खालिस्तान समर्थकों पर पंजाब में राजनीति

प्रकाश सिंह बादल और नरेंद्र मोदी

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    • Author, सलमान रावी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

हाल ही में पंजाब की अकाली दल की सरकार ने देश के विभिन्न जेलों में बंद 30 पुराने खालिस्तानी अलगाववादियों को रिहा करने की सिफ़ारिश केंद्र से की है.

शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) ने भी 120 ऐसे लोगों की सूची सरकार को सौंपी है.

हाल ही में गुरदासपुर में चरमपंथी हमले के बाद पंजाम में चरमपंथ की वापसी की बातें एक बार फिर भारतीय मीडिया में दिखने लगीं.

विपक्षी कांग्रेस के नेता राज कुमार कहते हैं, "आज भी सरहद पार खालिस्तानी कैम्प चल रहे हैं. इससे पंजाब के माहौल के ख़राब होने की आशंकाएं बढती जा रही हैं."

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रक्षा मामलों के जानकार अजय साहनी कहते हैं, "यह सच है कि कुछ खालिस्तान समर्थक पकिस्तान में शरण लिए हुए हैं. मगर उनके वापस भारत में एक्टिव होने अभी तो कोई आसार नहीं है."

पिछले महीने ही राज्य सरकार की पहल पर खालिस्तान लिबरेशन फ़ोर्स के दविंदरपाल सिंह भुल्लर को दिल्ली की तिहाड़ जेल से अमृतसर ट्रांसफ़र किया गया. पंजाब कांग्रेस के नेता राज कुमार का आरोप है कि भुल्लर को राजकीय अतिथि की तरह सरकारी अस्पताल में रखा गया है.

कांग्रेस ने सरकार पर अलगाववादियों को महिमा मंडित करने का आरोप भी लगाया है.

रिहाई का वादा

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अजय साहनी का कहना है कि हर चुनाव से पहले अकाली दल इस तरह के शोशे छोड़ती है.

कट्टरपंथी माने जाने वाले संगठन दल खालसा के कंवरपाल बिट्टू ने अकाली दल का बचाव करते हुए कहा कि अकाली दल की भी अपनी मजबूरियाँ हैं. उसे सिखों के वोटों से ही सरकार बनानी है.

पंजाब

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दैनिक भास्कर के अमृतसर एडिशन के संपादक शम्मी सरीन को लगता है कि आज पंजाब में नशाखोरी, भ्रष्टाचार और बेरोज़गारी खालिस्तान ज़्यादा बड़े मुद्दे हैं.

खालिस्तान का आंदोलन 1980 के दशक से शुरु हुआ था. भारत विरोधी इस हिंसक आंदोलन में हज़ारों लोगों को अपनी जानें गंवानी पड़ीं थी. 1984 में भारतीय सेना ने स्वर्ण मंदिर परिसर में मौजूद खालिस्तानी चरमपंथियों को निकालने के लिए बड़ी सैन्य कार्रवाई.

इसके कार्रवाई के बाद भारतीय पंजाब में चरमपंथ का लंबा दौर शुरु हुआ जो 1990 के शुरुआती सालों तक चला.

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