साल 2013 की हिंदी किताबें कवियों की नज़र से

कविता, कवि, किताब 2013
    • Author, रंगनाथ सिंह
    • पदनाम, बीबीसी हिन्दी डॉटकॉम के लिए

किसी भी देश-काल में कविताओं के बारे में विशेषज्ञ राय देना सबसे जोखिम भरा होता है. कवि और पाठक दोनों के लिए कविता एक भावुक मसला है.

एक आलोचक ने लिखा है कि कविता होना ही प्रंशसा किए जाने के लिए काफ़ी है, तो कई पाठक यह कहते सुने जाते हैं कि अगर कविता आला दर्जे की न हो तो उसका होना बेकार है.

इन सभी अगर-मगर के बावजूद कविता को इस शृंखला में आना ही था और अब वह आ भी गई है. पेश है इस शृंखला की चौथी कड़ी, कवियों की पसंद.

बद्री नारायण

बद्री नारायण, कवि एवं समाजशास्त्री
इमेज कैप्शन, बद्री नारायण, कवि एवं समाजशास्त्री

वर्ष 2013 में मैंने अनेक महत्वपूर्ण कविता संकलन पढ़े. उनमें से कुछ मेरे मानस पटल पर महत्वपूर्ण ढंग से अंकित हो गए. उनमें से ऐसे कुछ कविता संकलनों की चर्चा मैं कर रहा हूं.

केदारनाथ सिंह का कविता संकलन ‘सृष्टि पर पहरा’ 2013 के अंत में छपकर आ गया था. हालांकि उस पर तिथि 2014 की छपी है. लेकिन यह संकलन आज के समाज में मानुष, मूल्य एवं संस्कृति के बड़े सवाल उठाती है. केदार जी की इन कविताओं में आम आदमी के दैनंदिन जीवन एवं बड़े मानवीय मूल्य जगत दोनों का गहन संवाद दिखाई पड़ता है.

ऋतुराज का कविता संकलन ‘स्त्री वग्ग’ भी मुझे बहुत पसंद आया क्योंकि इसमें स्त्री प्रश्नों को समाज के बड़े प्रश्नों से जोड़कर देखा गया है. स्त्री को इसमें सेक्लुडेड स्पेस में नहीं देखा गया है.

मंगलेश डबराल का संकलन ‘नये युग में शत्रु’ में भी अनेक अच्छी कविताएं संकलित हैं. हालांकि इसमें संकलित कई कविताएं बहुत सामान्य कोटि की हैं.

एकान्त श्रीवास्तव का कविता संकलन ‘धरती अधखिला फूल है’ जंगल से लेकर मेट्रोपोल तक के जीवन की आलोचनात्मक समझदारी रखते हुए अच्छी कविता बनाने की एक कोशिश के रूप में देखी जा सकती है.

लीलाधर जगूड़ी का कविता संकलन ‘जितने लोग, उतने प्रेम’ भी मुझे पसंद आया क्योंकि इसमें संकलित कविताओं के सांस्कृतिक स्रोत अत्यन्त गहन हैं.

साल 2013 में पढ़े दो संकलन ज्ञानेंद्र पति का ‘मनु को बनाती मनई’ एवं जीतेंद्र श्रीवास्तव का ‘कायान्तरण’ भी मेरे मानस पटल पर अंकित हैं. हालांकि जीतेंद्र का संकलन साल 2012 के अंत में बाज़ार में आया था.

चंद्र भूषण

चंद्र भूषण, कवि एवं पत्रकार
इमेज कैप्शन, चंद्र भूषण, कवि एवं पत्रकार

बीते साल हिंदी में कई बहुत अच्छी कविताओं को पढ़ने और सुनने का मौका मिला, लेकिन उनमें से कोई भी अभी संकलन की शक्ल में नहीं आ सकी है.

आमतौर पर संकलन के बजाय कविताओं पर केंद्रित पत्रिकाएं इनका अच्छा स्रोत हुआ करती हैं, लेकिन उनके आने का कोई ठिकाना नहीं होता. मसलन, मैं ‘तनाव’ का इंतज़ार करता हूं और पिछले साल दोबारा शुरू हुई अनियतकालीन पत्रिका ‘कवि’ की भी मैं आगे शिद्दत से बाट जोहता रहूंगा. संकलन पढ़ने के बारे में वैसे भी मेरी सीमा है. पूरे साल में जो संकलन देख सका हूँ, उनमें से दो का उल्लेख यहां कर रहा हूं.

  • यात्रा में कविताएं : विष्णुचंद्र शर्मा, संकल्प प्रकाशन, छत्तीसगढ़

घुमक्कड़ी का मज़ा वैसे तो गद्य में ही लिया जा सकता है, लेकिन एक घुमक्कड़ी कवि की भी हुआ करती है. यूरोप और दोनों अमेरिकी महाद्वीपों के कई मुल्कों में टहल आए विष्णुचंद्र शर्मा के यहां भूगोल और इतिहास कम है, लेकिन इंसानों के मन की गज़ब की पड़ताल है, जो अपनी बुनियादी बुनावट में हर जगह कमोबेश एक सा ही हुआ करता है. बुरे लोग, बुरी चीज़ें उनके यहां अमूर्त और छिछली हैं. इससे कुछ एकरसता भी बनती है, लेकिन कुछ बात उनमें है, जिससे एक पवित्रता का सा अहसास होता है.

  • नए युग में शत्रु : मंगलेश डबराल, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली

मंगलेश डबराल अपनी हालिया कविताओं में कुछ नए सवालों के जवाब खोजने की कोशिश में हैं. यह कवि का वैचारिक उद्यम है और खासकर शीर्षक कविता में यह सार्थक भी हुआ है. इस सीरीज़ की बाकी कविताएं दिल से ज्यादा नहीं सटीं लेकिन संकलन को पीछे से पढ़ना शुरू किया, तो पांच-दस साल पहले की कविताओं में वही पुराने मंगलेश डबराल दिखे. एकालाप के ढब में अपने भीतर उतरते जाने और किसी गहरे बिंदु से दुनिया को देखने में उनका कोई सानी हमारी भाषा के अंदर नहीं है. नए सवालों का जवाब उनसे इसी ढब में सुनने का इंतज़ार रहेगा.

विष्णु खरे

विष्णु खरे, हिन्दी लेखक
इमेज कैप्शन, विष्णु खरे, वरिष्ठ कवि एवं आलोचक

दुर्भाग्यवश, अपेक्षाकृत युवा कवि-द्वय पवन करण (कोट के बाज़ू पर बटन) और यतींद्र मिश्र (विभास) को छोड़कर 2013 में 'नए' रचनाकारों के उल्लेख्य संग्रह कम ही आए.

परिदृश्य पर ऋतुराज, कमलेश, प्रभात त्रिपाठी, लीलाधर जगूड़ी, मंगलेश डबराल और सविता सिंह (स्वप्न समय) जैसे कवि ही दिखाई दिए.

देर से ही सही, कमलेश की 'प्रोफ़ाइल' गाँव-शहर-राजनीति-मिथक वाले एक चर्चित-विवादास्पद कवि की बन रही है.

जगूड़ी (जितने लोग उतना प्रेम) और डबराल (नए युग में शत्रु) अपनी सुपरिचित निजी-सामाजिक-राजनीतिक ज़मीन पर क़ाबिज़ हैं, लेकिन कथ्य-भाषा-शैली नई पहचान बनाना नहीं चाहते.

प्रभात में एकाध कौंध दिखाई दे जाती है, लेकिन वह भी 'जहाँ हैं, जैसे हैं' से तुष्ट हैं. ज्ञानेंद्रपति (मनु को बनाती मनई) अब भी अपाठ्यता का जोखिम उठाते हुए भाषा को तोड़ते-गढ़ते जा रहे हैं जबकि ऋतुराज (स्त्रीवग्ग) ने स्त्रियों पर पवन करण से अलग लिखकर एक ज्ञापन दिया है. अलबत्ता सविता सिंह ने विकसित होते हुए अपने मुक़ाम को पुख्ता किया है.

एक महत्वपूर्ण 'डेवलपमेंट' यह है कि कई युवा, बल्कि एकदम नए, कवि-कवयित्रियों की बेहतर रचनाएँ अब खड़ूस पत्र-पत्रिकाओं-संपादकों-प्रकाशकों-आलोचकों की मुहताज नहीं रहीं, वे लगभग नियमित रूप से इस या उस ब्लॉग पर दिखाई दे रही हैं, इसलिए आज सिर्फ़ मुद्रित संग्रह पढ़कर कम-से-कम (युवा) हिंदी कविता के बारे में बहुत अक़्लमंद या विश्वसनीय नहीं कहा जा सकता.

<bold>(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए <link type="page"><caption> यहां क्लिक</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/multimedia/2013/03/130311_bbc_hindi_android_app_pn.shtml " platform="highweb"/></link> करें. आप हमें <link type="page"><caption> फ़ेसबुक</caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi " platform="highweb"/></link> और <link type="page"><caption> ट्विटर</caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi " platform="highweb"/></link> पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)</bold>