गैस लग गई.....थोड़ा पानी चाहिए

    • Author, रूपा झा
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब देश भर में स्वच्छ भारत अभियान की शुरुआत की, तो मुझे रेवा राम का चेहरा याद आ रहा है.

क़रीब पांच साल पहले मैं रेवा राम से मिली थी, 45 साल की उम्र, रेत में धंसा हुआ सा चेहरा, शीशे सी बुझी वो आंखें, छोटा क़द और दुबली-पतली काया.

वो एक आम सा दिन था और रेवा राम भी हर दिन की तरह अपने काम के लिए तैयार थे. पर मुझे मालूम नहीं था कि मैं जो देखने जा रही थी, वो दृश्य मुझे इतना ज़्यादा शर्मिंदा कर देगा.

दिल्ली की एक पॉश कॉलोनी में बंद पड़े एक मैन होल का ढक्कन जैसे ही उन्होंने खोला, मुझे भयंकर दुर्गंध से उबकाई आने लगी.

लेकिन रेवा राम नंगे बदन, बिना किसी 'मास्क' या 'बॉडी सूट' के नीचे उतरे उस कीचड़ को साफ़ करने.

उन्होंने घोड़े की लगाम की तरह एक रस्सी अपने बदन पर बांधी थी जिसका एक सिरा उनके दूसरे साथियों ने बाहर से पकड़ रखा था.

'गैस लग गई...थोड़ा पानी चाहिए'

इमेज स्रोत, AP

मैनहोल का दायरा इतना छोटा था कि उसकी गंदी दीवारों से रगड़ खाकर ही रेवा राम उसमें उतर सके. दीवारों पर बडे तिलचट्टे... चारों तरफ़ ऐसी बदबू, सर चकरा देने वाली दूषित गैस थी.

मै देख पा रही थी रेवा राम आठ फ़ुट गहरे मैनहोल मे लगातार खांस रहे थे और गंदगी हाथों से निकाल, बाहर लोगों को पकड़ा रहे थे.

इमेज स्रोत, BBC Imran Qureshi

अचानक बगल के किसी आलीशान घर से किसी ने फ्लश किया होगा कि मल से भरा पानी उनके सिर पर गिरने लगा. कुछ पल मे ही वे उससे लथपथ हो गए. उनकी सांसे फूलने लगीं, आँखें जलने लगीं, उन्हें खीच कर बाहर निकाला गया. वे खाँसते हुए कह रहे थे.. 'गैस लग गई ...थोड़ा सा पानी चाहिए.'

'कुलीनता की हिंसा'

शायद चेहरे पर पानी के छींटे पड़ते तो उन्हें बेहतर महसूस होता. उनके दोस्तों ने पड़ोस के बडे घरों के आलीशान दरवाज़ों को पीटना शुरु किया. लेकिन मुझे आश्चर्य नहीं हुआ कि दरवाज़े नहीं खुले.

मुझे केवल शर्म आई कि ये सच मेरे सामने था, 21वीं सदी की एक आम दोपहर में. कुलीनता की हिंसा क्या होती है, तब मुझे समझ में आया.

इमेज स्रोत, PTI

रेवा राम दिल्ली महानगर के सीवरों, मेनहोल्स की सफ़ाई करने वाले कुछ हज़ार बेलदारों में से एक थे और दिल्ली जल बोर्ड के कर्मचारी थे.

घरों के कचरे, लोगों के मल-मूत्र, कारखानों की गंदगी, ये सब इन सीवरों में बहता है और जब कचरे से ये भरने लगता है तो बेलदारों को बिना किसी सुरक्षा उपकरणों के इन नालों के, मेनहोल्स के भीतर जाना पड़ता है.

बेलदारों को सीवरों में मीथेन और हाईड्रोजन सल्फ़ाईड जैसी दूषित गैसों के संपर्क मे लगातार आना पड़ता है जिससे उन्हें चर्म रोग, सांस की बीमारी, सिरदर्द और अन्य कई तरह की बीमारियां हो जाती हैं

'हमारी जात तो सदियों से करती आई है'

सरकार दावा करती रही है कि बेलदार केवल आपात स्थिति में ही इन मेनहोल्स या सीवर पाईपों की सफ़ाई करते हैं लेकिन शायद ये सच भी किसी से छिपा नहीं कि दिल्ली जैसे महानगर में हर दिन आपात स्थिति की तरह ही होता है.

सरकारी एजेंसियां ये भी दावा करती हैं कि बेलदारों के लिए सुरक्षा के सभी उपकरण मौजूद हैं.

इमेज स्रोत, PTI

मैने खांसते और कीचड़ में फंसे रेवा राम से पूछा था, "आपको ग़ुस्सा नहीं आता कि ये काम आपको करना पड़ता है."

जवाब था, "नहीं मैडम. कम से कम सरकारी नौकरी है. अनपढ़ हूं और करूंगा भी क्या? फिर हमारी जात तो सदियों से ये काम करती रही है."

<bold>(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए <link type="page"><caption> यहां क्लिक</caption><url href="https://play.google.com/store/apps/details?id=uk.co.bbc.hindi" platform="highweb"/></link> करें. आप हमें <link type="page"><caption> फ़ेसबुक</caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi" platform="highweb"/></link> और <link type="page"><caption> ट्विटर</caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi " platform="highweb"/></link> पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)</bold>