2014: नारीवादी हिन्दी साहित्य

- Author, संजीव चंदन
- पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
यह देखना बेहद दिलचस्प है कि 2014 में हिन्दी में नारीवादी लेखन की गतिविधियाँ क्या हैं- ख़ासकर निर्भया कांड के दौरान 2012 में आंदोलित समाज के दो साल गुजा़र लेने के बाद.
यहाँ 2014 में आई पांच किताबों को देखते हैं और समझने की कोशिश करते हैं इस साल लेखन जगत में नारीवादी हस्तक्षेप को.
हाशिए उलांघती औरत

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शिल्पायन प्रकाशन से ‘हाशिए उलांघती औरत’ तीन खण्डों में प्रकाशित हुई है, जो 20वीं सदी से अब तक की पाँच पीढ़ियों की कहानियों का संकलन है.
‘कोठी में धान’, ‘खड़ी फसल’, और ‘नई पौध’ शीर्षक के अंतर्गत क्रमशः 1947 के पूर्व की रचनाकारों, 1947 के बाद की तीन पीढ़ियों की रचनाकारों और इस समय सक्रिय युवा लेखिकाओं की कहानियां इनमें संकलित हैं.
लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता रमणिका गुप्ता द्वारा प्रकाशित पत्रिका ‘युद्धरत आम आदमी’ के तीन विशेषांकों को इसमें पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया है.
इस शृंखला की सह-सम्पादक अर्चना वर्मा कहती हैं , "स्त्री जीवन अगर हमेशा हाशिए के बाहर बंद जीवन रहा है तो स्त्री कथा हमेशा हाशिए उलांघने की कथा रही है."
मीराबाई और भक्ति की आध्यात्मिक अर्थनीति

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लेखिका कुमकुम संगारी की यह किताब वाणी प्रकाशन से हिन्दी में अनुवाद होने के बाद आई है. अनुवाद किया है डॉक्टर अनुपमा गुप्ता ने.
कुमकुम संगारी ने अपनी विस्तृत विवेचना में मध्यकालीन सामंती समाज में भक्त कवयित्री मीराबाई के पदों में और उनके जीवन-चरित में स्त्री मुक्ति के संघर्ष को रेखांकित किया है. संगारी ने मीराबाई की सीमाओं को भी रेखांकित किया है.
वो बताती हैं कि कैसे मीराबाई की अभिव्यक्ति जाने–अनजाने पितृसत्ता की सोच से प्रभावित है, सांसारिक पुरुष वर्चस्व से छूटकर वह कृष्ण के रूप में आध्यात्मिक पुरुष वर्चस्व को स्वीकार लेती हैं.
टोकरी में दिगंत: थेरी गाथा 2014

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कवयित्री अनामिका का यह काव्य–संकलन ‘टोकरी में दिगंत: थेरीगाथा 2014’ राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है.
बौद्धकालीन थेरियों का रूपक और आधार लेकर इस संकलन में शामिल कविताएं विस्थापित स्त्रियों के दर्द, संघर्ष और जीवन की कविता कहती हैं.
संकलन का नारीवादी महत्व इस मायने में हैं कि महात्मा बुद्ध द्वारा संघ का दरवाजा खोल दिए जाने के बाद मुक्ति का अहसास करती थेरियां (बौद्ध भिक्षुणियां) कविताएं लिखती हैं, जिन्हें नारीवादी लेखक प्रकाश में लाए हैं.
औरत : तीन तस्वीरें

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सामयिक प्रकाशन से प्रकाशित यह किताब स्त्रियों की तीन तस्वीरें पेश करती है. इन्हें इतिहास और वर्तमान में सक्रिय स्त्रियों की भूमिका, उनके संघर्ष और अवदान को केन्द्र में रखकर पढ़ा और पेश किया गया है.
एक तो अपने हौसले के साथ पुरुषों की बराबरी करने वाली स्त्रियां..... दूसरी स्त्रियां जिन्होंने साहित्य, संस्कृति, राजनीति, उद्योग में अपनी सशक्त भूमिका निभाई है और मानवता के लिए अपनी प्रतिबद्ध लड़ाई के साथ हस्तक्षेप भी किया है. तीसरी छवियां उन स्त्रियों की हैं, जो प्रताड़ित हैं और अपने दुःखों से मुक्ति के लिए संघर्षरत हैं.
साहित्य की ज़मीन और स्त्री मन का उच्छवास

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वाणी प्रकाशन से प्रकाशित रोहिणी अग्रवाल की किताब में 19वीं–20वीं शताब्दी में सक्रिय नारीवादी विदुषियों और स्त्री समाज–सुधारकों से काल्पनिक बातचीत की शैली लिखे कई आलेख हैं.
पंडिता रमा बाई, रुक्माबाई, ‘सीमंतनी उपदेश’ की लेखिका एक अज्ञात हिन्दू स्त्री, इत्यादि के अलावा दुर्गा, पार्वती जैसे मिथकीय स्त्री चरित्रों से भी काल्पनिक बातचीत शामिल हैं.
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