हिमालय में छिपे लद्दाख़ के नौ नज़ारे!

लद्दाख़ (फ़ाइल फोटो)

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भारत के उत्तरी क्षेत्र लद्दाख़ को प्रकृति ने बेमिसाल ख़ूबसूरती बख़्शी है. इसकी सीमाएं पाकिस्तान से लगते विवादित क्षेत्र कश्मीर और चीन के स्वायत्तशासी क्षेत्र शिनझियांग और तिब्बत से लगी हैं.

लद्दाख़ की सांस्कृतिक विरासत 1000 साल से भी पुरानी है. हालाँकि हिमालय और काराकोरम पर्वत शृंखलाओं के बीच स्थित लद्दाख़ तक पहुंचना मुश्किलों भरा है.

इस क्षेत्र तक दो मुख्य सड़कों के ज़रिए पहुँचा जा सकता है, लेकिन पूरे इलाक़े में बर्फ़ जमी होने के कारण साल के सात से आठ महीने यहां पहुंचना मुश्किल होता है.

लद्दाख़ में आम तौर पर बौद्ध संस्कृति का प्रभाव है और इस पर पड़ोसी तिब्बत का असर साफ़ दिखाई देता है. हालाँकि तिब्बत आकार में लद्दाख़ से 10 गुना बड़ा है और लद्दाख़ के मुक़ाबले तिब्बत में 250 गुना ज़्यादा सैलानी आते हैं.

बौद्ध स्तूप

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लद्दाख़ में जगह-जगह पत्थरों से बने गोल सरंचना वाले स्तूप मिलते हैं. इनका प्रयोग पवित्र बौद्ध अवशेषों को रखने के लिए भी किया जाता है.

बौद्ध इन्हें प्रार्थना स्थलों के रूप में इस्तेमाल करते हैं. आम तौर पर स्तूप पहाड़ की चोटी के सामने या गांव के प्रवेश द्वार पर होते हैं.

माना जाता है कि ये स्तूप आसपास रहने वालों या वहाँ से गुज़रने वालों में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करते हैं. बौद्ध श्रद्धालू इन स्तूपों की दाएं से बाएं तरफ़ परिक्रमा करते हैं.

बर्फ़ में ट्रैकिंग

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अदभुत दृश्यों से घिरे इस मार्ग में मार्खा घाटी से गुज़रना एक कभी न भूलने वाला अनुभव है. यहाँ 11वीं शताब्दी का बौद्ध विहार भी है.

तीन पीढ़ियां

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मार्खा घाटी में ट्रैकिंग करने वाले स्थानीय गांवों में ही रात गुज़ारते हैं.

यहाँ ग्रामीण सैलानियों को रुकने के लिए कमरे देते हैं. स्थानीय एसोसिएशन ने विभिन्न सेवाओं का शुल्क निर्धारित कर रखा है ताकि सैलानियों से पैसे को लेकर कोई भेदभाव न हो.

परिवार सोने के लिए जगह देते हैं और घर में बने व्यंजन जैसे मोमोज़, टिंग्मो और थुकपा परोसते हैं. कई स्थानीय परिवारों में तीन पीढ़ियां साथ रहती हैं.

लाल चट्टानों के बीच नदी

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मार्खा घाटी के प्राकृतिक नज़ारे अक्सर बदलते रहते हैं. बर्फ़ से ढके पहाड़ों से ठीक पहले नंगी लाल चट्टानों के बीच बहती नदी अदभुत दृश्य पेश करती है.

जून से अगस्त में खेती

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लद्दाख़ के अधिकांश लोगों के घरों के पास उनके खेत होते हैं. हालाँकि ठंडे मौसम के कारण खेतों में कुछ उपजाना सिर्फ़ जून से अगस्त के बीच ही संभव हो पाता है.

इसके अलावा वे भेड़-बकरियां, याक और डीज़ो (याक और गाय की संकर नस्ल) पालते हैं.

जौ यहां की मुख्य फ़सल है, इसे ठंडे और ऊंचे इलाक़ों में उगाया जा सकता है और कम तापमान में रखा जा जा सकता है.

मानी पत्थर

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मानी, वो चपटे पत्थर हैं जिनमें तिब्बती लिपि में मंत्र लिखे होते हैं. इन्हें तिब्बत से आने वाले श्रद्धालु इस रास्ते से गुज़रते वक़्त रख जाते हैं.

मार्खा घाटी के वाहन

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मार्खा घाटी में हालाँकि कुछ सड़कों पर वाहन चल सकते हैं, लेकिन घोड़े और ख़च्चरों के बिना यहां जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती. लगभग हर चीज़ इनकी ही पीठ पर ढोई जाती है.

नीला आसमान

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4800 मीटर की ऊंचाई पर कई ऐसे प्राकृतिक दृश्य हैं जो आपकी आंखों को सुकून देते हैं. ऊंचाई पर होने के कारण यहाँ से आसमान बहुत साफ़ दिखाई देता है....नीला आसमान.

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