कॉलेजियम ने फिर की सौरभ कृपाल की सिफ़ारिश, बन सकते हैं पहले समलैंगिक जज

सौरभ कृपाल

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    • Author, सुचित्रा मोहंती
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए

दिल्ली हाई कोर्ट जज नियुक्ति मामले में सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने एक बार फिर वकील सौरभ कृपाल का नाम आगे कर दिया है जिसके बाद अब ये उम्मीद जताई जा रही है कि भारत को उसका पहला समलैंगिक जज मिल सकता है. वकीलों ने कॉलेजियम के इस फ़ैसले का स्वागत किया है.

बीबीसी को मिले दस्तावेज़ों से पता चला है कि सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने अपने अनुशंसा पत्र में वरिष्ठ वकील सौरभ कृपाल को दिल्ली हाई कोर्ट का जज बनाने की सिफ़ारिश की है.

कॉलेजियम ने लिखा है कि LGBTQI (लेस्बियन, गे, बाईसेक्शुअल, ट्रांसजेंडर, क्वीर एंड इंटरसेक्स) लोगों के हक़ों की बात करने के मामले में एक वकील के तौर पर उन्होंने जो कुछ किया है वो "मील का पत्थर" है. एक समलैंगिक के रूप में सौरभ कृपाल अपनी पहचान नहीं छिपाई है.

क़ानून के जानकारों ने फिर से सौरभ कृपाल के नाम की सिफ़ारिश करने के फ़ैसले का स्वागत किया है.

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  • दिल्ली हाई कोर्ट में जज के तौर पर नियुक्ति के लिए चीफ़ जस्टिस एनवी रमन्ना की अध्यक्षता वाले कॉलेजियम ने 11 नवंबर, 2021 को सौरभ कृपाल के नाम की सिफ़ारिश की थी.
  • सौरभ कृपाल के नाम पर सरकार ने आपत्ति जताई.
  • इसके बाद कॉलेजियम ने एक बार फिर सौरभ कृपाल के नाम की सिफ़ारिश की है.
  • सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ के समक्ष एलजीबीटीक्यू मामले में वकीलों की टीम का हिस्सा रहे.
  • सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी की देखरेख में सीखा काम.
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कॉलेजियम देश के चीफ़ जस्टिस जस्टिस डॉक्टर धनंजय यशवंत चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली एक समिति है. दिल्ली हाई कोर्ट के जज के पद के लिए जस्टिस चंद्रचूड़ ने सौरभ कृपाल के नाम के प्रस्ताव पर एक बार फिर हामी भरी है.

बीबीसी ने इस पर वकील सौरभ कृपाल की प्रतिक्रिया जाननी चाही लेकिन उन्होंने इस मामले में कुछ भी कहने से इनकार कर दिया.

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सरकार की तरफ़ से क्या कहा गया?

भारत में जजों की नियुक्ति के लिए नामों की अनुशंसा सुप्रीम कोर्ट का कॉलेजियम करता है. कॉलेजियम सारे नाम सरकार के पास भेजता है और वो इस पर आख़िरी मुहर लगाती है.

माना जा रहा है कि सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर सौरभ कृपाल के नाम को आगे बढ़ाकर उनके हक़ में सबसे बड़ा कदम उठाया है.

अपने पत्र में कॉलेजियम ने लिखा है कि सरकार ने इससे पहले सौरभ कृपाल के नाम पर आपत्ति जताई थी और कहा था कि उनके पार्टनर स्विट्ज़रलैंड के नागरिक हैं.

कॉलेजियम का कहना था कि सरकार को ये चिंता है कि देश में समलैंगिक शादियों को अभी मान्यता नहीं मिली है और सौरभ कृपाल "समलैंगिकों के अधिकारों के मुद्दे से जुड़े रहे हैं."

सौरभ कृपाल के मामले में कॉलेजियम का कहना है कि सरकार ये मान कर नहीं चल सकती कि उनके पार्टनर भारत विरोधी हैं. साथ ही स्विट्ज़रलैंड भी दोस्ताना मुल्क है और इससे पहले भी संवैधानिक पदों पर बैठे कई लोगों के पार्टनर दूसरे देशों के नागरिक रहे हैं.

कॉलेजियम ने सरकार को एक बार फिर याद दिलाया है कि हर भारतीय को सेक्स को लेकर अपने रुझान और सम्मान के साथ जीने का हक़ है.

कॉलेजियम ने कहा, "सौरभ कृपाल सेक्स के बारे में अपने रुझान पर खुलकर बात करते हैं, ये उनकी नेक नीयत है और बेंच के लिए वो महत्वपूर्ण साबित होंगे."

साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फ़ैसले में समलैंगिक संबंधों को ग़ैरअपराधिक करार दिया था. इस फ़ैसले को LGBTQI समुदाय ने भारी जीत माना था. इस मामले कृपाल सिंह दो याचिकाकर्ताओं के वकील थे.

सुप्रीम कोर्ट

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क्या कहते हैं क़ानून के जानकार?

क़ानून के जानकारों ने सौरभ कृपाल के नाम की सिफारिश के कॉलेजियम के फ़ैसले का स्वागत किया है.

पूर्व एडिशनल सोलिसिटर जनरल और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील केसी कौशिक कई सालों से सौरभ कृपाल को जानते हैं. बीबीसी से उन्होंने कहा कि सौरभ एक अच्छे वकील हैं और "उन्हें उम्मीद है कि वो एक बेहतरीन जज साबित होंगे."

वो कहते हैं, "ये देश वक्त के साथ विकसित होता गया है. वो एक शानदार वकील है जिन्हें क़ानून की अच्छी समझ है."

वरिष्ठ वकील गीता लूथरा ने कहा "सौरभ अच्छे, समझदार, असाधारण और मेहनती वकील हैं जो पूरी तरह इस पद के हक़दार हैं."

बीबीसी से उन्होंने कहा "अपने पार्टनर का चुनाव करना सौरभ का निजी फ़ैसला है और हाई कोर्ट जज के पद के लिए उनके नाम की सिफ़ारिश में इसकी कोई भूमिका नहीं होनी चाहिए. हमें उनकी योग्यता और काबिलियत के आधार पर ही उन्हें देखना चाहिए."

"सेक्स को लेकर उनके रुझान के आधार पर उनके साथ जज की नियुक्ति में भेदभाव नहीं होना चाहिए. वो लोग जो इस तरह के पदों के लिए योग्य हैं, वो कॉलेजियम की इस सिफ़ारिश को उम्मीद की किरण के तौर पर देखेंगे."

जानीमानी और देश की आला क्रिमिनल वकील कामिनी जायसवाल कहती हैं कि जज के पद के लिए सौरभ उपयुक्त उम्मीदवार हैं.

बीबीसी से उन्होंने कहा, "केंद्र सरकार के पास कोई विकल्प नहीं है, सरकार को उन्हें हाई कोर्ट जज के तौर पर नियुक्त करना होगा. देश का यही क़ानून है. वो इस पद के क़ाबिल हैं, अच्छे और ईमानदार व्यक्ति हैं. मैं उन्हें क़रीब से जानती हूं."

वो कहती हैं, "ये फ़ैसला इस तरह के कई और योग्य लोगों के लिए भी दरवाज़ा खोलने की तरह है. लेकिन सिफ़ारिश का आधार हमेशा इसी तरह होना चाहिए, जज बनने वाले व्यक्ति अच्छा और समझदार वकील हो और ईमानदार व्यक्ति हो."

गे परेड

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कौन हैं सौरभ कृपाल

सौरभ कृपाल ने दिल्ली के सेंट स्टीफ़न कॉलेज से पढ़े हैं. इसके बाद क़ानून की डिग्री के लिए वो छात्रवृत्ति पर ऑक्सफर्ड गए. उन्होंने कैम्ब्रिज युनिवर्सिटी से पोस्ट ग्रेजुएशन की डिग्री हासिल की है.

1990 के दशक में भारत लौटने से पहले उन्होंने कुछ वक्त के लिए जेनेवा में संयुक्त राष्ट्र में काम किया. भारत आने के बाद से वो सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस कर रहे हैं.

बीते सालों में संवैधानिक, व्यापारिक, सिविल और क्रिमिनल क़ानून से जुड़े कई मामलों में वो पैरवी कर चुके हैं.

पूर्व अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी के साथ भी सौरभ कृपाल ने बतौर सहायक काम किया है. केसी कौशिक कहते हैं कि इस अनुभव ने उनकी क़ाबिलियत को और निखारा है और क़ानून की उनकी समझ और और बेहतर किया है.

सौरभ कृपाल के पिता भूपिन्दर नाथ कृपाल देश के 31वें चीफ़ जस्टिस थे. वो छह मई 2002 से लेकर सात नवंबर 2002 तक इस पद पर थे.

मुकुल रोहतगी

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इमेज कैप्शन, पूर्व अटॉर्नी जनरल और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी

कॉलेजियम ने क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने अपनी सिफ़ारिश में लिखा है, "कृपाल योग्य, ईमानदार और समझदार हैं. उनकी नियुक्ति से दिल्ली हाई कोर्ट की बेंच की वैल्यू बढ़ेगी और कोर्ट अधिक समावेशी और विविधता को जगह देने वाली जगह बनेगी. उनका व्यवहार हमेशा से संतोषजनक रहा है."

अपने तीन पन्ने के सिफ़ारिश पत्र में कॉलेजियम ने लिखा कि सौरभ कृपाल के पार्टनर दूसरे देश के नागरिक हैं लेकिन पहले ये धारणा बनाने का कोई कारण नहीं है कि वो इस देश के ख़िलाफ़ वैमनस्य का भाव रखेंगे, क्योंकि वो जिस देश से हैं उसके साथ हमारे दोस्ताना संबंध हैं."

कॉलेजियम ने लिखा, "मौजूदा वक्त में और आज से पहले भी संवैधानिक दफ्तरों में अलग-अलग पदों पर ऐसे लोग रहे हैं जिनके पार्टनर दूसरे देशों से हैं. इसलिए ये सिद्धांतों का मामला है, और इस आधार पर सौरभ कृपाल की उम्मीदवारी पर सवाल नहीं खड़े किए जाने चाहिए."

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