साल 2013 की हिन्दी किताबें, कथाकारों की पसंद

- Author, रंगनाथ सिंह
- पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
साल 2013 की उल्लेखनीय किताबों की शृंखला की दूसरी कड़ी का मूल विचार थोड़ा अलग था लेकिन गल्प लेखकों पर केंद्रित होने के कारण यह विचार चला कहीं और के लिए, पहुँच कहीं और गया.
हमारे प्यारे लेखकों ने उनकी पसंदीदा किताबों की सूची माँगने पर क्या जवाब दिया यह तो आप आगे पढ़ेंगे ही, इसलिए अपनी तरफ़ से मैं इतना ही कहूँगा कि इन लेखकों ने चौहद्दी बनाने की हमारी हर कोशिश को विफल कर दिया.
और शायद लेखकों का काम भी यही है, चुनी हुई दीवारों या दीवारें चुनने की ऐसी कोशिशों को धराशायी कर देना.
प्रस्तुत है इस शृंखला की दूसरी कड़ी, 'कथाकारों की पसंद.'
अनिल यादव

- मेरी यादों का पहाड़- देवेंद्र मेवाड़ी- नेशनल बुक ट्रस्ट, दिल्ली
'मेरी यादों का पहाड़' इस साल आई किताबों में सबसे असाधारण है. 'पत्थर और पानी' के बाद यह पहला संस्मरण मैंने पढ़ा जिसमें पहाड़ पोस्टकार्ड पर छपे हिलस्टेशन की तरह नहीं एक धड़कते हुए जीवट समाज की तरह आया है. खास यह है कि पिछली सदी के पहाड़ की कठिन जिंदगी की जड़ों के साथ मिट्टी की तरह लिपटी उसकी भाषा भी अनायास चली आई है.
इस भाषा में घरों के आस-पास पालतू जानवरों और कुत्तों की घात में घूमते बाघ की गुर्राहट मट्ठा मथने वाली फिरकी की आवाज़ जैसी सुनाई पड़ती है. बाघ भी ठेठ घरेलू कारोबार का बस एक ज़रा ख़तरनाक हिस्सा है.
इतने ग़रीब, इतने हिम्मती लोग हैं जो कुछ पैसों के लालच में बाघ पकड़ने वाले पिंजरे में चारे की तरह बैठ जाते हैं. देवेंद्र मेवाड़ी ने जिस इंटेंसिटि के साथ जानवर, पर्वत, नदी और आदमी के साथ आदमी के संबंधों को नॉस्टैलजिक मूड में रचा है, उससे गुज़रना विरल अनुभव बन जाता है.
- ऑस्कर अवार्ड्स: यह कठपुतली कौन नचावे (सिनेमा)- रामजी तिवारी, द ग्रुप, ए सिनेमा इनिशिएटिव ऑफ़ जन संस्कृति मंच
'यह कठपुतली कौन नचावे' एक दुबली सी अल्प प्रचारित किताब है जो एक सचेत हिन्दुस्तानी दर्शक के नज़रिए से विश्व सिनेमा की अच्छी पड़ताल करती है. अपने कला विज़न और सरोकारों की ताकत के बूते रामजी ने कुछ अच्छी फिल्मों को ऑस्कर पाने वाली दोयम दर्जे की फिल्मों के बरअक्स रख कर शानदार ढंग से लिखा है.
- मस्तूलों के इर्द गिर्द- विमल चंद्र पांडेय, आधार प्रकाशन , हरियाणा
'मस्तूलों के इर्द गिर्द' विमल चंद्र पांडेय का कहानी संग्रह है. इसकी जिन कहानियों में किशोर पात्र आए हैं वहां सेक्सुअलिटी का कच्चा, दूधिया और तेजाबी बहाव है. जो पढ़े-लिखे पात्र हैं वे अपनी इंटलेक्चुअल रूढ़ियों और अदाओं में बिला गए हैं. हिन्दी पट्टी के टीनएजर्स के भीतर झांकने के लिए इन कहानियों को ज़रूर पढ़ा जाना चाहिए.
- नए युग में शत्रु - मंगलेश डबराल, (राधाकृष्ण प्रकाशन)
'नए युग में शत्रु' कवि मंगलेश डबराल का ताज़ा कविता संग्रह है, जिसमें ग्लोबलाइज़ेशन के बाद तेज़ी से बदले भारतीय समाज की शिनाख़्त की गई है. कविताओं में इस ज़माने का शत्रु निराकार, सर्वव्यापी, लगभग अविनाशी लगता है जिसने खुद को कंप्यूटरों, टेलीविजनों, मोबाइलों और आइपैडों की जटिल आंतों के भीतर फैला कर जड़ें जमा ली हैं.
- मोनिका कुमार की अनछपी कविताएं
इस साल पंजाब की कवयित्री मोनिका कुमार की अद्भुत कविताएं कुछ ब्लॉगों पर पढ़ने को मिलीं. मोनिका के पास विस्मय से डबाडब ऐसी आंख है जिसमें बनने वाले फफूंदी, ततैया, चींटियों, लकड़ी के सड़ते लट्ठों की परछाइयाँ विराट मानवीय रूपकों में बदल जाती हैं. उनके भीतर विश्वकविता जैसा कुछ है लेकिन पता नहीं क्यों उन्होंने लंबे समय से वेब, प्रकाशन और सार्वजनिक मंचों से दूरी बना रखी है. मैं मोनिका का लिखा हुआ कुछ भी पढ़ने के लिए हमेशा प्रतीक्षा करता रहता हूं.
प्रत्यक्षा

पुरुषोत्तम अग्रवाल का यात्रा संस्मरण 'हिंदी सराय: अस्त्राखान वाया येरेवान' (राजकमल प्रकाशन) पढ़ा जाना चाहिए.
'दर दर गंगे: अभय मिश्र, पंकज रामेंदु' (पेंगुइन बुक्स) यह किताब पढ़ी नहीं है लेकिन इसे पढ़ने वाली लिस्ट में होना चाहिए. कोई भी किताब जो नए अन्वेषण करती है, मुझमें पढ़ने की ललक जगाती है.
जब मुझे कहा गया कि वर्ष 2013 की उल्लेखनीय पुस्तकों के बारे में बात करूँ तो मैं पूरा एक दिन सोचती रही. ऐसा नहीं कि किताबें नहीं पढ़ीं लेकिन कोई बात तो होगी कि ऐसे तुरत सोचने पर एक भी ध्यान में नहीं आई.
इस साल की मेरी खोज की कौन किताब है ये कहना मुश्किल है. उम्मीद करती हूँ कि अगले साल ऐसी कोई किताब हिंदी में होगी जो बाहर और भीतर की यात्राओं के बारे में होगी , शायद विज्ञान फंतासी की कोई किताब हो, शायद पॉल ऑस्टर की कलेक्टेड प्रोज़ जिसमें उनकी ऑटोबायोग्राफ़िकल लेखनी, सच्ची कहानियाँ, क्रिटिकल लेख वगैरह हैं, जैसी कोई संपूर्ण सी किताब हो और हिंदी का कोई ग्राफ़िक उपन्यास हो. ये मेरी विशलिस्ट है, 2013 में ना सही शायद 2014 में पूरी हो.
प्रियंवद

इस वर्ष हिंदी में कोई उल्लेखनीय उपन्यास या कहानी संग्रह नहीं आया.
अलबत्ता चर्चा भी हुई है, पुरस्कार भी मिले हैं लेकिन उनके कारण दूसरे होते हैं.
साहित्य में निगाह ही तब रुकती है जब उसमें कोई नई बात होती है, भाषा के स्तर पर या किसी भी अन्य स्तर पर.
जिसको उल्लेखनीय कहा जाए, जिसको पढ़ कर सुख मिले ऐसी कोई किताब मेरी नज़र में नहीं आई.
जिसके बारे में ये कहा जा सके कि इसने कोई नई ज़मीन तोड़ी ऐसी कोई कृति हिन्दी में मुझे साल 2013 में नहीं दिखी.
उदय प्रकाश

समस्या मेरे साथ यह है कि किसी एक विधा की पांच पुस्तकें, जो इसी साल (2013) में पढ़ी गई हों और प्रिय तथा उल्लेखनीय हों, यह मुश्किल काम था. मैं इस वर्ष जो कुछ, गिनी-चुनी ‘हिंदी’ की पुस्तकें पढ़ सका और उनमें से जो, अलग-अलग वजहों से उल्लेखनीय लगीं, वे अलग-अलग विधाओं की हैं.
दूसरा महत्वपूर्ण तथ्य यह है, जिसकी अनदेखी नहीं करनी चाहिए, कि मेरे पास सिर्फ़ वही कुछ पुस्तकें पहुंच सकीं, जो या तो स्वयं उनके लेखकों-रचनाकारों ने भेजीं, या फिर उनके कहने पर, उन पुस्तकों के प्रकाशकों ने भेजीं. स्पष्ट है, मेरी पाठकीय प्रतिक्रिया की भी सीमा है. इसे इसी रूप में स्वीकार किया जाए.
- ‘सूखी हवा की आवाज़’ (कविता संग्रह) - भूपिंदर बराड़, आधार प्रकाशन, पंचकूला, हरियाणा.
भूपिंदर की कविताएं अपने लिए एक बिल्कुल अलग जगह बनाती हैं. चालीस-बयालीस साल पहले, जे.एन.यू. के युवा दिनों में, बहुत संकोच के साथ, कभी-कभी ही अपनी कविताओं को दोस्तों के सामने पढ़ने वाले भूपिंदर की कविताओं में विरल और ध्यान खींचती तल्लीनता है. पिता, मां, बीते हुए समय और छूट चुकी वस्तुओं को लेकर एक साथ लगाव और विरक्ति की रचनात्मकता उन्हें एक भिन्न और ज़रूरी हिंदी कवि बनाती है. असद ज़ैदी के मुताबिक, भूपिंदर की कविताओं में चित्रकार वाली तन्मयता और स्टिल फ़ोटोग्राफ़र वाली सतर्कता एक साथ है. उदाहरण के लिए एक कविता :
'पहले मरीं उम्मीदें घर लौटने की/ फिर मरा वह, घर से बहुत दूर/ अंत में प्यार मरा उस भली औरत का/आंखें खो बैठी थी जो उसकी राह तकते हुए.‘
- ‘सेप्पुकु’ (लघु उपन्यास) - विनोद भारद्वाज, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली.
जाने-माने कला समीक्षक और आठवें दशक की कवि पीढ़ी के उल्लेखनीय कवि विनोद भारद्वाज का यह पहला उपन्यास, दिल्ली के कलाबाज़ार के अब तक छुपे सच को सामने लाता है. यह एक तरह से राजधानी के ग्लोबल आर्ट-मार्केट का ‘स्टिंग-आपरेशन’ है.
ईमानदार और विलक्षण कलाकारों की असफलताओं, हताशाओं की मार्मिक त्रासदी और सोशलाइट-संपर्कवादी कलाकारों की कामयाबी की ऐसी तेज़ रफ़्तार किस्सागोई विख्यात कथाकार मनोहरश्याम जोशी के लघु-उपन्यास ‘हमज़ाद’ का स्मरण कराती है, जिसमें ‘बॉलीवुड’ के अंडरवर्ल्ड के पतित यथार्थ का साहसिक बयान था.
‘सेप्पुकु’ दिल्ली के अभिजात वर्ग की ‘पेज–थ्री’ वाली सेक्स, शराब और हत्या-आत्महत्या की जुगुप्सा को सार्वजनिक करती है. (वैसे ‘सेप्पुकु’ आत्मघात की एक जापानी परंपरा है, ‘हाराकीरी’ की तरह). विनोद भारद्वाज का यह लघु-उपन्यास अपने अश्लील और वर्जनीय हो जाने का जोखिम उठाते हुए, निर्मम ठग बाज़ार के सामने सच्चे कलाकार के आत्मघात के कई दारुण किस्से बयाँ करता है.
- सुनो चारुशीला’ (कविता संग्रह) - नरेश सक्सेना, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली
नरेश सक्सेना की कविताएं अपनी एक अलग पहचान और जगह बहुत पहले से बना चुकी हैं. लगभग हर महत्वपूर्ण आलोचक और कवि ने उनकी कविताओं की विशिष्टताओं के बारे में लिखा है. कविता में शब्दों की किफ़ायत और गहरी सटीक (प्रिसाइज़) अभिव्यक्ति के वे सबसे अलग कवि हैं.
अगर उनको हिंदी कविता का बर्तोल्त ब्रेष्ट कहा जाता है, तो इसे मान लेने का मन होता है. फ़िल्म, नाटक, संगीत, साइंस और इंजीनियरिंग की प्रतिभाओं ने उनकी रचनाओं को कुछ ऐसा दिया है, जिसे कहीं किसी दूसरे कवि में खोज़ पाना कठिन है. उदाहरण के लिए ये दो कवितांश:
‘जिसके पास चली गयी मेरी ज़मीन / उसी के पास अब मेरी / बारिश भी चली गयी ….‘ और ‘सीढ़ियां चढ़ते हुए / जो उतरना भूल जाते हैं/ वे घर नहीं लौट पाते ….‘
- जीने के लिए - सरिता शर्मा, सामयिक बुक्स, नई दिल्ली
ऐसे समय में जब ‘हिंदी’ में स्त्री के जीवन का कोई भी वृत्तांत स्त्री-वादी विमर्श की सैद्धांतिकियों के अनेक आग्रहों और सतर्क, स-प्रयास (डेलिबेरेट) लेखन को बहुतायत में समर्पित हो चुका है, सरिता शर्मा का यह आत्मकथात्मक उपन्यास उनके अपने जीवन के विकट-कठिन अनुभवों और पलों को, भले ही अनगढ़ गद्य के मार्फत व्यक्त करता हो, लेकिन उनकी पारदर्शिता और प्रामाणिकता इस उपन्यास को बेहद पठनीय बनाती है और एक किसी स्त्री जीवन के प्रति संवेदनशील बनाती हैं. सबसे मुख्य बात यह है कि सरिता शर्मा ने इस उपन्यास में कहीं ‘पर्सनली-पॉलिटकली करेक्ट’ रहने की प्रचलित लेखकीय मानसिकता की अधिक परवाह नहीं की है.
- विचारधारा, नये विमर्श और समकालीन कविता - जितेंद्र श्रीवास्तव, किताबघर प्रकाशन, नई दिल्ली
यह मेरी निजी सीमा है कि मैं ‘हिंदी’ की आलोचना पुस्तकें नहीं पढ़ता क्योंकि उनमें ऐसा कुछ होता नहीं, जो पूर्वप्रत्याशित न हो. बौद्धिक और अकादमिक ह्रास का यदि कोई सबसे प्रामाणिक उदाहरण जुटाना चाहे तो, हिंदी की आलोचना पुस्तकें हर लाइब्रेरी में सरकारी खरीद योजना की ‘सब्सिडी’ की वजह से अपार तादाद में मौजूद हैं. इन्हें हिंदी विभाग के शोधार्थियों या किन्हीं हिंदी प्रक्षेत्र के राजनीतिक-लेखक संगठन के सदस्यों के अलावा शायद ही कोई पढ़ता हो. फिर भी युवा आलोचक जितेंद्र श्रीवास्तव की यह पुस्तक पढ़ गया.
आज से लगभग सौ साल पहले, साल 1914 में, सरस्वती में प्रकाशित ‘हीरा डोम’ की दलित कविता से लेकर आज के चर्चित युवा कवि विमलेश त्रिपाठी और मनोज झा तक की कविताओं पर उनके द्वारा की गईं संक्षिप्त टिप्पणियां या ‘रिव्यूज़’ कविता के बदलते सौंदर्यशास्त्र को बदलते हुए सामाजिक संदर्भों के बरक्स रख कर देखते हैं.
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