'पटेल फैक्टर' बहाना हो सकता है वजह नहीं

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- Author, प्रशांत दयाल
- पदनाम, अहमदाबाद से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
गुजरात में स्थानीय निकाय चुनाव में कांग्रेस को मिली सफलता ख़ासकर ग्रामीण क्षेत्रों में राज्य में सत्तारूढ़ भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए बड़ा झटका हैं.
गुजरात के स्थानीय निकाय चुनाव के नतीजों में शहरी क्षेत्रों में भाजपा का जादू बरकरार रहा, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में कांग्रेस ने उसे बहुत पीछे धकेल दिया.
230 तालुका पंचायतों में से कांग्रेस ने 132 जीती तो भाजपा केवल 73 पर ही जीत दर्ज कर पाई. पिछले चुनावों के बाद भाजपा के पास 193 तालुका पंचायतें थीं.
1985 के बाद गुजरात के ग्रामीण क्षेत्रों से कांग्रेस धीरे-धीरे ख़त्म हो रही थी. नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा लगभग पुराने ज़माने के अमिताभ बच्चन की तरह हो गई थी.
राजनीतिक हलकों में कहा जाता था कि एक से दस तक तो भाजपा ही है, कांग्रेस 11वें नंबर पर आती है. शायद वह भी इसलिए क्योंकि बीच में आने के लिए कोई और था ही नहीं.
वैसे कांग्रेस को मिली इस सफलता में जेल में बंद हार्दिक पटेल का योगदान कितना है और खुद कांग्रेस का कितना, ये बहस का विषय हो सकता है. लेकिन ये तय है कि इसका जवाब आसान नहीं है.

वजह चाहे पटेल मत रहे हों, लेकिन सवाल यह है कि पटेलों ने गुजरात के शहरी इलाक़ों में भाजपा में भरोसा बनाए रखा तो गाँवों में तस्वीर कैसे एकदम उलट गई.
गुजरात के छह महानगरों में भाजपा ने अपनी सत्ता बनाए रखी, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में भाजपा का सूपड़ा साफ हो गया.
छह महानगरों में 2010 चुनावों की तुलना में भाजपा की सीटें भी कम हुई हैं और कांग्रेस की सीटें बढ़ी हैं.
राज्य की 31 ज़िला पंचायतों में से 21 पर कांग्रेस जीती, जबकि भाजपा के पास महज़ छह ज़िला पंचायत बची.
चार ज़िला पंचायतों में भाजपा और कांग्रेस के बराबर उम्मीदवार जीते. यहाँ किसका कब्ज़ा होगा कहना मुश्किल है.
2010 में 31 ज़िला पंचायतों में से केवल एक ज़िला पंचायत कांग्रेस के पास थी.
तालुका पंचायतों की बात करें तो 230 में कांग्रेस ने 132 जीती हैं, जबकि 73 पर भाजपा ने कब्ज़ा किया है. पिछले चुनावों के बाद भाजपा के पास 193 तालुका पंचायतें थीं.

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गुजरात विद्यापीठ के समाजशास्त्री गौरांग जानी कहते हैं कि ग्रामीण क्षेत्रों में भाजपा की हार और कांग्रेस के उदय में विकास महत्वपूर्ण मुद्दा रहा है.
गौरांग कहते हैं, "गुजरात में शहरों के मुक़ाबले गाँवों में काफी कम विकास हुआ है. नरेंद्र मोदी जब सीएम थे तो इस हालत के लिए वो लगातार कांग्रेस को ज़िम्मेदार बताते थे."
जानी के अनुसार, "अब भाजपा के लिए यह कहना मुश्किल है, क्योंकि मोदी अब प्रधानमंत्री हैं. मोदी के हथियार का इस्तेमाल अब कांग्रेस ने सफलतापूर्वक किया."
जानी के हिसाब से मोदी के विकास मॉडल को शहरों में तो माना गया, लेकिन गांव आज वहीं खड़े हैं.
इन चुनावों में भाजपा विकास के मुद्दे के साथ मैदान में उतरी थी.
गुजरात के शहरी इलाकों में सड़कें, रिवरफ्रन्ट, उच्च शिक्षा की सुविधाओं को वोटरों ने भोगा और अपना वोट दिया, लेकिन ग्रामीण मतदाताओं पर स्मार्ट सिटी और वाई-फाई जैसे मुद्दों का कोई असर नहीं हुआ.

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गुजरात भाजपा के प्रवक्ता यमल व्यास मानते हैं कि उनकी पार्टी ग्रामीण वोटरों को विकास की बात समझा पाने में असफल रही है.
हार्दिक पटेल का नाम लिए बिना वो कहते हैं, "जातीय समीकरणों ने भी पार्टी को नुक़सान पहुंचाया है."
इन चुनावों का एक और ऐसा पहलू है जिसे देखने की ज़रूरत है. इन चुनावों में निर्दलीय उम्मीदवारों ने बड़े समय बाद अपनी ताक़त दिखाई है.
उत्तर गुजरात की उंझा नगरपालिका में सभी निर्दलीय ही जीते हैं. ऐसा और जगहों पर भी हुआ है.
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