समलैंगिक विवाह पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई करने वाले पांचों जज हैं कौन?

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- Author, सुचित्रा मोहंती
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस डॉ धनंजय यशवंत चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली पांच जजों की संविधान पीठ ने भारत में समलैंगिक शादियों को क़ानूनी मान्यता देने की मांग करने वाली याचिकाओं पर 18 अप्रैल से सुनवाई शुरू की.
अदालत में आज की बहस पूरी हो गई है और अब बुधवार को फिर से बहस होगी.
संविधान पीठ के सामने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता केंद्र सरकार का पक्ष रख रहे हैं, जबकि याचिकाकर्ताओं का पक्ष वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी पेश कर रहे हैं.
आज की बहस में केंद्र ने इस सुनवाई का विरोध करते हुए कहा कि नए सामाजिक संबंधों पर फ़ैसला करने का हक़ केवल संसद को है. उसने ये भी कहा कि याचिकाकर्ता इस देश के विचारों का प्रतिनिधित्व नहीं करते.
इससे पहले, सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने 2018 में समलैंगिक रिश्तों को अपराध की श्रेणी से बाहर करने वाला ऐतिहासिक फ़ैसला दिया था. उसके बाद से भारत में समलैंगिक विवाह को क़ानूनी आधार देने की मांग पुरजोर ढंग से उठाई जाने लगी.
इस दिशा में सुप्रीम कोर्ट समेत देश की तमाम अदालतों में भी याचिकाएं दायर की गईं. हालांकि, भारत सरकार से लेकर तमाम धार्मिक संगठन इन मांगों के पक्ष में नहीं हैं.
सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ ने इन याचिकाओं को संविधान पीठ को सौंपने की सिफ़ारिश की. इसे देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य न्यायाधीश के नेतृत्व में पाँच जजों की एक संविधान पीठ बनाई.
इस पीठ के अन्य चार जजों में जस्टिस संजय किशन कौल, जस्टिस एस रवींद्र भट्ट, जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस हिमा कोहली हैं. इन सभी पाँच जजों का क़ानूनी करियर काफ़ी लंबा रहा है.
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- सितंबर 2018 में सुप्रीम कोर्ट की पाँच सदस्यों की पीठ ने समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से हटा दिया.
- अदालत के अनुसार, आपसी सहमति से दो वयस्कों के बीच बनाए गए समलैंगिक संबंधों को अब अपराध नहीं माना जाएगा.
- सीजेआई जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने इस फ़ैसले के बाद कहा कि समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से बाहर करने भर से समानता नहीं आ जाएगी, इसे हर जगह ले जाना होगा.
- उसी समय समलैंगिक विवाह को मान्यता देने की कई याचिकाएँ अदालतों में आईं. सुप्रीम कोर्ट ने इन याचिकाओं को संविधान पीठ को सौंप दिया.
- इन याचिकाओं की सुनवाई करने वाली सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ ने समलैंगिक विवाह को 'मौलिक मुद्दा' बताते हुए इसे पाँच जजों की संविधान पीठ को भेजने की सिफ़ारिश की थी.
- हालांकि देश के कई धार्मिक संगठनों ने इसका विरोध किया है. इन धार्मिक संगठनों का कहना है समलैंगिक विवाह अप्राकृतिक हैं.
- वहीं समलैंगिक अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठनों का कहना है कि उन्हें भी कुदरत ने ही बनाया है और वे अपने अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ते रहेंगे.
- अब 18 अप्रैल से सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ इस मामले की सुनवाई शुरू करेगी.


1. मुख्य न्यायाधीश जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़
जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ को संवैधानिक अधिकारों और अभिव्यक्ति की आज़ादी के अधिकार की रक्षा करने वाले न्यायाधीश के तौर पर जाना जाता है. वो मानते हैं कि LGBTQ+ समुदाय को भी बराबरी का हक़ है.
बतौर वकील जस्टिस चंद्रचूड़ के सबसे अहम मुक़दमे संवैधानिक और प्रशासनिक क़ानूनों से जुड़े रहे हैं. इसके अलावा उन्होंने एड्स पीड़ित कार्यकर्ताओं, धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों के अधिकारों और श्रम एवं औद्योगिक क़ानूनों के मामलों की भी वकालत की है.
आधार मामले में जस्टिस चंद्रचूड़ ने फ़ैसला दिया था कि इसके क़ानून को असंवैधानिक तरीक़े से वित्त विधेयक के तौर पर पारित किया गया. उन्होंने इस क़ानून के कुछ ख़ास प्रावधानों की भी समीक्षा की, जो लोगों की निजता, सम्मान और स्वायत्तता से जुड़े थे.
चर्चित नवतेज जोहार केस में जस्टिस चंद्रचूड़ ने समलैंगिकता को अपराध बताने वाली भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 377 (अप्राकृतिक यौन संबंध) को रद्द करते हुए समलैंगिक यौन संबंध को क़ानूनी मान्यता दे दी थी. अपने फ़ैसले में जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा था कि IPC की धारा 377 'एक पुराना पड़ चुका औपनिवेशिक क़ानून' है.
सबरीमाला मंदिर मामले में जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा था कि 10 से 50 बरस की महिलाओं को सबरीमाला मंदिर में प्रवेश करने से रोकना संवैधानिक नैतिकता के ख़िलाफ़ है. उन्होंने ये भी कहा था कि इससे महिलाओं की स्वायत्तता, आज़ादी और सम्मान को ठेस पहुंचती है.
भीमा कोरेगांव हिंसा में पांच मानव अधिकार कार्यकर्ताओं की गिरफ़्तारी से जुड़े रोमिला थापर केस में जस्टिस चंद्रचूड़ ने बेंच से अलग फ़ैसला दिया था. अपने फ़ैसले में जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा था कि यहां सवाल इस बात का है कि क्या इन अभियुक्तों की गिरफ़्तारी, संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 के अभिव्यक्ति की आज़ादी और निजी स्वतंत्रता के बुनियादी अधिकारों का उल्लंघन करती है.
जोसेफ़ शाइन केस में चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ ने पीठ के बहुमत वाले फ़ैसले से सहमति जताते हुए व्याभिचार को अपराध की श्रेणी से हटा दिया था.
मुहम्मद ज़ुबैर के मामले में भी जस्टिस चंद्रचूड़ ने उन्हें ज़मानत देते हुए कहा था कि गिरफ़्तारी के अधिकार को बहुत सोच-समझकर इस्तेमाल किया जाना चाहिए. अगर किसी इंसान के ख़िलाफ़ ठोस सुबूत नहीं हैं, तो उसे हिरासत में रखने को वाजिब नहीं ठहराया जा सकता.
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कौन हैं जस्टिस चंद्रचूड़?
जस्टिस चंद्रचूड़ 2022 में पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस उदय उमेश ललित के रिटायर होने के बाद सीजेआई बने थे. वे 10 नवंबर, 2024 को रिटायर होने तक इस पद पर बने रहेंगे.
पिछले साल 9 नवंबर को उस वक़्त इतिहास रचा गया था, जब जस्टिस चंद्रचूड़ ने भारत के 50वें मुख्य न्यायाधीश के तौर पर पद की शपथ ली थी. देश के इतिहास में ये पहला मौक़ा था, जब पिता के बाद बेटा मुख्य न्यायाधीश बना था.
उनके पिता जस्टिस वाईवी चंद्रचूड़ 1978 में देश के 16वें मुख्य न्यायाधीश बने थे. वो अब तक के सबसे लंबे यानी सात साल के कार्यकाल वाले चीफ जस्टिस रहे और 1985 में रिटायर हुए.
जस्टिस चंद्रचूड़ ने एलएलबी की पढ़ाई दिल्ली यूनिवर्सिटी से पूरी की. इसके बाद उन्हें प्रतिष्ठित इनलैक्स स्कॉलरशिप मिल गई थी, जिसके बाद वो आगे की पढ़ाई के लिए हार्वर्ड यूनिवर्सिटी चले गए. हार्वर्ड से उन्होंने मास्टर्स इन लॉ (LLM) और डॉक्टरेट इन जुडिशियल साइंसेज़ (SJD) की पढ़ाई पूरी की.
जज नियुक्त होने से पहले उन्होंने सुप्रीम कोर्ट और गुजरात, कलकत्ता, इलाहाबाद, मध्य प्रदेश और दिल्ली के उच्च न्यायालयों में वकालत की.
1998 में बॉम्बे हाई कोर्ट ने जस्टिस चंद्रचूड़ को सीनियर एडवोकेट का दर्जा दिया था. 1998 से 2000 तक वो भारत के एडिशनल सॉलिसिटर जनरल रहे.
29 मार्च, 2000 को उन्हें बॉम्बे हाई कोर्ट में एडिशनल जज नियुक्त किया गया था. 31 अक्टूबर, 2013 को उन्होंने इलाहाबाद हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश पद की शपथ ली.
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2. जस्टिस संजय किशन कौल
जस्टिस संजय किशन कौल ने बतौर वकील मुख्यत: कारोबारी, सिविल मामले और कंपनी अधिकार के मामलों की पैरवी की थी.
वे साल 2017 में सुप्रीम कोर्ट के नौ जजों की संविधान पीठ के अहम सदस्य रहे, जिसने निजता को बुनियादी अधिकार माना. ये फ़ैसला भारत के संवैधानिक न्याय के इतिहास में एक मील का पत्थर रहा है.
दिल्ली हाई कोर्ट के जज के तौर पर जस्टिस कौल ने मशहूर पेंटर मक़बूल फ़िदा हुसैन के ऊपर लगाए गए आरोपों को ख़ारिज कर दिया था. हुसैन पर एक महिला की अश्लील तस्वीर बनाने का इल्ज़ाम था, जिसे बाद में 'भारत माता' कहा गया. जस्टिस कौल ने अपने फ़ैसले में कहा था कि हुसैन की पेंटिंग में दिखाई गई महिला 'एक परेशान महिला के तौर पर एक राष्ट्र की अभिव्यक्ति थी.'
जस्टिस कौल ने अभिव्यक्ति और बोलने की आज़ादी के अधिकार पर मुहर लगाई थी. उन्होंने एमएफ हुसैन के उस तर्क से सहमति जताई कि उन्होंने इस आधार पर जान-बूझकर किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने की कोशिश नहीं की थी.
जस्टिस कौल ने 2017 में नए दिवालिया क़ानून (इनसॉल्वेंसी ऐंड बैंकरप्सी कोड 2016) के तहत इनोवेटिव इंडस्ट्रीज़ बनाम आईसीआईसीआई बैंक के मामले में फ़ैसला सुनाया था.
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कौन हैं जस्टिस कौल?
जस्टिस संजय किशन कौल ने 1979 में दिल्ली यूनिवर्सिटी के सेंट स्टीफेंस कॉलेज से अर्थशास्त्र में ऑनर्स की पढ़ाई पूरी की थी. इसके बाद उन्होंने 1982 में दिल्ली यूनिवर्सिटी से एलएलबी की डिग्री हासिल की. उसी साल उन्होंने दिल्ली से वकालत का अपना करियर शुरू किया.
वे 1987 में सुप्रीम कोर्ट में एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड बन गए और दिसंबर 1999 में उन्हें सीनियर एडवोकेट का दर्जा मिल गया था.
तीन मई 2001 को जस्टिस कौल को दिल्ली हाई कोर्ट में एडिशनल जज नियुक्त किया गया और दो मई 2003 को उन्हें स्थायी जज बनाया गया. उसी साल सितंबर में जस्टिस कौल ने कुछ समय के लिए दिल्ली हाई कोर्ट के कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश की ज़िम्मेदारी भी संभाली थी.
इसके बाद 2013 में जस्टिस कौल को पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट का मुख्य न्यायाधीश बनाया गया. जुलाई 2014 में जस्टिस संजय किशन कौल का तबादला मद्रास हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस के तौर पर कर दिया गया था.
जस्टिस संजय किशन कौल इस साल 25 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट से रिटायर होंगे. उन्हें थिएटर, संगीत और गोल्फ में गहरी दिलचस्पी रही है.
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3. जस्टिस एस रवींद्र भट्ट
दिल्ली हाई कोर्ट के जज के तौर पर जस्टिस भट्ट ने कुछ ऐतिहासिक फ़ैसले दिए, जो बौद्धिक संपदा अधिकार (IPR), ड्रग रेग्यूलेशन और सूचना के अधिकार से जुड़े हुए थे.
रोशे बनाम सिप्ला के मामले में जब रोशे की तरफ़ से अंतरिम रोक की अपील की गई थी, तो जस्टिस भट्ट ने इसे जनहित के ख़िलाफ़ बताते हुए रोशे की अपील ख़ारिज कर दी.
ये मामला जेनेरिक दवाएं बनाने वाली कंपनी सिप्ला के ख़िलाफ़ था, जिसमें रोशे ने अपने पेटेंट के उल्लंघन का आरोप लगाया था.
ऐसे मामलों में अंतरिम रोक लगा देने के चलन के ख़िलाफ़ जाते हुए, जस्टिस रवींद्र भट्ट ने रोशे को इस आधार पर अंतरिम रोक लगाने से मना कर दिया कि चूंकि रोशे और सिप्ला की दवाओं की क़ीमत में भारी अंतर है, तो अंतरिम रोक लगाने से जनता के हितों को चोट पहुंचेगी.
जस्टिस रवींद्र भट्ट ने एक और उल्लेखनीय फ़ैसला सीपीआईओ बनाम सुभाष चंद्र अग्रवाल के केस में दिया था.
इस फ़ैसले में जस्टिस भट्ट ने कहा था कि भारत के मुख्य न्यायाधीश का पद सूचना के अधिकार क़ानून के दायरे में आता है. इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में अपील की गई. अंतत: सुप्रीम कोर्ट ने भी जस्टिस भट्ट के फ़ैसले पर कुछ शर्तों के साथ सहमति जता दी थी.
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कौन हैं जस्टिस भट्ट?
जस्टिस श्रीपति रवींद्र भट्ट दिल्ली यूनिवर्सिटी के 1982 बैच के लॉ के छात्र रहे हैं. एलएलबी की पढ़ाई पूरी करने के बाद जस्टिस भट्ट ने दिल्ली हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में वकालत शुरू की थी.
जज के तौर जस्टिस भट्ट की छवि एक ऐसे न्यायाधीश की रही है जो अभिव्यक्ति और बोलने की आज़ादी के समर्थक रहे हैं.
हालांकि वो बेहद सख़्त जज माने जाते रहे हैं, लेकिन ज़रूरतमंदों और आम आदमी के मामलों में उन्होंने उनके हक़ में फ़ैसले दिए हैं.
जस्टिस भट्ट को बौद्धिक संपदा अधिकार (आईपीआर) से जुड़े उनके फ़ैसलों के लिए जाना जाता है. वकील के तौर पर उनका ज़ोर सार्वजनिक क़ानूनों, शिक्षा, श्रम और सेवाओं और अप्रत्यक्ष कर से जुड़े मामलों पर रहा.
22 साल तक वकालत करने के बाद, उन्हें वर्ष 2004 में दिल्ली हाई कोर्ट में एडिशनल जज नियुक्त किया गया था.
दो साल बाद उन्हें दिल्ली हाई कोर्ट में ही स्थायी जज बनाया गया था, जहां वो 2019 तक रहे. मई 2019 में उन्हें राजस्थान हाई कोर्ट का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया गया था.
जस्टिस रवींद्र भट्ट इस साल 20 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट से रिटायर होने वाले हैं.
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4. जस्टिस पीएस नरसिम्हा
जस्टिस पामीदिगंतम श्री नरसिम्हा ने सेना और वायुसेना में अग्निपथ योजना के एलान के पहले से चल रही भर्ती प्रक्रियाओं को पूरा करने की मांग करने वाली याचिकाओं को ख़ारिज कर दिया था.
अग्निपथ योजना आने के बाद भर्ती की ये प्रक्रियाएं रद्द कर दी गई थीं.
अपने एक और फ़ैसले में जस्टिस नरसिम्हा ने नेशनल ग्रीन ट्राइब्यूनल द्वारा यूपी सरकार पर ग़ैर-शोधित सीवेज बाहर निकालने पर लगाए गए 120 करोड़ रुपए के जुर्माने को रद्द कर दिया था.
जस्टिस नरसिम्हा, शिवसेना में एकनाथ शिंदे बनाम उद्धव ठाकरे गुट की आपसी लड़ाई के मुक़दमे की भी सुनवाई कर रहे हैं.
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कौन हैं जस्टिस नरसिम्हा?
सुप्रीम कोर्ट में जज बनने से पहले जस्टिस नरसिम्हा सुप्रीम के सीनियर एडवोकेट रहे थे. 2014 में उन्हें भारत का एडिशनल सॉलिसिटर जनरल नियुक्त किया गया.
2018 में उन्होंने इस पद से इस्तीफ़ा दे दिया था. वो नेशनल लीगल सर्विस अथॉरिटी (NALSA) के भी सदस्य रहे, जो समाज के कमज़ोर तबक़ों को क़ानूनी मदद मुहैया कराती है.
एक सीनियर एडवोकेट के तौर पर जस्टिस नरसिम्हा ने अयोध्या विवाद मामले में जिरह करते हुए कहा था कि आस्था एक हक़ीक़त है और इसे साबित किया जा सकता है.
उन्होंने कहा था कि हिंदू हमेशा से ही ये मानते आए हैं कि बाबरी मस्जिद के निर्माण के पहले से ही अयोध्या का विवादित स्थल, भगवान राम का जन्मस्थान था.
जस्टिस नरसिम्हा बीसीसीआई से जुड़े क्रिकेट प्रशासन के विवाद में अदालत मित्र के तौर पर नियुक्त किए गए थे.
उन्हें 'एमिकस क्यूरी' तब बनाया गया, जब कोर्ट ने बीसीसीआई में सुधारों को लेकर आरएम लोढ़ा समिति की सिफ़ारिशों को स्वीकार कर लिया था.
जस्टिस नरसिम्हा 2 मई 2028 को सुप्रीम कोर्ट से रिटायर होंगे.
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5. जस्टिस हिमा कोहली
ये जस्टिस हिमा कोहली का ही फ़ैसला था कि कोई भी अभियुक्त, प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफ़आईआर) दर्ज होने से पहले सुनवाई के अधिकार का दावा नहीं कर सकता है.
उन्होंने ये फ़ैसला भी दिया था कि लेनदारों के खातों को फ़र्ज़ी घोषित करने से पहले बैंकों को उन्हें सुनवाई का मौक़ा देना चाहिए.
जस्टिस कोहली ने ये भी फ़ैसला दिया कि महिलाओं से जुड़े ज़्यादातर मामलों में पुरुष जज ही फ़ैसले लिखते हैं और इन मामलों में घिसी-पिटी रवायतों से बचा जाना चाहिए.
एक और फ़ैसले में जस्टिस हिमा कोहली ने कहा था कि ये सोच ग़लत है कि बुढ़ापे में केवल लड़के ही मां-बाप की सेवा कर सकते हैं.
'कास्टिंग काउच' मामले की सुनवाई करते हुए उन्होंने अपने फ़ैसले में कहा कि अगर किसी अभियुक्त के ख़िलाफ़ एफ़आईआर में बाद में गंभीर आरोप जोड़ दिए जाएं, तो उनकी ज़मानत रद्द की जा सकती है.
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कौन हैं जस्टिस कोहली?
जस्टिस हिमा कोहली ने दिल्ली यूनिवर्सिटी से इतिहास में मास्टर्स की पढ़ाई की थी. उसके बाद उन्होंने दिल्ली यूनिवर्सिटी से ही क़ानून की पढ़ाई की. 1984 में जस्टिस कोहली ने दिल्ली की बार काउंसिल में बतौर वकील अपना नामांकन कराया.
1999 में जस्टिस कोहली को दिल्ली सरकार की तरफ़ से दिल्ली हाई कोर्ट में नई दिल्ली म्युनिसिपल काउंसिल (एनडीएमसी) का वकील नियुक्त किया था.
साल 2004 में सिविल मामलों में दिल्ली सरकार की एडिशनल स्टैंडिंग काउंसेल बनने तक वो इस ओहदे पर रहीं.
2006 में जस्टिस हिमा कोहली को दिल्ली हाई कोर्ट में एडिशनल जज नियुक्त किया गया था. इसके बाद 29 अगस्त, 2008 में उन्हें दिल्ली हाई कोर्ट में स्थायी जज बनाया गया.
वो क़ानूनी मदद देने, जेलों में क़ैदियों की भीड़ कम करने, मध्यस्थता करने और दिल्ली की न्यायिक एकेडमी की तमाम समितियों की सदस्य रहीं.
2021 में जस्टिस कोहली को तेलंगाना हाई कोर्ट का मुख्य न्यायाधीश बनाया गया था. वो तेलंगाना हाई कोर्ट की पहली महिला चीफ जस्टिस थीं.
जस्टिस कोहली 1 सितंबर, 2024 को सुप्रीम कोर्ट से रिटायर होंगी.
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