नज़रिया: फ़ैसला सुनाने में सुप्रीम कोर्ट की जल्दबाज़ी के बीच सवाल उठाती असहमतियां

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- Author, रमेश मेनन
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
बीते कुछ हफ़्तों में देश की सर्वोच्च अदालत ने ऐसे कई महत्वपूर्ण फ़ैसले दिए हैं जिनका पूरे देश पर लंबे समय तक प्रभाव रहेगा.
ग़ौर करने की बात ये है कि इनमें से कई फ़ैसले असहमति भरे विचारों के साथ आए हैं. इन विचारों ने कई महत्वपूर्ण क़ानूनी पहलू और कुछ ऐसे सवाल भी उठाए हैं जिनपर चर्चा ज़रूरी है.
राजनीतिक और समाजिक हलकों में ऐसी कई आवाज़ें हैं जो सवाल कर रही हैं कि आख़िर इतनी जल्दीबाज़ी में अचानक कई ऐतिहासिक मामलों के फ़ैसले देने की क्या ज़रूरत आ पड़ी है.
वह भी तब, जब ये फ़ैसले तय कर सकते हैं लोकसभा चुनाव सिर पर होने के कारण देश किस प्रकार इन मुद्दों से जूझेगा.
ये तो साफ़ है कि इसका राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश की जाएगी. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जैसे भाजपा के नेताओं ने पहले ही कह दिया है कि वे आम चुनाव से पहले किसी तरह के समाधान की उम्मीद कर रहे हैं.
वो और कई और दक्षिणपंथी विचारधारा वाले नेता चाहते हैं कि अयोध्या में उसी विवादित स्थल पर मंदिर का निर्माण शुरू किया जाए जहां कभी मस्जिद थी ताकि वो अपने चुनाव अभियान में इसका इस्तेमाल मतदाताओं के ध्रुवीकरण के लिए कर सकें.

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विवादित ज़मीन से जुड़ा मामला
इनमें से एक विवादित मामला राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद मसले से जुड़ा है, जिसमें इलाहाबाद हाई कोर्ट के सात साल पुराने फ़ैसले को चुनौती देने वाली कई अपीलों पर सुप्रीम कोर्ट सुनवाई कर रहा था.
इस फ़ैसले में हाई कोर्ट ने 2.77 एकड़ की विवादित ज़मीन को तीन बराबर हिस्सों में तीनों पक्षों को बांटने का आदेश दिया था.
सुप्रीम कोर्ट ने पांच जजों की बेंच को मामला बढ़ाए जाने की मुसलमानों के एक पक्ष की अपील को ख़ारिज कर दिया है.
कोर्ट ने 2-1 के बहुमत से ये फ़ैसला भी दिया कि 1994 में दिए गए इस्माइल फ़ारूक़ी फ़ैसले पर पुनर्विचार की ज़रूरत नहीं है. इस्माइल फ़ारूक़ी केस में कहा गया था कि मस्जिद में नमाज़ पढ़ना इस्लाम का अभिन्न अंग नहीं है और नमाज़ कहीं भी (खुले में भी) पढ़ी जा सकती है.
चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्रा और जस्टिल अशोक भूषण ने कहा कि कोर्ट ने 1994 में ये टिप्पणी इसलिए की थी ताकि इस तर्क को ख़ारिज किया जा सके कि सरकार मस्जिदों की ज़मीन का अधिग्रहण नहीं कर सकती.
कोर्ट का मानना है कि कोई भी धार्मिक ढांचा हो, सरकार यदि उसका अधिग्रहण करना चाहे तो वह ऐसा कर सकती है. 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद सरकार ने विवादित ज़मीन को अपने कब्ज़े में ले लिया था.

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जस्टिस नज़ीर के प्रश्न ने प्रश्न खड़ा किया
लेकिन जस्टिस एस. अब्दुल नज़ीर ने अन्य जजों से असहमत होते हुए अपने फ़ैसले में सवाल किया कि जब बहुविवाह और निकाह हलाला को चुनौती देने वाली याचिका, सार्वजनिक स्थलों में पूजा और रामलीला के आयोजन और महिलाओं का ख़तना कराने से संबंधित याचिकाएं संवैधानिक बेंच के पास भेजी जा सकती हैं तो अयोध्या ज़मीन मामले को संवैधानिक बेंच के पास क्यों ना भेजा जाए.
उन्होंने कहा कि अयोध्या का राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न खड़ा करता है और इसे बड़ी खंडपीठ के पास भेजा जाना चाहिए. यह एक वैध मुद्दा है जिसका उत्तर दिया जाना चाहिए.
अयोध्या मामले को बड़ी बेंच के पास भेजे जाने के उनके विचार चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्रा और जस्टिस अशोक भूषण की राय से बिल्कुल जुदा थे.
कोर्ट में ये बात स्पष्ट हो चुकी थी जस्टिस नज़ीर वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल, दुष्यंत दवे और राजीव धवन की राय से इत्तेफ़ाक रखते थे जिनकी दलील थी कि जब कम महत्वपूर्ण मुद्दों को संवैधानिक बेंच के पास विचार के लिए भेजा सकता है तो अयोध्या जैसे महत्वपूर्ण मसले को भी भेजा जाना चाहिए, क्योंकि इसके दूरगामी असर हो सकता है.

वो मामले जो संवैधानिक बेंच को सौंपे गए
दिलचस्प बात यह है कि इस फ़ैसले से तीन दिन पहले सुनीता तिवारी के नेतृत्व में महिला ख़तना संबंधित याचिकाओं को चीफ़ जस्टिस ने संवैधानिक पीठ के पास भेज दिया था.
जस्टिस नज़ीर ने साफ़ किया कि इसी साल की मार्च 26 को बहुविवाह से संबंधित मामलों को चुनौती देने वाली समीना बेग़म की याचिका को चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्रा ने संवैधानिक बेंच को सौंप दिया था.
उन्होंने कहा, इसी साल जुलाई में सार्वजनिक पार्कों में रामलीला और पूजा के लिए सालाना तौर पर दी जाने वाली अनुमति की वैधता जांचने संबंधी ज्योति जागरण मंडल की याचिका को दो जजों की बेंच ने पुनर्विचार करने के लिए पांच जजों की बेंच को सौंप दिया था.
बीते साल 5 दिसंबर को अयोध्या मामले में वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने अपनी दलील में कहा था कि, "यह देश के इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण मुकदमा है. इसका असर भारत के भविष्य पर पड़ेगा."
उनका कहना था, "इस मामले में आने वाले फ़ैसले का असर अदालत की चारदीवारी के कहीं दूर तक जाएगा. तो इतनी जल्दी क्या है? इसे पांच या फिर सात जजों की बेंच के पास भेजा जाए."
"अगर सुप्रीम कोर्ट न्यायमूर्ति कर्णन के मामले का फ़ैसला करने के लिए सात जजों की बेंच का गठन कर सकती है, तो यह मामला उससे कहीं ज़्यादा महत्वपूर्ण है, इसे सात जजों की बेंच के पास भेजा जाना चाहिए."
अयोध्या का मुद्दा सबकी ज़ुबान पर है. लेकिन कांग्रेस इस पर अपनी प्रतिक्रिया देने में लगभग शांत ही दिखी. उसने कहा कि हर किसी को सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन करना चाहिए.
कांग्रेस प्रवक्ता प्रियंका चतुर्वेदी ने कहा कि भाजपा ने लगभग तीन दशकों तक लोगों को गुमराह करने के लिए अयोध्या मुद्दे का इस्तेमाल किया है, ख़ासकर चुनावों के दौरान.
मौजूदा चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्रा जल्द ही सेवानिवृत्त हो रहे हैं और अब ये नए चीफ़ जस्टिस रंजन गोगोई पर होगा कि वो इस मामले को सुनने के लिए नई बेंच का गठन करते हैं या नहीं.

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आधार पर आया फ़ैसला
एक और महत्वपूर्ण मामला आधार से जुड़ा मामला था, जहां सुप्रीम कोर्ट ने 4-1 के बहुमत में आधार की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा था. कोर्ट का कहना था कि यह एक सकारात्मक क़ानून है और इसका दुरुपयोग नहीं किया जा सकता.
अब भारतीयों को बैंक खाता खोलने, मोबाइल फ़ोन के लिए सिम कार्ड खरीदने, स्कूल में एडमिशन लेने या किसी प्रवेश परीक्षा के लिए आधार कार्ड की ज़रूरत नहीं होगी.
फ़ैसले में कहा गया है कि हर भारतीय पर कला धन जमा करने का शक़ नहीं किया जा सकता और इसलिए आधार नंबर को बैंक खातों और मोबाइल फ़ोन से जोड़ने की कोई ज़रूरत नहीं है.

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हालांकि, जस्टिस चंद्रचूड़ ने आधार अपनी अलग राय जताते हुए इसे असंवैधानिक क़रार दिया. उन्होने कहा कि आधार एक्ट को धन विधेयक की तरह संसद में पास किया गया था और ऐसा करना संविधान के साथ धोखा है. उनका कहना था कि यह एक ऐसा हथियार है जिससे अधिकारियों को नागरिकों की पूरी प्रोफ़ाइल बनाने में मदद मिलेगी, इसके ज़रिए देश की सरकार अपने नागरिकों की जासूसी कर सकेगी और ये निजता के अधिकार का उल्लंघन है.
उन्होंने कहा, "2009 से चले आधार के पूरे कार्यक्रम में कई संवैधानिक विसंगतियां हैं और ये मौलिक अधिकारों का उल्लघंन करता है."
इस फ़ैसले के साथ अब किसी व्यक्ति की नस्ल, धर्म, जाति, जनजाति, भाषा या उसकी ज़मीन से जुड़ी जानकारियां, आय और बीमारियों से जुड़ी जानकारियां अब इकट्ठा नहीं की जा सकतीं. जस्टिस चंद्रचूड़ ने आधार के बारे में चिंता जताते हुए कहा कि ये देश को अपने नागरिकों की निगरानी करने वाले देश में तब्दील करने की क्षमता रखता है.
फ़ैसले के तुरंत बाद सूत्रों के हवाले से पता चला कि सरकार मोबाइल फ़ोन और बैंक खातों के साथ आधार को जोड़ना बाध्यकारी बनाने के लिए कानून में संशोधन करने के तरीके तलाश रही है.

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मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की गिरफ़्तारी
जब हाशिए पर रहने वाले ग़रीबों के मामलों को उठाने वाले देश के जानेमाने मानव अधिकार कार्यकर्ताओं को माओवादियों के साथ संबंध होने के आरोप में गिरफ़्तार किया गया तो देश के कई हलकों से विरोध की आवाज़ें आईं.
मानवाधिकार कार्यकर्ता वरनॉन गोंज़ाल्विस, सुधा भारद्वाज, गौतम नवलखा, वरवर राव, और अरुण फ़रेरा को ग़ैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) क़ानून के तहत देश के अलग-अलग शहरों से गिरफ़्तार किया गया था.
चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस एएम खनविलकर और डीवाई चंद्रचूड़ की बेंच ने 2-1 के बहुमत से उन्हें जमानत पर रिहा करने से इनकार कर दिया. बेंच का कहना था कि सबूत इस ओर इशारा करते हैं कि उन्हें सत्ताधारी सरकार के ख़िलाफ़ बोलने के लिए गिरफ़्तार नहीं किया गया है, बल्कि प्रतिबंधित माओवादियों के साथ संबंध रखने के आरोप में गिरफ़्तार किया गया है.
लेकिन, जस्टिस चंद्रचूड़ की राय इससे जुदा थी. उनका कहना था गिरफ़्तार कार्यकर्ताओं को बदनाम करने में पुलिस ने असंगत रवैया अपनाया है और इसकी जांच के लिए विशेष जांच दल के गठन की ज़रूरत है. उनका कहना था कि इस जांच दल की निगरानी सुप्रीम कोर्ट के द्वारा की जानी चाहिए क्योंकि "असंतोष व्यक्त करना लोकतंत्र के जीवंत रहने का प्रतीक है."

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जस्टिस चंद्रचूड़ का कहना था कि अटकलों के आधार पर किसी की आज़ादी की बलि नहीं चढ़ाई जा सकती. उन्होंने कार्यकर्ताओं की छवि ख़राब करने के इरादे से अपमानजनक जानकारी लीक करने के लिए पुलिस को फ़टकार भी लगाई.
उनका कहना था कि कोर्ट को इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि आपराधिक मामले की जांच आरोपों पर आधारित होती है और हमें यह देखना है कि शक़ के बिना पर आज़ादी को ख़त्म नहीं किया जा सकता.
उन्होंने कहा कि विरोध करना जीवंत लोकतंत्र का प्रतीक है. विरोध में उठने वाली आवाज़ों को दबाने के लिए उन लोगों को परेशान नहीं किया जा सकता जो उन सरकार-विरोधी मुद्दों को उठाते हैं, जिन्हें सत्ता पसंद नहीं करती.
उन्होंने कहा कि आपराधिक आरोपों का सामना कर रहे हर व्यक्ति को निष्पक्ष जांच का अधिकार है. उन्होंने आगाह किया कि अगर अदालत सिद्धांतों के साथ खड़ी नहीं होती है तो आज़ादी की मौत हो जाएगी.

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सबरीमला पर आया फ़ैसला
सुप्रीम कोर्ट ने एक और अहम फ़ैसले में केरल के सबरीमला मंदिर को महिला भक्तों के लिए खोलने आदेश दिया. अब तक यहां एक विशेष आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश पर रोक थी.
सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने ये फ़ैसला 4-1 के बहुमत से सुनाया. पीठ की अगुवाई मुख्य न्यायाधीश जस्टिस मिश्रा कर रहे थे. कोर्ट ने कहा कि दस से पचास साल तक की उम्र की महिलाओं पर रोक लगाने की परंपरा अवैध, असंवैधानिक और मनमानी भरी है.
मुख्य न्यायाधीश जस्टिस मिश्रा ने लिखा, "धार्मिक पितृसत्ता को इस बात की इजाज़त नहीं दी जा सकती कि वो किसी की आस्था और धर्म पालन की आज़ादी पर रोक लगाए."
लेकिन इस फ़ैसले से असहमति जताने वाली जस्टिस इंदू मल्होत्रा ने धार्मिक मामलों में न्यायिक दख़ल नहीं करने की अपील की.
उनकी राय थी कि ये परंपरा भगवान अयप्पा के मंदिर की धार्मिक परंपरा के तहत आती है जो संविधान के ज़रिये संरक्षित है.

जस्टिस इंदू मल्होत्रा का ये भी मानना है कि धार्मिक परंपराओं की न्यायिक समीक्षा इसलिए भी नहीं की जा सकती है क्योंकि कोर्ट किसी देवता की पूजा करने के तरीके को लेकर अपनी नैतिकता या फिर तर्कशीलता को थोप नहीं सकता है.
उन्होंने कहा कि ऐसा करना किसी व्यक्ति की आस्था और मान्यता के मुताबिक धर्मपालन की आज़ादी को नकारना होगा. ये धर्म, आस्था और मान्यता को तर्कसंगत बनाने की कोशिश जैसा होगा जो कि कोर्ट के दायरे से बाहर है.
भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने पहले एक रुख़ अपनाया हुआ था कि सबरीमला के अयप्पा मंदिर के नियम नहीं तोड़े जाने चाहिए लेकिन फ़ैसले के बाद से उन्होंने चुप्पी साधी हुई है.
बीजेपी अब अपराध बना दिए गए तीन तलाक़ मामले में तो पूरा श्रेय ले रही थी मगर वह नहीं चाहेगा कि अदालत पुरातन हिंदू परंपराओं पर सवाल उठाकर उन्हें पलट दे.
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