अवैध कब्ज़ों को हटाया भी गया है.

सूचना के अधिकार के तहत इन आंकड़ों को हासिल करने वाले स्थानीय पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता आशीष सागर कहते हैं कि अवैध कब्ज़ों की स्थिति ये है कि इन जलस्रोतों को पाटकर बड़ी-बड़ी कॉलोनियां बना दी गई हैं.

बुंदेलखंड के इस जल संकट और सूखे के लिए लोग पुराने स्रोतों के सूखने और उनकी बदइंतज़ामी को ही दोषी बताते हैं. इसे देखते हुए सरकारी तालाबों और कुंओं को जीवन देने की योजनाएं भी सरकारों ने शुरू की लेकिन ज़मीन पर इनका असर नहीं दिखता है.

मनरेगा के तहत शुरू की गई खेत तालाब योजना को भी जानकार सही नहीं मानते. महोबा ज़िले के सामाजिक कार्यकर्ता पंकज सिंह परिहार कहते हैं कि इस योजना से तो धीरे धीरे खेत ही बंजर हो जाएंगे.

पंकज कहते हैं कि अभी सरकारी पैसे से भले ही योजना सही लग रही है लेकिन आने वाले दिनों में जब खेतों में बने तालाब खेतों की ही मिट्टी से पट जाएंगे तब न तालाब रहेंगे और न ही खेत अपनी स्थिति में रह पाएंगे.