सरकार एफ़टीआईआई का निजीकरण चाहती है?

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- Author, ऐना एमएम वेट्टिकाड
- पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
फ़िल्म एंड टेलीविज़न इंस्टिच्यूट ऑफ़ इंडिया (एफ़टीआईआई) में चल रहे गतिरोध को ख़त्म करने के लिए केंद्र सरकार शायद इस हफ़्ते बिना किसी शर्त हड़ताली छात्रों से बातचीत शुरू करे.
एफ़टीआईआई के अध्यक्ष पद पर गजेंद्र चौहान की नियुक्ति के ख़िलाफ़ वहां छात्रों का आंदोलन शुरू हुए सौ दिन से ज़्यादा हो चुके हैं. आंदोलन कर रहे छात्रों के ख़िलाफ़ बड़ा प्रचार अभियान भी चलाया जा रहा है.
इस आंदोलन की वजह से सरकार की किरकिरी हो रही है. सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के कुछ लोगों का यह भी मानना है कि एफ़टीआईआई वामपंथी छात्रों का गढ़ है, लिहाज़ा, वहां किसी की नियुक्ति होती, छात्र विरोध ही करते.
एफ़टीआईआई के ख़िलाफ़ प्रचार

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पर यह तथ्य से परे है. इसके पहले की भाजपा सरकार ने अभिनेता विनोद खन्ना को इंस्टिच्यूट का अध्यक्ष बनाया था. खन्ना भाजपा के सांसद थे. उनकी नियुक्ति पर किसी ने अंगुली नहीं उठाई थी.
सिनेमा जगत में उनकी ख्याति और प्रभाव की वजह से सभी ने उन्हें स्वीकार कर लिया.
मज़े की बात तो यह है कि संस्थान के ख़िलाफ़ ही प्रचार चलाया जा रहा है. यह कहा जा रहा है कि बीते कई दशकों से एफ़टीआईआई से कोई बड़ा कलाकार नहीं निकला है.
स्वयं चौहान ने कहा, "राजकुमार हीरानी को छोड़ कर इस संस्थान ने कोई महत्वपूर्ण कलाकार नहीं दिया है."
बड़ा कलाकार नहीं निकला?

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पर सच तो यह है कि एफ़टीआईआई से कई बड़े कलाकार निकले हैं. हीरानी के बैच के ही श्रीराम राघवन ने इसी साल रिलीज़ हुई हिट हिंदी फ़िल्म 'बदलापुर' का निर्देशन किया था.
वे 1987 में एफ़टीआईआई से पास हुए थे. इस फ़िल्म में वरुण धवन और नवाज़ुद्दीन सिद्दीक़ी ने अभिनय किया है.
मलयालम फ़िल्म 'प्रेमम' अभी सिनेमाघरों में चल ही रही है. इसमें विनय फोर्ट ने अभिनय किया है, जो 2009 में संस्थान से पास हुए.
इसी तरह साल 2011 में संस्थान से पास हुए अविनाश अरुण मराठी फ़िल्म 'किल्ला' के निर्देशक हैं. इस फ़िल्म को 2014 में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिले.
इस फ़िल्म की कहानी लिखने वाले तुषार परांजपे भी इसी संस्थान के हैं. यह सूची लंबी है.
'दूसरी संस्था बने'

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छात्र लंबे समय से संस्थान की कई समस्याओं की ओर लोगों का ध्यान खींचते रहे हैं. अब सरकार भी यही कह रही है. पर इसके साथ-साथ सरकार संस्थान से पास हुए छात्रों के बारे में ग़लत जानकारियां भी फैला रही है.
मुख्य धारा की मीडिया और सोशल मीडिया पर भाजपा समर्थकों के चलाए जा रहे प्रचार अभियान का संभावित मक़सद भी उभर कर सामने आ रहा है. एक स्तंभकार ने लिखा, "एफ़टीआईआई को केंद्र से पैसा देना बंद कर दिया जाना चाहिए. एक दूसरी संस्था बनाई जाए, जिसे सही सोच वाले अकादमिक लोग और बुद्धिजीवी चलाएं. ये वे लोग हों, जिनकी सोच हमसे मिलती जुलती हो."
ऐसे ही एक दूसरे स्तंभकार का कहना है कि सरकार एफ़टीआईआई के हर छात्र पर सालाना 13 लाख रुपए ख़र्च करती है. यह इंडियन इंस्टिच्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी के छात्रों पर होने वाले ख़र्च का चार गुना है.
संस्थान के एक छात्र ने आरटीआई अर्ज़ी दी तो मिली जानकारी से सरकार का यह दावा ग़लत निकला.
सरकार छात्रों के अलावा और जो ख़र्च करती हैं, वे सब इस मद में दिखाए गए. मसलन, प्रधानमंत्री राहत कोष में दिया गया पैसा, बाहरी लोगों के लिए फ़िल्म एप्रीसिएशन कोर्स पर हुआ ख़र्च और देश भर के फ़िल्म स्कूलों में हुई प्रतियोगिता पर हुआ ख़र्च भी इसमें ही दिखाया गया.
सरकार की धमकी?

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एफ़टीआईआई छात्र संघ ने एक प्रेस बयान में यह आरोप लगाया है कि 3 जुलाई की बातचीत में सूचना और प्रसारण मंत्री अरुण जेटली ने उन्हें संस्था बंद करने की धमकी दी थी.
बयान के मुताबिक़, जेटली ने कहा कि यदि छात्रों ने जल्द ही हड़ताल ख़त्म नहीं की तो "संस्थान को बंद किया जा सकता है और इसका निजीकरण" किया जा सकता है.
मंत्रालय ने इससे इंकार किया है. पर उस बैठक में मौजूद फ़िल्मी हस्तियों ने छात्रों के कहे की तसदीक़ की है.
निजीकरण की तैयारी?

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क्या निजीकरण को ध्यान में रख कर ही जून में गजेंद्र चौहान की नियुक्ति की गई थी?
एक सम्मानजनक कलाकार सरकार के दबाव में उस तरह नहीं आएगा जैसा एक नामालूम सा आदमी उसकी बातों को मानेगा.
इसके अलावा जिस प्रस्ताव को छात्रों और फ़िल्म उद्योग से जुड़े लोगों ने ख़ारिज कर दिया है, उसे ज़्यादातर बड़े कलाकार नहीं मानेंगे.
छात्रों के आंदोलन को मिल रहे व्यापक समर्थन की वजह से एफ़टीआईआई का निजीकरण करना सरकार के लिए फ़िलहाल तो मुश्किल ही होगा.
शायद इसलिए यह कोशिश की जा रही है जिससे आम जनता यह मान ले कि आंदोलन कर रहे छात्रों में कोई प्रतिभा नहीं है, वे सरकार पर बोझ हैं या फ़िल्म उद्योग में निवेश करना पैसे की बर्बादी है.
(ऐना एमएम वेट्टिकाड 'द एडवेंचर्स ऑफ़ एन इनट्रेपिड फ़िल्म क्रिटिक' की लेखिका हैं.)
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