वरुण गांधी पार्टी लाइन से अलग क्यों चले?

वरुण गाँधी, भाजपा नेता

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भाजपा नेताओं को लग रहा था कि उन्होंने याक़ूब मेमन को फांसी पर लटकाकर चरमपंथ के ख़िलाफ़ लड़ाई के मुद्दे पर कांग्रेस से बढ़त हासिल कर ली है लेकिन तभी वरुण गांधी ने पार्टी को मुश्किल में डाल दिया.

भाजपा इस फांसी को निजी विजय की तरह ले रही थी.

<link type="page"><caption> पढ़ें वरुण गांधी ने क्या कहा थाः सभ्य देश में जल्लाद, लज्जा की बात है</caption><url href="http://www.bbc.com/hindi/india/2015/08/150802_varun_gandhi_death_ia.shtml" platform="highweb"/></link>

35 वर्षीय वरुण गांधी सुल्तानपुर से लोकसभा सांसद हैं. उन्होंने एक मैगज़ीन में फांसी की सज़ा का विरोध करते हुए तीखा लेख लिखा. यानी वो अपनी ही पार्टी की आधिकारिक पोज़ीशन के ख़िलाफ़ गए. चाहे वरुण गांधी ने याक़ूब मेमन का अपने लेख में ज़िक्र नहीं किया लेकिन लेख के टाइमिंग को देखते हुए बात स्पष्ट है.

याक़ूब मेमन को फांसी देने पर भाजपा का आधिकारिक स्टैंड सामने रखते हुए पार्टी के एक प्रवक्ता ने कहा, "हम चरमपंथ से लड़ रहे हैं लेकिन वो (यानी कांग्रेस और वामपंथी पार्टियां) हमसे लड़ रहे हैं."

'हम बनाम वो'

वरुण गांधी, आदित्यनाथ, भाजपा नेता

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ऐसा नहीं लगता कि पार्टी के बड़े नेता इस मामले को विमर्श का मुद्दा बनाएँगे. फिर भी मोदी सरकार के अंदर या बाहर के लोग, विश्व हिन्दू परिषद और संघ या उससे जुड़े दूसरे संगठन इसे प्रयोग 'हम बनाम वो' के तौर पर पेश करेंगे. हम यानी 'संकट में घिरे हिन्दू' और वो यानी मुसलमान.

आउटलुक पत्रिका में 'द नूज़ कास्ट्स अ शेमफ़ुल शैडो' शीर्षक से छपे लेख में वरुण ने मृत्युदंड को 'बदला लेने जैसी कार्रवाई' कहा है. जल्लाद को उन्होंने 'सभ्य समाज के लिए कलंक' बताया है.

वरुण ने तर्क दिया है कि मृत्युदंड 'केवल न्याय व्यवस्था में सज़ा देने का एक विकल्प मात्र' नहीं है बल्कि क़ानूनी अधिकार से आगे बढ़कर ये मानवाधिकार का विषय है.

उन्होंने लोगों को सचेत करते हुए कहा है कि किसी को मृत्युदंड देने के लिए 'बेचैन' नहीं होना चाहिए.

फांसी का समाजशास्त्र

वरुण गांधी, भाजपा नेता

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वरुण ने लिखा है कि भारत में मृत्युदंड पाने वाले 75 फ़ीसदी लोग सामाजिक और आर्थिक रूप से कमज़ोर तबक़े के हैं. उनके मुताबिक़ फांसी की सज़ा पाने वालों में '94 प्रतिशत या तो दलित या मुसलमान' हैं.

जब दिल्ली के एक अख़बार ने उनसे पूछा कि उन्होंने ये लेख क्यों लिखा, तो उन्होंने कहा कि उन्होंने भाजपा की नीति का विरोध नहीं किया है क्योंकि उनका लेख मेमन पर केंद्रित नहीं था.

वरुण का कहना था कि उन्होंने मृत्युदंड पर ऐतिहासिक दृष्टि से विचार किया है. उनके इस तर्क से भाजपा में शायद ही कोई सहमत हो. पार्टी के अंदरख़ाने इस लेख के छपने के वक़्त और हालात के पीछे की मंशा पर सवाल उठाए जा रहे हैं.

भाजपा ने वरुण की टिप्पणियों से ख़ुद को अलग कर लिया है.

केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने मीडिया से कहा कि वरुण नियमित तौर पर लेख और स्तंभ लिखते रहते हैं जिनमें वो अपने निजी विचार रखते हैं, जिनका पार्टी के विचार के अनुरूप होना ज़रूरी नहीं है.

पुराना रेकॉर्ड

वरुण गांधी, भाजपा नेता

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लेकिन भाजपा पहली बार वरुण के कारण मुश्किल में नहीं पड़ी है.

साल 2009 के चुनाव में दिया गया उनका भाषण याद करिए. तब उन्होंने बिना हिचके मुसलमानों के ख़िलाफ़ ज़हरीले शब्दबाण चलाए थे.

उनके ऊपर समुदायों के बीच नफ़रत और हिंसा उकसाने का आरोप लगा. फिर वो गिरफ़्तार हुए लेकिन बाद में वो सभी आरोपों से बरी हो गए.

साल 2009 का लोकसभा चुनाव उन्होंने अपनी माँ मेनका गांधी के परंपरागत संसदीय क्षेत्र पीलीभीत से लड़ा और जीते.

लेकिन उनके भाषणों से भाजपा को बड़ा नुक़सान हुआ क्योंकि उसके बाद अल्पसंख्यकों ने एकजुट होकर कांग्रेस को वोट दिया.

उस साल संसदीय चुनाव में कांग्रेस को उत्तर प्रदेश के रुहेलखंड इलाक़े में भारी जीत मिली थी.

गांधी बनाम गांधी

अमित शाह, नरेंद्र मोदी, राजनाथ सिंह, लालकृष्ण आडवाणी

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वरुण भाजपा में साल 2004 में शामिल हुए थे. उन्हें उस वक़्त भाजपा की मुख्य रणनीतिकारों लालकृष्ण आडवाणी और प्रमोद महाजन का पूरा समर्थन प्राप्त था.

महाजन ने वरुण और मेनका के भाजपा के साथ आने को बड़ी उपलब्धि बताते हुए दावा किया था कि केवल गांधी ही कांग्रेसी गांधी का मुक़ाबला कर सकते हैं.

महाजन की भविष्यवाणी 2009 के चुनावों में कुछ ही हद तक साकार होती दिखी जब सोनिया और राहुल गांधी के सेकुलर विचारों के बरअक्स वरुण ने कथित कम्यूनल ब्रांड को बढ़ावा देना शुरू किया और पार्टी को कुछ चुनावी फ़ायदा हुआ.

लेकिन उसके बाद भी भाजपा वरुण को बढ़ावा देती रही. पार्टी के तत्कालीन अध्यक्ष राजनाथ सिंह 'एकजुटता दिखाने के लिए' जेल में जाकर उनसे मिले थे.

भाजपा के किसी नेता ने वरुण के ख़िलाफ़ कुछ नहीं बोला. हालांकि कुछ नेता अंदरख़ाने उनके भड़काऊ बयानों के राजनीतिक परिणामों को लेकर खीझते रहे.

राजनाथ सिंह ने उन्हें पार्टी का जनरल सेक्रेटरी नियुक्त करने के साथ ही उन्हें अपने तरीक़े से काम करने की पूरी आज़ादी भी दी.

नीतिगत फ़ैसलों में भूमिका

नरेंद्र मोदी, अमित शाह, अरुण जेटली

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लेकिन राजनाथ के बाद अध्यक्ष बने नितिन गडकरी ने 2012 के विधान सभा चुनावों में वरुण के पर कतर दिए. तब कहा जा रहा था कि वरुण अपनी छवि पार्टी से बड़ी बनाने की कोशिश कर रहे थे.

भाजपा में ऐसे नेता भी थे जो वरुण के 'नेहरू-गांधी विरासत' से बहुत प्रभावित नहीं थे. नरेंद्र मोदी और अमित शाह ऐसे ही नेताओं में थे. इस वक़्त पार्टी की कमान इन्हीं दोनों के हाथ में है.

साल 2014 के लोक सभा चुनाव में उत्तर प्रदेश के प्रभारी रहे अमित शाह ने वरुण को पीलीभीत सीट छोड़कर सुल्तानपुर से चुनाव लड़ने की तो इजाज़त दे दी, लेकिन अपने संसदीय क्षेत्र से बाहर न जाने के आदेश के साथ.

चुनावों के ठीक बाद मेनका और वरुण ने अपनी ख़ुदमुख़्तारी का दावा एक बार फिर से पेश करने की कोशिश की.

तंत्र से बाहर

मेनका गांधी, राजनेता

पीलीभीत में चुनावी जीत के बाद आम सभा में लोगों का आभार जताते हुए मेनका ने इस बात की तरफ़ इशारा किया कि उनका बेटा यूपी के अगले मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार हो सकता है.

कहा जाता है कि इस बयान से लाल-पीले हुए शाह ने मेनका के घर जाकर उनसे बातचीत की थी. इसके बाद वरुण को शाह की टीम से बाहर कर दिया गया.

फ़िलहाल दिल्ली और यूपी में भाजपा की नीतियाँ बनाने और फ़ैसले लेने वाले तंत्र से बाहर हो चुके वरुण जब तब पार्टी को चुनौती देकर ख़ुद को व्यस्त रख रहे हैं.

वरूण के सरपरस्त आडवाणी और राजनाथ सिंह अब पार्टी के प्रमुख नेता नहीं हैं. लेकिन मौत की सज़ा का विरोध करने के पीछे एक और वजह भी हो सकती है.

वरूण अपनी छवि को बदलना चाहते हैं. 2009 के चुनाव प्रचार के समय उनके मुस्लिम विरोधी भाषण के कारण बनी उनकी नकारात्मक छवि को वो सुधारना चाहते हैं.

शायद उन्होंने सोचा होगा कि पार्टी क्या सोचती है इसको नज़रअंदाज़ करते हुए, यही सही समय है जब एक कट्टरपंथी से उदारवादी की छवि बनाने की कोशिश की जा सकती है.

(वरिष्ठ पत्रकार राधिका रामासेशन से बीबीसी संवाददाता इक़बाल अहमद की बातचीत पर आधारित)

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