'गाड़ी भगाओ, यह चरमपंथी हमला है'

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वर्षों बाद बीते सोमवार को पंजाब के गुरुदासपुर के दीनानगर में चरमपंथी हमला हुआ था. हमलावरों ने तड़के एक बस पर गोलियां चलाईं, लेकिन बस चालक की सूझबूझ से बस के यात्री सुरक्षित बच गए.
इन हमलावरों के ख़िलाफ़ पूरे दिन भर चली कार्रवाई में चरमपंथियों समेत 10 लोग मारे गए.
<link type="page"><caption> देखिए नानकचंद का वीडियो</caption><url href="https://www.youtube.com/watch?v=6eRxmh0Brzc" platform="highweb"/></link>
जिस बस पर हमलावरों ने पहले गोलीबारी की थी उसके ड्राइवर नानकचंद बताते हैं कि गोली चलते ही उन्होंने बिना ये जाने गाड़ी भगा दी कि गोली कहां लगी है.
नानकचंद की आपबीती, उन्हीं की जुबानी

रोज़ की तरह हम सुबह 3.45 के आस पास पठानकोट बस स्टैंड से चंडीगढ़ के लिए निकले. पठानकोट शहर में सवारियों के लिए घूमते घूमते सुबह करीब 5.30 बजे हम दीनानगर से जा रहे थे.
दीनानगर पहुँचते-पहुँचते मेरी बस ख़चाख़च भरी हुई थी. लगभग 76 पैसेंजर थे. कुछ अपने स्टाफ़ वाले भी थे. तक़रीबन 80 लोग मानकर चलिए.
दीनानगर बस स्टैंड पर पैसेंजर चढ़े भी और उतरे भी. फिर हम निकल पड़े. अभी 600 मीटर आगे बढ़े होंगे.
थाना क्रॉस कर लिया था. तब मैंने देखा सड़क के किनारे एक सफ़ेद कार खड़ी थी. उसकी हेड लाइट जली हुई थी.
कार के साथ एक शख़्स खड़ा हुआ था. वो वर्दी में था. फौजियों की वर्दी में. मुँह पर मास्क लगाया हुआ था. उसके बास अत्याधुनिक हथियार था.
वो अकेला था तो मेरे दिमाग में आया कि अगर आर्मी वाले होते तो कई लोग होते. दो चार गाड़ियां होतीं. अकेला नहीं होता.
'चरमपंथी हमला'

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उसने हाथ का इशारा कर मुझे रुकने को कहा.
मेरे सामने डायवर्ज़न था. मने डायवर्ज़न से गाड़ी को घुमाया. जैसे ही गाड़ी उसकी तरफ मुड़ी, उसने छलांग लगा दी.
तभी उसने गोलियां चलानी शुरू कर दी. गोली सीधे मेरे शीशे के ऊपर से निकल गई.
ड्राईवर की सीट के पीछे तीन सवारियां खड़ी हुईं थीं. दूसरी बार जब गोली चली तो तीनों को लगी.
कंडक्टर ने सीटी मारनी शुरू कर दी. बस खचाखच भरी हुई थी. तब तक समझ में आने लगा था कि यह चरमपंथी हमला है.
कंडक्टर चिल्लाने लगा, "गाड़ी भगाओ. यह चरमपंथी हमला है."
'स्पीड बढ़ा दी'

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फिर मैंने फुर्ती से गाड़ी की स्पीड बढ़ा दी. बस की हेडलाइट आॅन कर दी और हॉर्न बजाता रहा ताकि मुझे दूसरी गाड़ियां रास्ता दे दें. मैं तेज़ी से गाड़ी भगाता रहा.
दीनानगर से गुरदासपुर का रास्ता 15 किलोमीटर का है और आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि यह रास्ता मैंने 15 मिनटों में ही तय कर लिया.
अपनी बस को मैंने सीधे सरकारी अस्पताल में घुसा दिया. जिन यात्रियों को गोली लगी उनका इलाज शुरू हो गया. बाक़ी के पैसेंजर जो थे उन्हें मैंने चंडीगढ़ जाने वाली एक दूसरी बस में बैठा दिया.
फिर मैं गुरदासपुर थाने चला गया और रिपोर्ट दर्ज कराई. ज़्यादातर मुसाफिर चंडीगढ़ और मकेरियां के थे. कुछ गुरदासपुर के भी थे.
जब मेरे सहयोगी कंडक्टर ने बताया कि यह चरमपंथी हमला है तो मैंने पीछे मुड़कर भी नहीं देखा.
मैंने परवाह नहीं की कि गोली टायर में लगी या नहीं या बस को कितना नुकसान हुआ. मैं तो गाड़ी भगाता चला गया.
'...तो कोई नहीं बचता'

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अब ड्राइवर की ज़िन्दगी में तो डर ही है. स्टीयरिंग पकड़ ली तो ख़तरा शुरू. पता नहीं कब क्या हो जाएगा.
इसलिए अब डर की उतनी अहमियत नहीं है.
हमने सोचा कि अगर असली पुलिस वाले या फ़ौज वाले हुए तो हमें आगे फिर रोक लेंगे. मगर मैंने सूझ-बूझ से काम किया.
अगर वो गाड़ी में घुस जाते तो वो हाईजैक कर सकते थे. पता नहीं फिर क्या होता.
मैं तो ऊपर वाले का शुक्रिया अदा करता हूँ कि मैं बचा और मैंने गाड़ी के सभी मुसाफिरों को बचा लिया.
अगर मेरी कनपटी पर भी गोली लग जाती तो फिर बस में कोई नहीं बचता. मगर मैं डरा नहीं. क्योंकि डर के आगे ही जीत है.
(बीबीसी संवाददाता सलमान रावी से बातचीत पर आधारित)
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