ये सड़क सियाचिन तक जाती है...

भारत के लद्दाख क्षेत्र में सड़क बनाने के काम में लगे मजदूर

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भारत का लद्दाख क्षेत्र हिमालय पर्वत शृंखला के तकरीबन बीचों बीच पड़ता है. यहां पहुंचने के लिए जिन दुर्गम रास्तों से गुजरना पड़ता है, वे पहाड़ों को काट कर बनाए गए ऊँचे रास्ते हैं.

इन सड़कों का इस्तेमाल मुख्यतः फौज अपने सैन्य ठिकानों पर साजोसामान और रसद की आपूर्ति पहुंचाने के लिए करती है. इस पूरे इलाके में ऐसे कई सैन्य ठिकाने हैं. लद्दाख में सड़कें बनाना कोई आसान काम नहीं है.

इसे ऊँचे रास्तों की ज़मीन के तौर भी जाना जाता है. इस इलाके में सड़कें बनाने का मतलब सहनशीलता की परीक्षा लेना है. सड़क बनाने वालों को अपनी थकावट से भी लगातार लड़ना होता है. यहां हवा हल्की होती है और उसमें ऑक्सीजन का स्तर बेहद कम.

इन हालात में मानवीय श्रम बहुत मुश्किल हो जाता है और इसके ख़तरे भी होते हैं. 1987 और 2002 के बीच 119 से ज्यादा मजदूर यहां काम करने के दौरान मारे गए. सड़क बनाने के काम में यहां कई मजदूर गंभीर रूप से घायल भी हुए हैं.

फ़ोटोग्राफ़र आर्को दत्तो और राहुल धनकनी ने उन लोगों की ज़िंदगी का जायजा लेने की कोशिश की है जो दुनिया की कुछ सबसे ऊँची सड़कों को बनाने के काम में लगे हुए हैं. यहां कई बार ऐसा होता है कि पारा गिरकर शून्य से नीचे चला जाता है और ये इलाका साल के सात महीनों तक बाक़ी दुनिया से कट जाता है.

कई बार यहां लोगों को कुछ फीट बर्फ़ के नीचे भूमिगत होकर भी रहना होता है.

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इस शिविर में सड़क बनाने के काम में लगे प्रवासी मजदूर रहते हैं.

वे गर्मियों के मौसम में पश्चिम बंगाल, बिहार और झारखंड जैसे राज्यों से आते हैं. सड़क बनाने का काम अलग अलग खंडों में होता है.

यह शिविर समुद्र तल से 16 हज़ार फुट ऊंचा है. गर्मियों के मौसम में भी रात के वक्त यहां पारे का शून्य से नीचे चले जाना और बर्फबारी होना सामान्य बात है.

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मजदूरों को अस्थायी शिविरों में रहने की सुविधा मुहैया कराई जाती है.

तिरपाल के बने ये कैम्प हिमालय की बर्फीली हवाओं से बचाव के लिहाज से नाकाफी हैं.

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मजदूर अपने शिविरों से सड़क निर्माण के काम आने वाली चीजों के साथ खुली ट्रकों में सफर करते हैं.

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खार्दुंग ला की ओर जाने वाली सड़क बनाने के काम के दौरान कुछ मिनटों के लिए मजदूर सुस्ता रहे हैं.

यातायात के लिहाज से यह 'दुनिया का सबसे ऊँचा रास्ता' माना जाता है.

हर साल 70 हज़ार से भी ज्यादा मजदूर पूर्वी भारत के मैदानी इलाकों से 12 से 18 हज़ार फुट की ऊंचाई पर सड़कों के निर्माण कार्य और उनके रखरखाव के लिए आते हैं.

ये सड़कें दुनिया की सबसे ऊँची सड़कों में से हैं.

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बिहार से आया एक बाल मजदूर सड़क के एक नए हिस्से के निर्माण की तैयारी कर रहा है.

यह सड़क सेना की गतिविधियों और सैलानियों के आने जाने के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है.

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तांगलांग ला के नजदीक एक मजदूर सीमेंट की एक बोरी को निर्माण स्थल तक खींच कर ले जा रहा है.

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मजदूर एक छोटे से पुल के ऊपर खड़े हैं. यह पुल नदी की एक धारा के ऊपर बना है.

बर्फ पिघलने और भूस्खलन से मौजूदा सड़कें टूटने लगती हैं और इनका रखरखाव लगातार करने की जरूरत होती है.

यहां के मौसम के मद्देनज़र उन्हें अक्सर पर्याप्त कपड़े नहीं दिए जाते हैं और उनके पास जो कुछ होता है, वे उसी से काम चलाते हैं.

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सड़क निर्माण में लगे मजदूर खार्दूंग ला के नजदीक दोपहर के भोजने के लिए ब्रेक लेते हैं. ये सड़क सियाचिन की ओर जाती है.

सियाचिन पर भारत और पाकिस्तान दोनों ही अपना दावा जताते हैं. इसे दुनिया के सबसे ऊँचे युद्ध के मैदानों में भी शुमार किया जाता है.

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दिन का काम खत्म हो जाने पर सड़क मजदूर अपने तम्बू में आराम कर रहे हैं.

छुट्टियों का इस्तेमाल नहाने, कपड़े धोने, परिवार के लोगों से फोन पर बात करने और आराम करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है.

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पश्चिम बंगाल से आए एक मजदूर मुरली बजा रहे हैं. उन्होंने ये बांसुरी प्लास्टिक पाइप से बनाई है. ये पाइप उन्हें निर्माण की जगह पर मिली थी.

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बिहार से आए दो मजदूर सड़क निर्माण के काम आने वाली सामाग्री बनाने की जगह पर हैं.

ये प्लांट सेहत के लिए बेहद खतरनाक हैं क्योंकि यहां हवा में छोटे छोटे कण बड़ी मात्रा में हैं. उन्होंने बचाव का कोई साधन भी अपना नहीं रखा है.

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कंस्ट्रक्शन साइट पर एक मजदूर स्की गूगल्स पहने हुए. उसने चेहरे को कचरे और धुएं से बचाने के लिए मास्क के तौर पर रुमाल बांध रखा है.

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शेख इनाम और इनाम अहमद बिहार से हैं और अपनी एक कमरे की खोली में एक छोटी सी दुकान चलाते हैं.

पिछले 20 सालों से वे हर गर्मियों में लेह के स्कमपारी इलाके में इसे किराये पर चढ़ा देते हैं. लेह लद्दाख क्षेत्र का प्रमुख शहर है.

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मजदूर स्कमपारी में किराये के कमरों में खाना बना रहे हैं. लद्दाख के इस इलाके में प्रवासी मजदूरों की बड़ी आबादी रहती है.

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