समलैंगिक विवाह को मौलिक अधिकार क्यों नहीं मानती केंद्र सरकार

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- Author, कमलेश
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
समलैंगिक विवाह को लेकर दायर की गईं याचिकाओं के जवाब में केंद्र सरकार ने दिल्ली हाई कोर्ट में अपना जवाब दाखिल किया है.
सरकार ने समलैंगिक विवाह को मंजूरी दिए जाने का विरोध किया है. गुरुवार को सरकार ने कहा कि समलैंगिक जोड़ों के पार्टनर की तरह रहने और यौन संबंध बनाने की तुलना भारतीय पारिवारिक इकाई से नहीं की जा सकती.
केंद्र सरकार ने ये भी कहा कि न्यायिक हस्तक्षेप “व्यक्तिगत क़ानूनों के नाजुक संतुलन को बर्बाद कर देगा.”
समलैंगिक विवाह को मंजूरी देने की मांग से संबंधित कई याचिकाएं दिल्ली हाई कोर्ट में दाखिल की गई हैं.
इन याचिकाओं में हिंदू विवाह अधिनियम 1955, विशेष विवाह अधिनियम 1954 और विदेशी विवाह अधिनियम 1969 के तहत समलैंगिक विवाह को मान्यता देने की मांग की गई है. साथ ही समलैंगिक विवाह को मान्यता न देना मौलिक अधिकारों का उल्लंघन बताया गया है.
न्यायाधीश राजीव सहाय एंडलॉ और अमित बंसल की बेंच ने इस पर सरकार ने अपना जवाब दाखिल करने के लिए कहा था.

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सरकार का जवाब
केंद्र सरकार ने इसके जवाब में हलफ़नामा दायर किया.
सरकार ने कहा कि समलैंगिक जोड़ों के पार्टनर की तरह रहने और यौन संबंध बनाने की तुलना भारतीय पारिवारिक इकाई से नहीं की जा सकती जिसमें एक जैविक पुरुष को पति, एक जैविक महिला को पत्नी और दोनों के बीच मिलन से उत्पन्न संतान की पूर्व कल्पना है.
हलफ़नामे में कहा गया कि संसद ने देश में विवाह क़ानूनों को केवल एक पुरुष और एक महिला के मिलन को स्वीकार करने के लिए तैयार किया है. ये क़ानून विभिन्न धार्मिक समुदायों के रीति-रिवाजों से संबंधित व्यक्तिगत क़ानूनों/ संहिताबद्ध क़ानूनों से शासित हैं. इसमें किसी भी हस्तक्षेप से देश में व्यक्तिगत क़ानूनों के नाजुक संतुलन के साथ पूर्ण तबाही मच जाएगी.
सरकार ने आगे कहा कि भारत में विवाह से "पवित्रता" जुड़ी हुई है और एक "जैविक पुरुष" और एक "जैविक महिला" के बीच का संबंध "सदियों पुराने रीति-रिवाजों, प्रथाओं, सांस्कृतिक लोकाचार और सामाजिक मूल्यों" पर निर्भर करता है. केंद्र सरकार ने इसे मौलिक अधिकार के तहत भी मान्य नहीं माना है.

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क्या हैं याचिकाएं
याचिका दायर करने वाले एक याचिकाकर्ता जोड़े की शादी को विदेशी विवाह अधिनियम के तहत रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट नहीं दिया गया. वहीं, दूसरे जोड़े को विशेष विवाह अधिनियिम के तहत शादी की इजाजत नहीं दी गई.
इन याचिकाओं में कहा गया कि विशेष विवाह अधिनियम और विदेशी विवाह अधिनियम की व्याख्या इस तरह कि जाए कि वो समलैंगिक विवाह पर भी लागू हो सके.
एक अन्य याचिकाकर्ता उदित सूद ने विशेष विवाह अधिनियम को जेंडर न्यूट्रल बनाने की मांग की ताकि वो सिर्फ़ महिला और पुरुष की बात न करे.
करनजवाला एंड कंपनी ने उनकी तरफ से याचिका दायर की है जिसमें कहा गया है कि इस समय विशेष विवाह अधिनियम जिस तरह बनाया गया है उसमें एक दूल्हे और एक दुल्हन की ज़रूरत होती है. ये व्याख्या हमारे शादी करने के संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन करती है. विशेष विवाह अधिनियम की व्याख्या इस तरह की जानी चाहिए जो लैंगिक पहचान और सेक्शुएलिटी को लेकर निष्पक्ष हों.
उदित सूद कहते हैं, “किसी के लिए अपना घर छोड़ना आसाना नहीं होता. भारत के भेदभावपूर्व क़ानूनों के कारण हमें एक सम्मानजनक ज़िंदगी के लिए अपना देश छोड़ना पड़ा.”
याचिक दायर करने की वजह को लेकर वह कहते हैं कि भारतीय एलजीबीटी समुदाय के सभी लोगों को परिवार, दोस्त और कार्यस्थल पर सहयोग नहीं मिल पाता. लेकिन, जिन्हें वो सहयोग मिला है उन्हें दूसरों की मदद के लिए इसका उपयोग करना चाहिए.

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कहां हैं अड़चनें
सितंबर 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से हटा दिया था. इसके अनुसार आपसी सहमति से दो व्यस्कों के बीच बनाए गए समलैंगिक संबंधों को अपराध नहीं माना जाएगा. इसमें धारा 377 को चुनौती दी गई थी जो समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी में लाती है.
अब मसला समलैंगिकों के विवाह का है. लेकिन, सरकार के जवाब के मुताबिक विवाह से जुड़े मौजूदा क़ानूनों के तहत समलैंगिक विवाह मान्य नहीं ठहराया जा सकता.
वहीं, याचिकाकर्ता इन क़ानूनों में बदलावों की मांग करते हैं ताकि उन्हें भी शादी का अधिकार मिल सके.
लेकिन, मौजूदा व्यवस्था में क्या ये संभव है और इसके लिए कितना लंबा रास्ता तय करने की ज़रूरत है.
"पूरी क़ानूनी संरचना बदलनी पड़ेगी"
सुप्रीम कोर्ट के वकील विराग गुप्ता कहते हैं कि शादी की व्यवस्था अलग-अलग क़ानूनों से मिलकर बनी है. अगर इसमें बदलाव होता है तो वो बहुत व्यापक और क्रांतिकारी बदलवा होगा.
उन्होंने बताया, “भले ही थर्ड जेंडर को क़ानूनी मान्यता मिली है, पर मान्यता मिलने और अधिकार मिलने में फर्क है. अधिकार मिलने के लिए ज़रूरी है कि उन परंपरागत क़ानूनों में बदलाव किया जाए जिनमें शादी को स्त्री और पुरुष के बीच संबंध माना गया है. साथ ही इनसे जुड़े अन्य क़ानूनों जैसे घरेलू हिंसा, गुजारा भत्ता, उत्तराधिकार और मैरिटल रेप आदि में भी बदलाव करना होगा. लेकिन, इसमें कई सवाल और जटिलताएं सामने आती हैं.”
“जैसे अगर एक ही जेंडर के लोग शादी करेंगे तो गुजारा भत्ता कौन किसको देगा? घरेलू हिंसा में अगर एक ही जेंडर के लोग हैं तो इसमें पीड़ित और अभियुक्त पक्ष कौन होगा? ससुराल-मायका, पितृधन और मातृधन क्या है, इस पर विचार करना पड़ेगा. उसी तरीके से, मैरिटल रेप के भी प्रावधान हैं. इन सभी बातों का आपस में एक संबंध है. एक पूरी क़ानूनी संरचना बदलनी पड़ेगी क्योंकि विवाह के क़ानून की जड़ में स्त्री-पुरुष के संबंधों को ही निर्धारित किया गया है.”
विराग गुप्ता कहते हैं कि अब अगर इसको मान्यता देनी है तो सिर्फ़ संसद के माध्यम से दी जा सकती है. कोई क़ानून ग़लत है या नहीं ये कोर्ट तय कर सकता है लेकिन पूरी क़ानून व्यवस्था को बदलने के लिए कोर्ट निर्देश दे भी दे, तो भी बदलाव संसद के माध्यम से ही संभव है. विवाह क़ानूनों और उनसे जुड़े अन्य क़ानूनों में बदलाव करना होगा तभी सही अर्थों में मांग पूरी हो पाएगी. ये बहुत ही क्रांतिकारी बात होगी.

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मौलिक अधिकार का उल्लंघन
दिल्ली हाई कोर्ट में दायर याचिकाओं में कहा गया है कि समलैंगिकों को शादी का अधिकार न मिलना उन्हें समानता के मौलिक अधिकार से वंचित करता है.
याचिकाकर्ता उदित सूद कहते हैं कि हमारी याचिका विवाह की समानता को लेकर है. अपनी पसंद के किसी व्यक्ति से शादी करना आधारभूत मानवाधिकार है जो भारत के संविधान में सभी को मिला हुआ है. समलैंगिक भी इसके पूरे हकदार हैं.
उनकी याचिका में जिन मौलिक अधिकारों की बात की गई है वो हैं-
● राज्य किसी नागरिक के खिलाफ धर्म, मूल, वंश, जाति, लिंग, जन्मस्थान या इनमें से किसी के आधार पर कोई भेद नहीं कर सकता है. भारतीय क़ानून सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू होते हैं.
● अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
● किसी भी व्यक्ति को उसके जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से क़ानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के बिना वंचित नहीं किया जाएगा.
लेकिन, सरकार इसे मौलिक अधिकार का मसला नहीं मानती.
सरकार का पक्ष है कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार क़ानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अधीन है और समलैंगिक विवाह के मौलिक अधिकार को शामिल करने के लिए इसका विस्तार नहीं किया जा सकता है. समलैंगिक विवाह "किसी भी व्यक्तिगत क़ानून या किसी भी सांविधिक वैधानिक क़ानून में मान्यता प्राप्त या स्वीकृत नहीं हैं.
समलैंगिक विवाह और मौलिक अधिकारों को लेकर विराग गुप्ता कहते हैं, “दरअसल, मौलिक अधिकार भी उसी चीज़ के लिए बनता है जिसके लिए देश में क़ानून हो. जिसके लिए क़ानून ही नहीं है उसके लिए मौलिक अधिकार कैसे बन जाएगा.”
“मौलिक अधिकार के तहत अगर वो अपनी पसंद का पार्टनर चुनते भी हैं तो भी वो शादी कैसे करेंगे क्योंकि उनकी शादी के लिए कोई क़ानून ही नहीं है. शादी की आज़ादी है लेकिन अगर आप क़ानूनी शादी करना चाहते हैं तो क़ानून के अनुसार ही करनी पड़ेगी. ऐसे में मौलिक अधिकार का उल्लंघन कैसे होगा. हालाँकि, विवाह संबंधी क़ानूनों में बदलाव करके ज़रूर इस अधिकार को पाया जा सकता है.”
यही याचिकाकर्ताओं की मांग भी है, कि समलैंगिकों की समानता के अधिकार को सुनिश्चित करने के लिए विवाह क़ानूनों में बदलाव किया जाए.
दुनिया भर में 29 देश ऐसे हैं जहाँ ऐसे ही क़ानूनी उलझनों के बावजूद समलैंगिक विवाह को मंज़ूरी दी गई है. कुछ देशों में कोर्ट के ज़रिए ये अधिकार मिला तो कुछ में क़ानून में बदलाव करके तो कुछ ने जनमत संग्रह करके ये अधिकार दिया.
शादी से जुड़े अन्य क़ानूनों को लेकर अब भी चर्चा जारी है जैसे समलैंगिकों के लिए घरेलू हिंसा के क़ानून के तहत मामला दर्ज कराने में समस्या आती है. लेकिन, उनकी शादी को मान्यता मिली हुई है.

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कई अधिकारों से हो रहे वंचित
इसे लेकर समानाधिकार कार्यकर्ता हरीश अय्यर कहते हैं कि जिस तरह विवाह क़ानून में बदलाव अन्य क़ानूनों को प्रभावित करेगा उसी तरह विवाह का अधिकार नहीं मिलने से समलैंगिकों के कई और अधिकार भी प्रभावित हो रहे हैं.
उन्होंने बताया, “शादी को मान्यता नहीं मिलने से होता ये है कि वो कपल शादी से जुड़े अन्य अधिकारों से भी वंचित हो जाता है. जैसे किडनी देने की इज़ाजत परिवार के ही सदस्य को होती है. अगर समलैंगिक जोड़े में किसी एक को किडनी की ज़रूरत है और दूसरा देने में सक्षम और इच्छुक भी है तो भी वो किडनी नहीं दे सकता क्योंकि वो क़ानूनी तौर पर शादीशुदा नहीं हैं.”
“इसी तरह आप उत्तराधिकार के अधिकार से वंचित हो जाते हैं. मेडिक्लेम, इंश्योरेंस और अन्य दस्तावेजों में भी अपने पार्टनर का नाम नहीं लिख सकते. जबकि मेरा पार्टनर कौन है इससे कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए. समलैंगिक जोड़ा प्यार, समर्पण, इच्छा होने पर भी एक-दूसरे को परिवार नहीं बना सकता.”
इस मामले पर सरकार के रुख को लेकर हरीश अय्यर का कहते हैं, “हमें सरकार से इसी तरह के जवाब की उम्मीद थी क्योंकि उन्होंने धारा 377 के समय पर भी कोई पक्ष लेने से इनकार कर दिया था. सरकार ने कभी नहीं कहा कि वो एलजीबीटी के साथ है. हाँ, व्यक्तिगत तौर पर सरकार में शामिल नेताओं ने एलजीबीटी के समर्थन में बयान दिया है लेकिन सरकार के स्तर पर समर्थन नहीं मिला है.”
“बस हम ये चाहते हैं कि समलैंगिक विवाह को क़ानूनी दर्जा दिलाने का कोई तरीका ढूंढे, कोई प्रावधान करें या सिविल पार्टनरशिप ही करें. क़ानून ऐसा हो कि जेंडर और सेक्शुएलिटी के परे कोई भी दो लोग शादी कर सकें.”
इस मामले में सरकार को अभी कुछ और याचिकाओं पर भी कोर्ट में जवाब दाखिल करना है. मामले की अगली सुनवाई 20 अप्रैल को होगी.

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