राजस्थान करौली हिंसा: नेत्रेश शर्मा की गोद में यह बच्ची कौन थी?- ग्राउंड रिपोर्ट

ढाई साल की बच्ची पीहू को बचाकर बाहर निकालते पुलिसकर्मी नेत्रेश शर्मा

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इमेज कैप्शन, ढाई साल की बच्ची पीहू को बचाकर बाहर निकालते पुलिसकर्मी नेत्रेश शर्मा
    • Author, विनीत खरे
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, करौली से

राजस्थान के करौली ज़िले में अपने परिवार की दुलारी, ढाई साल की नटखट पीहू. कलेक्टरेट के नज़दीक पहले मंज़िल पर किराए के हवादार घर में जब हम पहुँचे तो वो अपने माँ-बाप के साथ गुब्बारे के लिए ज़िद कर रही थीं, लेकिन जब उन्हें गुब्बारा मिलता तो उसे फेंक देती और माँ की गोद में चिपक जातीं.

जब वह बड़ी होंगी तो वायरल हुई उस तस्वीर के बारे में वो क्या सोचेंगी, जिसमें पुलिसकर्मी नेत्रेश शर्मा उन्हें एक स्टोल में लपेटकर आग की लपटों से दूर भाग रहे थे.

तस्वीर में थोड़ी ही दूर पीछे उनकी मां विनीता अग्रवाल पीछे भागती नज़र आती हैं.

दो अप्रैल को नवरात्र के पहले दिन विनीता अपनी देवरानी और उनकी भाभी के साथ फूटाकोट बाज़ार शॉपिंग के लिए गई थीं कि तभी वहाँ भगदड़ सी शुरू हो गई.

दुकानदारो ने दुकानें बंद करनी शुरू कर दीं. शटर पर पत्थरों के टकराने की आवाज़ें सुनाई देने लगीं.

इस पूरे वक़्त पीहू नींद में थीं.

पीहू की माँ विनीता
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सोती पीहू को कंधे पर लिपटाकर विनीता एक घर में घुस गईं. उन्होंने पति हरिओम अग्रवाल को कॉल करके स्थिति बताई लेकिन अपना लोकेशन नहीं बताया कि कहीं उन्हें बचाने के चक्कर में वो भी न फंस जाएं.

उन पलों को याद करते हुए वो कहती हैं, "डर तो लग रहा था. सोचा नहीं था कि ऐसा कुछ हो जाएगा. डर तो अंदर से आ जाता है. गुड़िया छोटी सी है. ऐसा सोचो तो आँसू अपने आप ही आ जाते हैं."

जब पुलिस आई तब उन्हें नेत्रेश शर्मा और अन्य पुलिसकर्मियों की मदद से निकाला गया और उस दिन शाम स्थानीय दैनिक भास्कर पत्रकार उमेश शर्मा की खींची वो तस्वीर वायरल हो गई.

विनीता कहती हैं, "उन्होंने बोला आप निकलो बाहर यहाँ से, ये (छत) गिर जाएगी. बाहर निकले तो आग ही आग थी. उन्होंने गुड़िया को पकड़ा. उन्हीं की बदौलत मैं बाहर निकल पाई. उन्हें तो मैं बहुत धन्यवाद देना चाहती हूँ कि उनकी बदौलत हम आज बैठे हैं, आपके सामने."

उसी दिन से अब शहर में कर्फ्यू है. इंटरनेट सुविधाएं बंद हैं. कर्फ़्यू में छूट मिलते ही लोग दुकानों पर ख़रीदारी के लिए टूट पड़ रहे हैं.

करौली हिंसा

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करोड़ों का नुक़सान, कई घायल

करौली की जनसंख्या क़रीब एक लाख के क़रीब है और मुस्लिम आबादी 20 प्रतिशत के क़रीब.

दो अप्रैल को हिंदू नववर्ष के मौक़े पर हिंदू संगठनों ने बाइक यात्रा निकाली थी. आरोप है कि इस यात्रा में शामिल एक डीजे गाड़ी से कथित तौर पर मुसलमानों को लेकर विवादित गाने बज रहे थे.

यात्रा में शामिल लोगों ने बीबीसी को बताया कि जब रैली हठवाड़ा बाज़ार की संकरी गली से गुज़र रही थी तो "पूर्व - नियोजित हमले में" कुछ घरों की छतों से पत्थर फेंके गए और रैली में शामिल लोगों पर लाठियों से हमला किया गया. इसमें कई लोग घायल हो गए. उस वक़्त की अफ़रातफ़री की तस्वीरें, वीडियो वायरल हो चुके हैं

इस रैली में सैकड़ों लोग शामिल थे. उस दिन हुई हिंसा में कई दुकानों, गाड़ियों में आग लगा दी गई.

करौली के ज़िला मैजिस्ट्रेट आरएस शेखावत ने बताया कि मामले की जांच के लिए "एडिशनल एसपी के नेतृत्व में एक एसआईटी की टीम का गठन किया गया है, जिसमें सभी तरह के एक्सपर्ट्स हैं, जो अपना काम कर रहे हैं. घटना क्यों हुई, कैसे हुई, ये जाँच का विषय है."

क्षतिग्रस्त वाहन

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प्रशासन के मुताबिक़ दो अप्रैल की हिंसा में 71 प्रॉपर्टीज़ को नुक़सान पहुँचा, जिसमें पाँच मकान भी शामिल थे.

साथ ही पथराव और हिंसा में छह पुलिसकर्मियों सहित 22 लोग घायल हुए, जिनमें से पाँच को गंभीर चोट लगी. फूटाकोट बाज़ार और हठवाड़ा बाज़ार में हुई तबाही में लगभग सवा दो करोड़ रुपए का आर्थिक नुक़सान हुआ.

ये बाज़ार बेहद संकरी गलियों में बसे हैं, जहाँ दुकानें एक दूसरे के बेहद नज़दीक बनी हैं और भीड़भाड़ में गाड़ियों से निकलना भी आसान नहीं.

एक अधिकारी के अनुसार, दुकानों में लाख की चूड़ियां जलने से दमकल भी आग को काबू नहीं पा रही थीं. साथ ही दुकानें इतनी नज़दीक थीं कि आग एक दुकान से दूसरी दुकान तक फैलती चली गई.

करौली हिंसा

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आख़िर दो अप्रेल को क्या हुआ?

घटना को लेकर कई सवाल हैं, जिसे लेकर सही जवाब नहीं मिल पा रहा है और कोई सही उत्तर नहीं दे पा रहा है. जितने मुँह उतनी बातों वाली स्थिति है.

हठवाड़ा बाज़ार में रहने वाले पार्षद मतलूब अहमद की पत्नी नौशीन अहमद के मुताबिक़, "रैली में ज़ोर-ज़ोर से नारे लग रहे थे. टोपी वाला भी सिर झुकाकर एक दिन जय श्रीराम बोलेगा."

आरोप है कि ये नारे या गाने रैली में मौजूद एक डीजे गाड़ी पर बज रहे थे.

पुलिस को मतलूब अहमद की तलाश है. उनके घर के सामने और आसपास पुलिस का पीला सेफ़्टी फ़ीता लगा हुआ है और आरोप हैं सड़क के इसी हिस्से पर मौजूद घरों की छतों से रैली में शामिल लोगों पर पथराव हुआ था.

नौशीन का आरोप है कि उनके पति को फँसाया जा रहा है. उनके मुताबिक़ उस दिन उनके पति तो घायलों की मदद कर रहे थे, उनका ख़ून साफ़ कर रहे थे.

हम जब नौशीन के घर पहुँचे तो वहाँ सिर्फ़ महिलाएं और बच्चे थे. एक बच्चे को बुखार था, घर में थर्मामीटर नहीं था और और दवा ख़त्म हो चुकी थी.

सड़क सूनसान थी. घर के नीचे कुर्सी पर दो पुलिसकर्मी बैठे हुए थे. सड़क पर थोड़ी-थोड़ी देर में पुलिस की गाड़ियां गुज़रने की आवाज़ आ रही थी.

नौशीन कहती हैं कि दो अप्रैल की शाम वो बैठकर सिलाई कर रही थीं, जब उन्होंने रैली के नारे सुने.

वो कहती हैं, "ऐसे नारे सोचकर हर इंसान को बुरा ही लगता है, उनको बोलना भी नहीं चाहिए, ऐसे नारे. आपका दीन आपके लिए, हमारा दीन हमारे लिए."

डीजे गाड़ी के मालिक सोनू प्रजापति
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डीजे गाड़ी के मालिक सोनू प्रजापति ने बीबीसी को बताया उस दिन यात्रा में शामिल लोग नाच रहे थे, श्रीराम का नारा लगा रहे थे और "टोपी वाला गाना चल रहा था."

प्रजापति ने बताया कि हिंदू समाज के एक नेता ने दो अप्रैल के लिए इस गाड़ी को 5,100 रुपए में बुक किया था. हमने जब उस नेता से बात करने की कोशिश की तो उनका फ़ोन स्विच ऑफ़ था.

एक सूत्र के मुताबिक़ यात्रा से जुड़े कई लोग गिरफ़्तारी के डर से चुप हैं और उन्होंने अपना फ़ोन बंद कर दिया है.

प्रजापति के साथ काम करने वाले और गाड़ी के डीजे रवींद्र पुनिया के मुताबिक़ रैली में "मुसलमानों को भड़काने को लेकर कोई नारेबाज़ी नहीं हो रही थी. रैली शांतिपूर्ण चल रही थी."

रवींद्र ने बताया कि गाड़ी में किसी ने अपना मोबाइल लगा दिया था, जिसके गाने बज रहे थे. उन्हें गानों के बोल याद नहीं और वो कहते हैं कि गाड़ी से धार्मिक गाने चल रहे थे.

दो अप्रैल की हिंसा में ये गाड़ी क्षतिग्रस्त हुई, जिससे सोनू प्रजापति को पाँच से छह लाख रुपए का नुक़सान हुआ.

उस दिन दोनों सोनू और रवींद्र पत्थरों और लाठियों से बचने के लिए इसी गाड़ी के भीतर एक केबिन में छिप गए और पुलिस के आने के बाद ही वहाँ से निकले.

अभी ये गाड़ी कोतवाली थाने में खड़ी है.

करौली हिंसा

घायलों की कहानी

उस दिन रैली में शामिल और घायल होने वालों में 70 वर्षीय मदनमोहन स्वामी भी थे, जो ख़ुद को भाजपा कार्यकर्ता बताते हैं.

उन्होंने बताया कि वो एक गाड़ी में बैठे थे, जब एक पत्थर गाड़ी की फ्रंट विंडशील्ड पर लगा, जिसका एक टुकड़ा उनके होंठ को काट गया. उसके बाद तड़ातड़ पत्थरों की बौछार होने लगी.

जब वो किसी तरह गाड़ी से बाहर निकले तो उन पर लाठियों से हमला हुआ, जिससे दाएं कंधे और पीछे पीठ पर चोट लग गई.

मदनमोहन स्वामी का आरोप है कि उन पर हमला करने वाले मुस्लिम युवक थे.

उनकी स्थिति अब बेहतर है और वो हृदय रोग की नियमित जांच के सिलसिले में दिल्ली में हैं.

रैली में शामिल मदनमोहन स्वामी का दावा है कि रैली में मुसलमानों को भड़काने वाला कोई गाना नहीं चल रहा था.

यात्रा में शामिल आरएसएस से जुड़े केसर सिंह नरुका ने बताया कि उन्होंने डीजे पर टोपी जैसा गाना नहीं सुना और "एक ही नारा एक ही नाम, जय श्री राम, जय श्रीराम, यही गाना डीजे पर चल रहा था."

वो भी याद करते हैं कि कैसे रैली पर पत्थरों की बारिश शुरू हो गई.

नरुका के मुताबिक़ यात्रा में "हिंदू समाज के कार्यकर्ता थे, आरएसएस, बजरंग दल, और विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ता थे."

पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि डीजे गाड़ी से कथित तौर पर बजे विवादित गानों की जांच हो रही है.

उन्होंने बताया कि आयोजकों के यात्रा निकाले जाने की कुछ शर्तें थीं, जैसे वहाँ डीजे की परमिशन नहीं थी लेकिन ऐसा हुआ. साथ ही ये भी शर्त थी कि क्रिमिनल बैकग्राउंड का कोई भी व्यक्ति यात्रा में नहीं होना चाहिए.

करौली हिंसा

तबाही

दो अप्रैल की हिंसा में संजय सोनी सहित दर्जनों की दुकानें और घर तबाह हो गए. जब हिंसा हुई तो संजय सोनी के घर में उनकी पत्नी और तीन बच्चे थे.

वो कहते हैं कि जब वो वापस आए तो आग की लपट निकल रही थी.

वो कहते हैं, "पुलिसवालों को बुला-बुलाकर मैंने बच्चे उनकी गोद में दिए. घर की तौलिया में लपेट लपेटकर बच्चे दिए हैं ताकि बच्चों को नुक़सान न हो."

अब वो बेघर हैं. शुरुआती दो-तीन दिन उन्होंने पड़ोसियों के यहाँ रात बिताई थी, वहीं खाना खाया.

संजय सोनी
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उन्होंने इशारा करके बताया कि किन-किनके घर, दुकानें तबाह हो चुके हैं- "नेमीचंद जी, आगे हरिचरण जी, इधर ये युनुस बैंगल स्टोर, आबिद बैंगल स्टोर जिनका ऊपर उनका मकान है सब तबाह चुका था."

"ये पता नहीं किसने किया ये. इसमें हिंदू और मुसलमान दोनों की दुकानें गई हैं. इसमें दोनो पक्षों का नुकसान हुआ है."

मीडिया के एक हिस्से में दंगाइयों और पुलिस के बीच कथित संपर्क को लेकर दिखाए गए वीडियो पर करौली के एसपी शैलेंद्र सिंह ने बीबीसी से कहा, "10-20 सेकेंड के वीडियो क्लिप के आधार पर पूरे घटनाक्रम का फ़ैसला नहीं किया जा सकता."

पत्रकार उमेश शर्मा
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घटना का असर

पत्थरबाज़ी और आगज़नी की घटनाएं ख़त्म होने के ठीक बाद स्थानीय दैनिक भास्कर पत्रकार उमेश शर्मा मौक़े पर पहुँचे थे.

जब वह वहाँ पहुँचे तो पुलिसकर्मी घायलों को अस्पताल ले जा रहे थे. कई मोटरसाइकिलें रास्ते पर क्षतिग्रस्त पड़ी हुई थीं. तीन चार लोग घायल अवस्था में दुकान में पड़े हुए थे. सभी परेशान थे, लोग मदद के लिए चिल्ला रहे थे.

बिजली के तारों में स्पार्किंग हो रही थी क्योंकि लाइट चालू थी. ऐसे में लाइट बंद करवाई गई.

पूर्व की घटनाओं की याद दिलाते हुए उमेश शर्मा कहते हैं, "वर्ष 2006 में एक दंगा हुआ था और एक 2012-13 के आसपास दंगा हुआ था, लेकिन ऐसा दंगा कभी नहीं हुआ. ये बहुत ही बड़ा रूप है, इस दंगे का. इतने वक़्त के लिए यहाँ कर्फ़्यू कभी नहीं लगा."

वो कहते हैं, करौली ज़िला हमेशा से भाईचारे की मिसाल रहा है, यहाँ हिंदू-मुस्लिम भाईचारा बनाकर रहे हैं. जब आगज़नी की घटना हुई, तो ऐसे कई उदाहरण मिले हैं, जिसमें हिंदू महिला पुरुष अपनी जान बचाने के लिए मुस्लिम के घर में छिपे हुए थे और मुस्लिम हिंदू के घर में छिपे हुए थे."

"लेकिन कुछ असामाजिक तत्वों ने, हम समाज विशेष नहीं कहेंगे, इस माहौल को ख़राब करने की कोशिश की है जिनके लिए पुलिस कार्रवाई कर रही है."

वो कहते हैं कि इस घटना का आसपी संबंधों पर "आंशिक रूप से असर तो पड़ेगा."

"जिसका भी नुक़सान हुआ है वो ग़रीब तबके के लोग थे. उनका तो सामान था लेकिन जो बिल्डिंग हैं वो अधिकांश हिंदुओं की हैं. नुकसान दोनो समाजों का बराबर से हुआ है."

राजस्थान में ये सब ऐसे वक़्त हो रहा है जब विधानसभा चुनाव नज़दीक आ रहे हैं.

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