'गर्भवती हुई पर शराब न छूटी, बस फिर ठान ली..'

- Author, इमरान क़ुरैशी
- पदनाम, बैंगलौर से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
सबरीना यह स्वीकार करती हैं कि जब वह पहली बार गर्भवती थीं तो रोज़ शराब पिया करती थीं.
हालांकि उन्हें डॉक्टर ने ऐसा करने से मना किया था, पर वह अपनी आदत से मजबूर थीं. उनके दूसरे गर्भ के दौरान भी उनके साथ यह दिक्कत बनी रही.
उनका शरीर कमज़ोर हो गया, उसका पित्ताशय ख़राब हो गया. पर वह चाह कर भी कुछ नहीं कर पाईं.
लड़ाई शराब से

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उन्होंने शराब के ख़िलाफ़ लड़ाई में अपना रवैया बदला. वह कहती हैं, “शराब का नशा भी डायबिटीज़ जैसी एक बीमारी ही है. इससे निपटने के लिए किसी मनोचिकित्सक की मदद लेने में भला क्या बुराई है?”
सबरीना ने बीबीसी से खुले मन से बात की और शराब के ख़िलाफ़ अपनी लड़ाई के बारे में बताया. उनकी पहचान छिपाने के लिए हमने उनका नाम बदल दिया है.
पढ़िए सबरीना की ज़ुबानी
कॉलेज के दिनों में मैं जिस मित्र के साथ रहती थीं, वो देर रात तक पढ़ते रहने के लिए सिगरेट पिया करती थी. बस, मैं भी सिगरेट पीने लगी.
ग्रैजुएशन के बाद कंप्यूटर प्रोग्रामिंग का कोर्स करने के लिए मैं दिल्ली चली गई. मैं अपनी दीदी के साथ रहती थी. जीजाजी रात को शराब पिया करते थे.
चस्का दारू का

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बस, यहीं से मुझे भी चस्का लग गया. वे अपने साथ मुझे पार्टियों वगैरह में भी ले जाते थे. मैं धीरे धीरे इसी रास्ते पर चल पड़ी.
मैं राहुल से मिली, जो बाद में मेरे पति बने. मैं एक बड़े होटल में काम करती थी, जो उन्हें नापसंद था. मुझे नौकरी छोड़नी पड़ी. पर इसके बाद मैं और ज़्यादा शराब पीने लगी.

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मैं आर्थिक दिक्कतों से तो जूझ रही ही थी, हमारे रिश्ते भी तनावपूर्ण हो गए. इसी दौरान मैं गर्भवती हो गई. डॉक्टरों ने मुझे साफ़ शब्दों में शराब छोड़ने को कहा. पर यह बेहद मुश्किल था.
गर्भवती हुई, शराब न छूटी
कुछ दिनों बाद नौकरी के सिलसिले में राहुल दूसरे देश चले गए. उनके साथ ही उनका पूरा परिवार गया और मैं भी वहीं चली गई. वहां हम अच्छी आर्थिक स्थिति में नहीं थे. पर आर्थिक दिक्कत के बावजूद मेरा शराब पीना नहीं छूटा.
शराब की वजह से मेरा स्वास्थ्य ख़राब होने लगा था, मुझे बीच बीच में दर्द भी होता था. एक दिन तेज दर्द उठा तो मुझे अस्पताल में दाख़िल कराया गया.
नष्ट हो गया पैंक्रियाज़

वहां जांच के बाद डाक्टरों ने पाया कि मेरा पित्ताशय (पैंक्रियाज़) नष्ट हो चुका है. उन्होंने कहा कि ज़्यादा शराब लगातार पीते रहने की वजह से ऐसा हुआ है.
कुछ दिनों के बाद राहुल वह देश छोड़ कहीं और चले गए. मैं अकेली पड़ गई, एक बार फिर मैंने शराब का सहारा लिया और पहले से अधिक पीने लगी.
इस बार मैं ज़्यादा बीमार पड़ी, एक बार फिर अस्पताल जाना पड़ा. मैं बिल्कुल कंकाल में तब्दील हो गई. राहुल मेरी खोज ख़बर लेने वापस आए. पर उनके बदले हुए व्यवहार से मैं काफी आहत हुई. मैं अवसाद में डूब गई.
रीहैबिलिटेशन केंद्र की शरण

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मैं भारत लौट आई. मैं शराब छोड़ने की कोशिश में रीहैबिलिटेशन केंद्र में भर्ती हो गई. पर इसी दौरान मुझे लगने लगा कि राहुल मेरे साथ बेवफ़ाई कर रहे हैं.
ज़ल्दी ही मेरा अनुमान सच साबित हो गया. मेरे पति के एक यूक्रेनियन महिला के साथ रिश्ते थे.
मैं काफी हताश और निराश हो चुकी थी. मैं जब जब ठीक होती, राहुल ऐसा कुछ कर बैठते कि मेरा अवसाद बढ़ जाता और मैं शराब में डूब जाती. इसका नतीजा यह ज़रूर हुआ कि मैंने यह प्रण कर लिया कि हर हाल में शराब छोड़ दूंगी.
अवसाद में ज़्यादा शराब
राहुल की वजह से ही मैंने यह तय कर लिया कि मैं शराब छोड़ कर दिखा दूंगी. मैं पहले बैंगलुरू के एक रीहैबिलिटेशन केंद्र गई. कोई खास फ़ायदा नहीं हुआ.

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मैं इसके बाद सेंटर फ़ॉर एडिक्शन मेडिसिन, नेशनल इंस्टीच्यूट ऑफ़ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरो साइंसेज (निमहैन्स) गई. यहां मैं धीरे धीरे ठीक हो गई.
सहारा मनोचिकित्सक का
सच को नकारने से कोई फ़ायदा नहीं. किसी महिला को मनोवैज्ञानिक का सहारा क्यों नहीं लेना चाहिए? यदि कोई महिला शराब की लत से निजात पाना चाहती है और मनोवैज्ञानिक के पास जाना चाहती है तो इसमें दिक्कत ही क्या है?
शराब पीने की लत अपने आप में एक बीमारी ही तो है. जैसे बीमारी का इलाज हो सकता है, वैसे ही शराब की लत से भी छुटकारा पाया जा सकता है.
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