2014: दलित साहित्य में क्या रहा खास

- Author, बद्री नारायण
- पदनाम, कवि एवं समाजशास्त्री, बीबीसी हिंदी डॉट काम के लिए
हिन्दी में दलित एवं आदिवासी विषयों पर काफ़ी अच्छा लिखा गया है. दलित एवं आदिवासी लेखन में हिन्दी को प्रोफ़ेसर तुलसी राम, मोहनदास नैमिशराय, श्यौराज सिंह बेचैन, कंवल भारती, अनीता भारती जैसे अनेक लेखक दिए हैं, जिन्होंने हिन्दी रचनात्मक जगत को काफ़ी समृद्ध किया है.
हिन्दी में शोध एवं गवेषणा के क्षेत्र में दलित एवं आदिवासी विषयों पर कम काम हुआ है. इस विधा में कुछ गिनी-चुनीं किताबें आ रही हैं और कुछ गिने-चुने लेखक ही इस क्षेत्र में काम कर रहे हैं.
इस वर्ष रचनात्मक लेखन और शोध दोनों ही क्षेत्रों में ऐसी रचनाएँ कम आई हैं जिन्होंने पाठकों का ध्यान बड़े पैमाने पर आकृष्ट किया हो.
'मणिकर्णिका'

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डॉ. तुलसीराम रचित ‘मणिकर्णिका’ (राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली) इस साल की सर्वाधिक चर्चित आत्मकथा रही.
इसमें बाबासाहब भीमराव आंबेडकर के सामाजिक आत्म को प्रोफ़ेसर तुलसीराम ने अपनी स्मृतियों का सहारे अपने आत्म से जोड़ने की कोशिश की. वो आंबेडकर को 'अदर'(अन्य) के रूप में नहीं बल्कि अपने अभिन्न अंग के रूप में पेश करते हैं.
यह उत्तर भारत, ख़ासकर पूर्वी उत्तर प्रदेश के दलित चेतना के विकास का सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज है. इसकी एक विशेषता यह भी है कि यह मराठी दलित आत्मकथा लेखन की पद्धति से एकदम भिन्न है.
सामाजिक न्याय और दलित चेतना
डॉ. श्यौराज सिंह बेचैन की पुस्तक ‘सामाजिक न्याय और दलित साहित्य’(वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली) उनकी अपनी स्मृति देसज स्मृतियों की तरफ ले जाती है.
यह उनके लेखन की ख़ास शैली है जो उनकी किसी भी रचना को देसज लोकेशन में स्थापित करती है. इस कारण इस किताब को भी महत्व मिल रहा है.
जूझने की प्रक्रिया

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मोहनदास नैमिशराय द्वारा लिखित 'महानायक आंबेडकर', सामाजिक मूल्यों के तहत लगातार जूझने की प्रक्रिया से रूबरू कराती उपन्यास शैली में 2013 में प्रकाशित पुस्तक है. लेकिन उल्लेखनीय है कि वर्ष 2014 में इस पुस्तक के 12 संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं.
इसमें आंबेडकर के जीवन संघर्ष को सजीव तरीके से प्रस्तुत किया गया है. इसकी कहने की शैली बहुत ही रोचक है जिसके कारण इसे पाठक हाथों हाथ ले रहे हैं. कहने की आवश्यकता नहीं कि इस किताब की बिक्री में आंबेडकर की लोकप्रियता का भी बड़ा योगदान है.
'एनीहिलेशन ऑफ़ कास्टस'

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उल्लेखनीय है कि इस साल बाबासाहब आंबेडकर की पुस्तक 'एनीहिलेशन ऑफ़ कास्ट्स' का आलोचनात्मक संस्करण प्रकाशित हुआ, जिसकी भूमिका प्रसिद्ध अंग्रेज़ी लेखिका अरुंधति रॉय ले लिखी है.
अरुंधति की बहसतलब भूमिका और अपने ऐतिसाहिक महत्व के कारण यह ज़रूरी किताब इस साल चर्चा में रही. इसका हिंदी अनुवाद शीघ्र आने की चर्चा है.
अभाव का कारण

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हिन्दी में दलित और आदिवासी लेखन में नए महत्वपूर्ण काम इसलिए नहीं हो रहे हैं क्योंकि इसमें वृतांतों का दोहराव बहुत है. एक ही तरह के नरेटिव बार-बार सामने आ रहे हैं.
नए अनुभव को कहने के लिए नई दृष्टि विकसित करने की कोशिश करनी होगी जो हमारे दलित लेखक नहीं कर पा रहे हैं. वो एक पुराने बने हुए फ्रेम में चीज़ों को रखकर देख रहे हैं जबकि वास्तविकता लगातार बदल रही है.
शोध के क्षेत्र में भी बनी-बनाई आंबेडकरवादी पद्धति से चीज़ों को देखने की परंपरा के कारण कोई नई ज़मीन विकसित नहीं हो पा रही है. हालांकि इसमें कोई दोराय नहीं कि आंबेडकर की दृष्टि ने दलित ज्ञान के विस्तार में बहुत बड़ी भूमिका निभाई है.
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