'तीन तलाक़ के बीच 1-1 महीने का अंतर होना चाहिए'

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- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
भारत के मुस्लिम समाज में विवादास्पद ज़बानी तलाक़ या 'ट्रिपल तलाक़' के ख़िलाफ़ धीरे धीरे माहौल तैयार हो रहा है.
पिछले हफ्ते देश की मुस्लिम उलेमा काउन्सिल ने 'एक साथ तीन तलाक़' के रिवाज को ख़त्म करने की मांग की.
पिछले महीने <link type="page"><caption> भारतीय मुस्लिम्स महिला आंदोलन</caption><url href="http://bmmaindia.blogspot.in/" platform="highweb"/></link> के एक सर्वे में क़रीब 92 प्रतिशत महिलाओं ने ट्रिपल तलाक़ को ख़त्म करने पर ज़ोर दिया.
ऐसा लगता है कि देश के मुस्लिम युवाओं में विवादास्पद ज़बानी तलाक़ के ख़िलाफ़ आम सहमति बन रही है.
लेकिन इस राह में सब से बड़ी रुकावट है ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड.
बोर्ड ने ट्रिपल तलाक़ की प्रथा को जारी रखने का ऐलान किया है. बोर्ड ने अपने फैसले को पुख़्ता बनाने के लिए क़ुरान का हवाला भी दिया.
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बोर्ड का तर्क ये है कि ज़बानी तलाक़ देना ज़ुर्म है लेकिन अगर एक मुस्लिम मर्द ने अपनी बीवी को एक ही साथ तीन बार तलाक़ कह दिया तो तलाक़ पूरा समझा जाएगा.
बोर्ड का फैसला मुस्लिम महिला विरोधी है. क्या बोर्ड ऐसी कोई पवित्र संस्था है कि इसका हर फरमान भारतीय मुसलमानों पर लागू होना ही चाहिए?
भारत की युवा पीढ़ी से कटी इस संस्था की मुसलमानों पर उतनी मज़बूत गिरफ्त नहीं है जितनी सरकार और मीडिया समझती है.
बोर्ड मुस्लिम समुदाय से काफी कट चुका है. मैं ऐसे किसी मुस्लिम व्यक्ति को नहीं जानता जो किसी मज़हबी मसले पर बोर्ड से सलाह लेने गया हो.
भारतीय मुस्लिम महिला समाज के सर्वे में ये पता चला कि 95 प्रतिशत महिलाओं को मुस्लिम्स पर्सनल बोर्ड के वजूद की जानकारी थी ही नहीं.
बोर्ड एक तरह से मुस्लिम हितों की हिफाज़त का दावा करने वाली एक संस्था है जिसकी स्थापना 1973 में हुई थी.
बोर्ड मुस्लिम अधिकारों को मनवाने के लिए सरकार से लॉबी करने का दावा भी करता है.
मुसलमानों से जुड़ाव

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बाबरी मस्जिद/राम जन्म भूमि के विवाद और शाह बानो केस में बोर्ड ने एक ठोस भूमिका निभाई थी, लेकिन भारतीय मुस्लिम समाज के धार्मिक और सामाजिक हितों की रक्षा करने का दावा करने वाली ये संस्था मुसलमानों की बुनियादी समस्याओं का हल निकालने में बुरी तरह से नाक़ाम रही है.
बोर्ड के सदस्यों के बारे में भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन की सफ़िया नियाज़ कहती हैं ये मुस्लिम मज़हब और समाज के ठेकेदार हैं, लेकिन ये ज़मीनी हकीकत से दूर हैं.
वो कहती हैं, "हम मुस्लिम समुदाय में सालों से काम कर रहे हैं. हम इनकी सोच क्या है अच्छी तरह जानते हैं."
सफ़िया नियाज़ ने बोर्ड को नज़र अंदाज़ करते हुए सर्वे के नतीजे को आम मुसलमानों तक पहुँचाने का काम शुरू कर दिया है.
बोर्ड की उलेमा पर अब भी पकड़ मज़बूत है और उलेमा की आम मुसलमान पर.
प्रसिद्धी दारुल उलूम देओबंद मदरसे के आलिम मुफ़्ती शमून क़ासमी कहते हैं कि ट्रिपल तलाक़ अपने आप में सही है. मुस्लिम मर्द इसका ग़लत इस्तेमाल कर रहे हैं जिसे रोकना चाहिए.
उनके मुताबिक़, "हत्या के लिए 302 का मुक़दमा लगता है और जेल होती है. अगर 302 हटा दें तो हत्या करना ज़ुर्म नहीं रहेगा. इसी तरह अगर तीन तलाक़ हटा दें तो कोई भी किसी समय तलाक़ देता फिरेगा."
जागरूकता

जब उनसे ये कहा गया कि पाकिस्तान, इंडोनेशिया, मलेशिया और दूसरे कई मुस्लिम देशों में ट्रिपल तलाक़ का रिवाज नहीं है तो उन्होंने कहा कि उन्हें दूसरे मुस्लिम देशों में क्या हो रहा है उससे मतलब नहीं है.
मुफ़्ती साहब ये ज़रूर स्वीकार करते हैं कि बोर्ड को मुसलमानों के अंदर जागरूकता फैलाने की ज़रूरत है.
झारखंड के आलिम सैयद फ़ुरक़ान इमाम कहते हैं कि बोर्ड मुसलमानों को गुमराह कर रहा है, "जिस क़ुरान के हवाले से ये लोग ट्रिपल तलाक़ को सही ठहराते हैं उसी क़ुरान और हदीस से मैंने सीखा है कि तीन तलाक़ के बीच एक-एक महीने का फ़ासला होना चाहिए."
ट्रिपल तलाक़ पर चर्चा जितनी पुरानी है उतनी ही पेचीदा भी. सऊदी अरब और कुछ खाड़ी देशों को छोड़ कर लगभग सभी मुस्लिम देशों ने इसे रद्द कर दिया है.

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भारत में ये एक संवेदनशील मुद्दा है. सरकार मुस्लिम समुदाय के आपसी मामले में नहीं पड़ेगी.
भारत का मुस्लिम समुदाय पढ़ाई और कमाई में पीछे है, लेकिन इसकी युवा पीढ़ी की उमंगें और परिवर्तन की चाह वैसी होती जा रही है जैसी देश के दूसरे समुदायों के युवाओं की.
अब बोर्ड को भारत के मुस्लिम समुदाय में खुद को योग्य बनाये रखना है तो बदलना पड़ेगा. मुस्लिम युवाओं में बदलाव को ध्यान में रखना पड़ेगा. मुस्लिम महिलाओं को उनके अधिकार देने होंगे.
वरना अगले दस सालों में बोर्ड की मुसलमानों को ज़रूरत ही न पड़े.
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