यूक्रेन से नवीन के शव का इंतज़ार कर रहे पिता के थम नहीं रहे आंसू

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- Author, इमरान क़ुरैशी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
शेखरप्पा ज्ञाननागोउदर जब नवीन के बचपन के बारे में ये बता रहे थे कि कैसे उनकी मां ने उन्हें (नवीन को) लड़कियों के कपड़े पहनाए थे, तब बस एक बार उनके चेहरे पर मुस्कान तैरती है.
नहीं तो, वे युद्ध से घिरे युक्रेन में गोली लगने से हुई अपने बेटे की मौत का ग़म बांटने उनके घर पर आने वालों की भीड़ के बीच, एक उदास चेहरा लिए बैठे हैं. नवीन यूक्रेन में मेडिसिन की पढ़ाई कर रहे थे.
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शेखरप्पा ने बीबीसी से कहा, "वास्तव में मेरी पत्नी चाहती थी कि हमारे यहां बेटी हो. तो उन्होंने उसे बेटी की तरह फूलों और कपड़ों से सजा कर तैयार किया था. वो उसे लड़की के ड्रेस में तैयार कर अपना सपना पूरा कर रही थीं. तब नवीन ने भी खूब मजे किए थे. कल से ही मैं वो सब बातें याद कर रहा हूं."
शेखरप्पा को अपने बेटे की मौत के बारे में भारतीय विदेश मंत्रालय के एक अधिकारी ने उसी दिन जानकारी दी थी जब महाशिवरात्रि का त्योहार मनाया जा रहा था. नवीन खारकीएव मेडिकल यूनिवर्सिटी में चौथे साल की पढ़ाई कर रहे थे.
उस दिन वो अपने बेटे से बात नहीं कर सके थे. नवीन ने उनसे कहा था कि वो कुछ किराने का सामान ख़रीदने और अपने अपार्टमेंट के नीचे बने बंकर में नाश्ता करने के बाद उनसे बात करेंगे, यहां वो अपने कुछ दोस्तों के साथ रह रहे थे.
जब से तीखे आरोप-प्रत्योरोपों से होते हुए रूस और यूक्रेन के बीच लड़ाई छिड़ी तब से नवीन अपने माता-पिता से लगातार फ़ोन पर बतियाते रहते थे. शायद उन्हें इस बात की चिंता थी कि उनके माता-पिता उन्हें लेकर परेशान होंगे.
नवीन के पिता शेखरप्पा कहते हैं, "वो दिन में तीन से चार बार फ़ोन किया करता था. वो हमें वहां की स्थिति के बारे में बताता था. हम उससे खाने और उसकी कुशलता के बारे में पूछते. वो हमसे उसके बारे में चिंता नहीं करने को कहता था. कहता था कि वो अकेला नहीं है. वो बताता था कि हम एक ग्रुप में हैं."
उन्होंने कहा, "मंगलवार को वो आखिरी कॉल आई थी. आम तौर पर वो पढ़ाई के लिए सुबह उठा करता था. तो उस दिन भी जल्दी उठा था और कॉल करके बताया था कि वो बंकर में नाश्ता करने जा रहा है. मैं घर पर नहीं था. खेत पर था. तो उसने घरवालों को बताया कि नाश्ता करने के बाद वो फ़ोन करेगा."

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पेशे से मैकेनिकल इंजीनियर रहे शेखरप्पा, एक प्राइवेट कंपनी से रिटायर होने के बाद खेतीबाड़ी करते हैं.
उस दिन उन्होंने कई बार फ़ोन किया, रिंग होता रहा लेकिन उधर से जवाब नहीं मिला, फिर दो बजे दोपहर में उन्हें भारतीय विदेश मंत्रालय से ये दुखद ख़बर मिली.
"हम दोनों एकदम से टूट गए. और रोने लगे. हमारे पड़ोसी और गांव वाले आए. वो बहुत ही मुश्किल घड़ी थी. हमें अब भी लगता है कि हमारा बेटा यहीं कहीं है."
"वो डॉक्टरी की पढ़ाई का अपना सपना पूरा करने में जुटा था लेकिन बीच में ही वो सब छोड़ कर चला गया. मैंने अपना बेटा भी खो दिया. हमें ये भी नहीं पता कि अब तक उसकी बॉडी कहां है. लेकिन अभी उनकी आत्मा यहीं है." यह कहते हुए शेखरप्पा भरभरा कर रो पड़े.

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बचपन में नवीन कैसे थे?
शेखरप्पा कहते हैं, "बचपन में वो नटखट था. हमेशा अपने रिश्तेदारों, दोस्तों और अपनी मां से बातें करता रहता था. एक छात्र के रूप में वो कड़ी मेहनत करता था. अपनी पढ़ाई के लिए उनसे ट्यूशन भी नहीं लिए थे. 10वीं में उसे 95% आए थे. प्री-यूनिवर्सिटी में 95% से भी अधिक मिले थे. लेकिन दुर्भाग्य से उसे अपने देश में मेडिकल सीट नहीं मिल सकी."
वे कहते हैं, "वो एक सीट के लिए दो करोड़ की मांगते हैं. हम मध्यमवर्गीय लोग हैं. इतने पैसे कहां से लाएंगे. हमने क़रीब छह महीने तक प्राइवेट सेक्टर में बहुत कोशिशें कीं. सीट नहीं मिल पाने पर वो बहुत तनाव में था. हमारे गांव में कुछ सीनियर स्टूडेंट भी हैं जो यूक्रेन में पढ़ रहे हैं. उसने उनसे वहां रहने पर आने वाले खर्च और बाकी चीज़ों को लेकर बातें कीं. उतना खर्च हम उठा सकते थे. ये खर्च यूक्रेन में पांच से छह लाख सालाना था."
नवीने के दोस्तों और सगे संबंधियों ने उनके पिता को उन्हें भेजने और उनका सपना पूरा करने के लिए मनाया. और इस तरह शेखरप्पा ने नवीन को यूक्रेन भेजने के लिए कर्ज़ उठाया.
वे कहते हैं, "अब तक मैंने 30 लाख रुपये खर्च किए हैं. केवल वहां पढ़ाई का खर्चा सस्ता है, लेकिन वहां रहना और ट्रांसपोर्ट थोड़ा महंगा है. यूक्रेन आने जाने में एक लाख खर्च हो जाता है. कोर्स में दाखिले के बाद वो केवल तीन बार भारत आया था."

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शेखरप्पा यूक्रेन के एजुकेशन सिस्टम की तारीफ़ करते हैं. कहते हैं, "वे भारत से बेहतर हैं. पढ़ाई और उपकरण बहुत अच्छे हैं. पता नहीं भारत में वही पढ़ाई इतनी महंगी क्यों है? मध्यम वर्ग के लोग इतने पैसे कैसे दे सकते हैं. मुझे नहीं पता कि भारतीय सिस्टम कहां फेल हुआ, बहुत सारे प्रतिभाशाली भारतीय पढ़ाई के लिए बाहर जा रहे हैं."
नवीन डॉक्टरी पढ़ने के बाद अपने गांव में प्रैक्टिस करना चाहते थे. उन्हें मालूम था कि गांव में कम मेडिकल सुविधाएं उपलब्ध हैं और उचित इलाज के लिए लोगों को बेंगलुरु या मंगलुरु जाना पड़ता है.
पिता शेखरप्पा कहते हैं, "वो समाज सेवा के लिए प्रतिबद्ध था."
"उसकी पढ़ाई के लिए मैंने कर्ज़ लिया था क्योंकि मेरी आर्थिक स्थिति उतनी अच्छी नहीं थी. वो कहता था कि आप चिंता न करें पापा डॉक्टर बनने के बाद मैं घर बनवाउंगा और आपकी देखभाल करूंगा."
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