'क़ानून का डर पैदा करती है मौत की सज़ा'

विधि आयोग ने फांसी की सज़ा ख़त्म करने की सिफ़ारिश की है.
आयोग ने सिर्फ़ 'आतंकवादी गतिविधियों और देश के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ने के मामले' में फांसी की सज़ा बरकरार रखने का समर्थन किया है.
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हालांकि, नौ सदस्यों वाले आयोग के तीन सदस्यों ने इसका विरोध किया है और फांसी की सज़ा बरकरार रखने का समर्थन किया है.
सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील केटीएस तुलसी भी इस राय से सहमत हैं.
उन्होंने बीबीसी से ख़ास बातचीत में कहा कि 'मौत की सज़ा मुल्ज़िमों के दिमाग़ में क़ानून का ख़ौफ़ पैदा' करती है.
बदलाव क्यों?
वो कहते हैं कि मौत की सज़ा का दुरुपयोग नहीं होना चाहिए लेकिन क़ानून में तब्दीली की कोई ज़रूरत नहीं है.
तुलसी ने कहा, "मैं समझता हूं कि मृत्युदंड के मुक़ाबले कोई भी और ऐसा दंड नहीं है जो कि मुल्ज़िमों के दिमाग़ में क़ानून का ख़ौफ़ पैदा कर सके."
"बहुत सारे अपराधियों को क़ानून का भय नहीं होता. लेकिन वो मौत से डरते हैं. इसलिए कम से कम क़ानून में मौत की सज़ा रहनी चाहिए."
केटीएस तुलसी का कहना है कि विधि आयोग ने जो सिफ़ारिश की है, वो विरोधाभासी है.
तुलसी ने कहा, "मैं समझता हूं कि या तो मौत की सज़ा रहनी चाहिए या नहीं रहनी चाहिए. अगर आप ये कहें कि सिर्फ़ आतंकवाद के लिए रहनी चाहिए तो अब कोई आतंकवाद विरोधी क़ानून ही नहीं है. अगर ये रहनी चाहिए तो जिन जुर्मों के लिए मौत की सज़ा क़ानून में है उन सबके लिए रहनी चाहिए."
वो कहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही गाइडलाइन तय की हैं कि 'रेयरेस्ट ऑफ द रेयर' मामलों में मौत की सज़ा होनी चाहिए.
'दुरुपयोग न हो'

इमेज स्रोत, AFP
तुलसी ने कहा कि विधि आयोग को ये सिफ़ारिश करनी चाहिए थी कि मौत की सज़ा कम से कम पांच न्यायाधीशों की बेंच तय करे. यानी मौत की सज़ा तभी दी जाए जब पांचों न्यायाधीश मौत की सज़ा के हक़ में हों.
वो कहते हैं कि ये फ़ैसला करने का अधिकार अदालत का होना चाहिए कि कहां मौत की सज़ा होगी और कहां नहीं होगी.
तुलसी कहते हैं कि मौत की सज़ा के क़ानून का दुरुपयोग नहीं होना चाहिए.
उनके मुताबिक़ भारत ने इस मामले में मिसाल क़ायम की है. बीते साठ सालों में सिर्फ़ 57 लोगों की मौत की सज़ा पर तामील हुई है.
तुलसी को विधि आयोग की सिफारिश मंज़ूर होने की ज़्यादा उम्मीद नहीं है.
(केटीएस तुलसी से बीबीसी संवाददाता समीरात्मज मिश्र की बातचीत के आधार पर)
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