जहांगीरपुरी हिंसा: क्या रही है हनुमान जयंती और शोभायात्रा की परंपरा

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- Author, भूमिका राय
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
"बड़ी संख्या में ऐसे लोग पैदा हो गए हैं जो धर्म के मूल को समझते नहीं हैं, हाँ लेकिन उन्हें धार्मिक दिखना है. वे धार्मिक हैं, ये समाज को दिखाना है. जबकि अगर आप ईश्वर में वाक़ई आस्था रखने वाले हैं तो आपको पता होगा कि उपासक होना बेहद निजी मामला है. उसके लिए सड़कों पर निकलकर शोर मचाने की ज़रूरत नहीं है."
बनारस स्थित संकट मोचन मंदिर के महंत डॉक्टर विशम्भर नाथ मिश्र का ये कथन दिल्ली के जहांगीरपुरी के मौजूदा तनावपूर्ण माहौल को देखते हुए थोड़ा अलग लगता है.
16 अप्रैल को हनुमान जयंती और इससे पहले रामनवमी के मौक़े पर भी देश के कई हिस्सों से ऐसी घटनाओं की ख़बर आई, जिसमें देखते ही देखते धार्मिक आयोजन हिंसा वाले माहौल में बदल गया.
राजधानी दिल्ली के उत्तर-पश्चिमी इलाक़े जहांगीर पुरी में भी बीते शनिवार को हनुमान जयंती के दौरान शोभा-यात्रा निकाली गई. इसी दौरान हिंसा भड़क गई. इस हिंसा में आठ पुलिसकर्मियों समेत नौ लोग घायल हुए हैं. इस मामले में 23 लोगों को गिरफ़्तार किया गया है और पुलिस की कई टीमें मामले की जाँच में जुटी हुई हैं. इलाक़े में भारी संख्या में अब भी पुलिसबल मौजूद है.
किसकी 'हरकत' की वजह से एक धार्मिक आयोजन पहले पथराव से शुरू हुआ और फिर गंभीर हिंसा में तब्दील हो गया, ये जाँच का विषय है और पुलिस इस मामले की जाँच कर भी रही है. लेकिन सवाल इस तरह के धार्मिक आयोजनों के स्वरूप को लेकर भी उठ रहे हैं. कई लोगों को लगता है कि धर्म का ये स्वरूप नया है. हनुमान जयंती पर शोभा-यात्रा निकाला जाना, उनके लिए कुछ ऐसा है जो कई लोगों ने पहले नहीं देखा. पर क्या वाक़ई ये नया है?
हनुमान जयंती क्यों मनाई जाती है?
हनुमान जयंती, हिंदुओं के देवता हनुमान के जन्म का उत्सव मनाने का दिन है. हालांकि साल में दो हनुमान जयंती मनाई जाती है. एक नर्क चतुर्दशी की तिथि पर जिसकी मान्यता उत्तर भारत में है और दूसरी चैत्र पूर्णिमा पर. इसकी मान्यता मध्य भारत से लेकर दक्षिण भारत तक है.
हालांकि मुख्य मंदिरों में इन दोनों ही तिथियों पर विशेष आयोजन होते हैं. हिंदू धर्म में हनुमान, रामकथा के प्रमुख अंग हैं, इसलिए प्रमुख मंदिरों में हनुमान जयंती का जश्न रामनवमी के साथ ही शुरू हो जाता है.
अयोध्या के हनुमान गढ़ी के महंत राजू बताते हैं कि उनके यहाँ हनुमान जयंती का पर्व नौ दिन पहले से ही शुरू हो जाता है.
वह बताते हैं, ''हनुमान गढ़ी में हमलोग नर्क चतुर्दशी को हनुमान जयंती मनाते हैं. लेकिन इसका आयोजन तिथि से नौ दिन पहले ही शुरू हो जाता है. इस दौरान अलग-अलग तरह के धार्मिक आयोजन किए जाते हैं. इसके बाद दिवाली वाले दिन इसका समापन होता है.''
उत्तर भारत में अयोध्या का हनुमानगढ़ी मंदिर और बनारस का संकट मोचन मंदिर, प्रमुख हनुमान मंदिर माने जाते हैं.

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संकट मोचन मंदिर के प्रमुख महंत डॉक्टर विशम्भर मिश्रा कहते हैं, ''नए-विद्वान जयंती और जन्मोत्सव में अंतर तक नहीं जानते हैं लेकिन जो सही है और मूल है वो है- हनुमत जयंती. हनुमान जी को पूजने वालों के लिए यह बेहद महत्वपूर्ण दिन होता है. लेकिन इस दिन किसी भी आयोजन, जश्न या समारोह की तुलना में सबसे अधिक महत्व दर्शन का है.''
हनुमानगढ़ी और संकटमोचन में कैसे मनती है हनुमान जयंती
हनुमान गढ़ी के महंत राजू बताते हैं कि रामनवमी के बाद हनुमान जयंती मनाने की परंपरा काफ़ी पहले से चली आ रही है. वह कहते हैं, "जब से राम हैं, तब से हनुमान हैं और यह आयोजन भी तभी से हैं."
वह बताते हैं कि अयोध्या के हनुमान गढ़ी मंदिर में सालों से हनुमान जयंती मनाई जाती रही है. यह आयोजन नौ दिन पहले से शुरू हो जाता है और इस दौरान अलग-अलग तरह के कार्यक्रम होते हैं.
''इस दौरान रामायण का पाठ किया जाता है. सुंदरकांड का पाठ किया जाता है. अखंड सीता-राम संकीर्तन किया जाता है.''
वो बताते हैं कि ये वो तीन मुख्य कार्यक्रम हैं जो हनुमान जयंती के उपलक्ष्य में किए जाते हैं. सालों-साल से इनका आयोजन किया जाता रहा है.
''इन तीन प्रमुख और सुनिश्चित कार्यक्रमों के साथ ही तमाम तरह के आयोजन भी किए जाते हैं. दिवाली के दिन पूर्णाहुति की जाती है. भंडारे और प्रवचन आदि का भी प्रबंध किया जाता है.''

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वहीं संकट मोचन मंदिर में इस दिन के आयोजन पर जानकारी देते हुए डॉक्टर विशम्भर कहते हैं कि ''सबसे पहले, यह समझना ज़रूरी है कि आप इस दिन को मना क्यों रहे हैं. अगर आप उपासक हैं तो सबसे ज़रूरी चीज़ है कि आप ईश्वर के दर्शन करें. इससे ज़रूरी कुछ नहीं. भक्त-भगवान संवाद से ज़रूरी कुछ नहीं."
संकट मोचन में होने वाली तैयारियों पर वह कहते हैं, ''इस दौरान मंदिर को ख़ासतौर पर सजाया जाता है. ईश्वर का श्रृंगार किया जाता है. रामचरितमानस मानस का अखंड पाठ होता है और तीन दिन तक सार्वभौम रामायण पाठ होता है. भोग और प्रसाद वितरण भी किया जाता है.''
क्या पहले भी निकाली जाती रही है शोभा-यात्रा?
जानकार बताते हैं कि शोभा-यात्रा का चलन नया नहीं है, पहले भी निकाली जाती रही हैं शोभा-यात्राएं.
संकटमोचन मंदिर के महंत बताते हैं, ''शोभा-यात्रा निकालना उस दिन को ख़ासतौर पर दर्ज करने या उस दिन की ख़ुशी मनाने का एक तरीक़ा है. जैसे बनारस में भी दो शोभा-यात्राएं निकलती हैं. संकट मोचन मंदिर में एक तो मारवाड़ी समाज की शोभा-यात्रा आती है और दूसरी शोभा-यात्रा भिखारीपुर से आती है. इन शोभा-यात्राओं में बहुत बड़ी संख्या में लोग शामिल होते हैं. लेकिन इन शोभा-यात्राओं में शामिल भीड़ हमेशा से बहुत अनुशासित रही है. ये भक्ति जताने का एक तरीक़ा है.''
वहीं हनुमान गढ़ी के महंत राजू कहते हैं, ''हिंदू धर्म में 'नवधा-भक्ति'(नौ तरह की भक्ति) का ज़िक्र है जिसमें नाचना-गाना, वंदन करना शामिल होता है. ऐसे में शोभा-यात्रा भी उसी का एक हिस्सा है.''
"जो लोग ये सवाल उठा रहे हैं कि हनुमान जयंती पर शोभायात्रा निकाला जाना नया है, उनका ये सवाल ही विचित्र है."

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कितना अलग है मौजूदा शोभा-यात्रा का स्वरूप
दरअसल, विश्व हिंदू परिषद ने देश के कई हिस्सों में हनुमान जयंती के मौक़े पर शोभा-यात्रा निकाली. हैदराबाद में तो बाइक पर शोभा-यात्रा निकाली गई. इस दौरान देश के कई राज्यों से इस दौरान हिंसा और झड़प की ख़बरें आईं.
विश्व हिंदू परिषद के नेता सुरेंद्र जैन कहते हैं कि जो लोग शोभा-यात्रा को लेकर सवाल उठा रहे हैं या तो वे इस दौरान हुई हिंसा के अभियुक्तों को बचाना चाहते हैं या फिर जान-बूझ कर अनजान बनने की कोशिश कर रहे हैं.
डॉक्टर सुरेंद्र जैन कहते हैं, ''जब मुस्लिम समुदाय ताजिया की यात्रा निकालते हैं तो कोई सवाल नहीं उठाता, लेकिन हिंदुओं की यात्रा पर सवाल उठाए जा रहे हैं.''
"जो लोग दिल्ली में शोभा-यात्रा को नया चलन बता रहे हैं, उन्हें बता दें यह कोई नया नहीं है. मैंने ख़ुद दिल्ली में शोभा यात्राएँ देखी हैं."
"विश्व हिंदू परिषद के जन्म से देख लीजिए, क्या राम-जानकी शोभा-यात्रा नहीं निकली…क्या हमारे साधू-संत यात्राएँ नहीं निकालते…हर साल यात्राएँ निकलती हैं और लाखों की संख्या में लोग निकालते हैं."
हालाँकि संकटमोचन हनुमान मंदिर के महंत का मानना है कि दिल्ली में जो शोभा-यात्रा निकाली गई और उसका अंत जिस तरह हुआ, वह दुखी करने वाला है.
डॉक्टर विशम्भर कहते हैं, "निश्चित तौर पर यह परेशान करने वाला और अचरज में भी डालने वाला रहा है. रामनवमी या हनुमान जयंती का आयोजन बहुत लंबे समय से होता रहा है, लेकिन शायद ही इस दौरान कोई अप्रिय घटना हुई हो. ये पहली बार हम देख रहे हैं. हो सकता है कि कुछ अराजक लोग भीड़ का फ़ायदा उठाकर ऐसा कर रहे हों, लेकिन हमने अपने जीवन में ऐसा कभी नहीं देखा."
"शोभा-यात्रा का जो मौजूदा स्वरूप है वो बिल्कुल नया है. पहले कभी भी इस तरह की शोभा-यात्रा नहीं निकलती थी. हमारे मंदिर में जो शोभा यात्रा निकलती, ये भी पंद्रह-बीस साल पुरानी है. लेकिन इस तरह की शोभा-यात्राओं का चलन इसलिए बढ़ रहा है क्योंकि मौजूदा समय में हर व्यक्ति उस होड़ में दिख रहा है कि उसे खुद को धार्मिक दिखाना है. आप धार्मिक हैं ये समाज को दिखाना है. लेकिन अगर आप वाकई धार्मिक हैं और उपासक हैं तो आपको शोर मचाकर ईश्वर की उपासना करने की ज़रूरत नहीं है. आप ईश्वर से मौन संवाद भी कर सकते हैं. आप ग्रुप बनाकर समाज को दिखाना चाहते हैं."
"भगवान और भक्त का संवाद बेहद निजी चीज़ है. ये दिखावे की चीज़ नहीं है. जो लोग ईश्वर को समझते हैं उन्हें ये भी समझना चाहिए कि भगवान भावना से जुड़े हैं, दिखावे की चीज़ नहीं हैं."

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हालाँकि हनुमानगढ़ी के महंत राजू कहते हैं कि शोभायात्रा निकालने में बुराई क्या है. वह कहते हैं, "यह ठीक है कि शोभा-यात्राएं निकाली जा रही हैं, लेकिन इसे लेकर सवाल नहीं होना चाहिए. हर व्यक्ति हर रोज़ दाल-चावल तो नहीं खाता. किसी दिन कुछ तो किसी दिन कुछ, उसी तरह उपासना भी है. किसी दिन किसी तरह से, किसी दिन किसी तरह से. इसमें नियम कहां से आ गया."
देश में धर्म और राजनीति
2020 के दंगों के बाद दिल्ली में ये सांप्रदायिक टकराव का पहला बड़ा मामला है. हालांकि, उस दौरान जहांगीरपुरी में कोई दंगा नहीं हुआ था.
इस घटना को लेकर अलग-अलग प्रत्यक्षदर्शियों के अलग-अलग बयान हैं.
शनिवार की शोभा-यात्रा में गौरीशंकर गुप्ता भी शामिल थे. उन्होंने बताया कि जब यात्रा जहांगीरपुरी 'सी ब्लॉक' की मस्जिद के सामने से निकली तो उस पर पथराव शुरू हो गया.
गौरीशंकर के मुताबिक़ मस्जिद की छत से भी पथराव हो रहा था. हालांकि मस्जिद के प्रबंधक मोहम्मद सलाउद्दीन ने बीबीसी से बातचीत में इस बात से इनकार किया.
घटना की जगह से कुछ ही दूर है जहांगीरपुरी सी ब्लॉक का भीड़ भरा इलाका.
यहां बड़ी संख्या में बंगाली बोलने वाले मुसलमान रहते हैं. यहां हिंसा कैसे शुरू हुई उसे लेकर अलग ही कहानी सुनने को मिलती है.
एक कमरे में बैठे मस्जिद के प्रबंधक मोहम्मद सलाउद्दीन कहते हैं, "हमारे बच्चे आख़िर तक ख़ामोश रहे. जब उन्होंने देखा कि मस्जिद पर कोई हमला हो रहा है या मस्जिद के ऊपर पत्थरबाज़ी हो रही है, तो हम बर्दाश्त तो कर नहीं सकते."
उनके मुताबिक़ मस्जिद के अंदर से कोई पत्थरबाज़ी नहीं हुई और जो हुआ रोड पर ही हुआ.
हालंकि सुरेंद्र जैन मस्जिद को लेकर हुई किसी भी घटना को सच नहीं बताते. वह कहते हैं शोभा-यात्रा में 'भारत माता की जय' या 'जय श्रीराम' के नारे लगाने में क्या हर्ज़ है. वो उस बयान को ग़लत बताते हैं जिसमें दावा किया गया कि शोभा-यात्रा के दौरान 'भारत में रहना है तो रामराम कहना होगा' के भी नारे लगे.
वहीं महंत राजू कहते हैं, ''दुख इस बात का है कि हम हिंदुस्तान में रहते हैं जहां लोकतंत्र है. लोकतंत्र के साथ ही हम सेकुलर भी हैं. तो क्या हिंदुओं को धार्मिक स्वतंत्रता का हक़ नहीं है. आप लोग शोभा-यात्रा निकाले जाने पर सवाल उठा रहे हैं कि ये नया चलन है, अरे लेकिन क्या हमारा मन शोभा-यात्रा निकालने का है तो हमें उसकी इजाज़त नहीं है क्या?"

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जय श्रीराम बनाम जय सियाराम
संकट मोचन मंदिर के महंत कहते हैं, "भगवा झंडा, तलवार लेकर प्रदर्शन करने का स्वरूप कभी रहा ही नहीं है और हनुमान जी के पास भले ही गदा हो, लेकिन जो लोग ख़ुद धर्म के ठेकेदार बने फिर रहे हैं उन्हें पता होना चाहिए कि हनुमान अपने बल का निरर्थक इस्तेमाल नहीं करते हैं. वो तो राम-सीता के प्रति दास भाव वाले हैं. आज के समय में हनुमान का प्रचलित रूप उग्र भले है, लेकिन धार्मिक दृष्टिकोण से उनका ऐसा रूप नहीं है."
वह कहते हैं,''जय श्रीराम को वॉर-क्राई (युद्ध उद्घोषणा) के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है. लेकिन यह वॉर क्राई रामायण में सिर्फ़ उस समय है जब सीता जी का हरण हो गया और राम सीताविहीन हो गए. अगर कोई साधक है तो उसके लिए जय श्रीराम है ही नहीं, उसके लिए तो जय सियाराम है."
एक ओर जहां डॉक्टर जैन आरोप लगाते हैं कि सिर्फ़ एक ही धर्म विशेष के लोगों से शांति बनाए रखने की उम्मीद की जाती है, वहीं डॉक्टर विशम्भर मिश्रा कहते हैं कि मस्जिद पर भगवा लहराना और ऐसी ही दूसरी हरकतें, ये सब बेकार की बातें हैं.
वह कहते हैं, "मंदिर पर भगवा लहराता है तो क्या आपको गर्व नहीं होता है जो आपको मस्जिद पर भी भगवा फहराना है."
डॉक्टर विशम्भर मिश्रा धर्म और राजनीति को अलग-अलग रखने की सलाह देते हैं. उन्होंने कहा, "धर्म पर बात करने का अधिकार हमारे धर्म के शीर्ष लोगों को है. हमारे चार शंकराचार्य हैं. राजनीतिक लोगों को धर्म की व्याख्या नहीं करनी चाहिए और वे इसके लिए पदेन भी नहीं हैं. लेकिन भ्रम सिर्फ़ इसलिए है क्योंकि इसे राजनीतिक फ़ायदे के लिए इस्तेमाल करना है. राजनीतिक लोग धर्म के बारे में क्या बताएंगे?"
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