यूक्रेन पर रूसी हमला कहाँ ले जाएगा, विशेषज्ञों की राय

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यूक्रेन और रूस के बीच छिड़ा युद्ध अब आठवें दिन में पहुँच गया है. रूसी सेना लगातार यूक्रेन की राजधानी कीएव समेत तमाम अन्य शहरों पर क़ब्ज़ा जमाने की कोशिश कर रही हैं.
यूक्रेन के दूसरे सबसे बड़े शहर खारकीएव पर रूसी फौज लगातार हमले कर रही है, जिसमें कई सरकारी भवनों को निशाना बनाया गया है. इसी शहर के नगर परिषद भवन पर क्रूज़ मिसाइल से हमला किए जाने की ख़बरें आ रही हैं.
माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में रूस की ओर से आक्रामकता बढ़ सकती है, जिससे दोनों पक्षों को भारी जानमाल की हानि हो सकती है.
इस जंग को रोकने की दिशा में अमेरिका, जर्मनी, ब्रिटेन समेत तमाम मुल्क रूस और उनके सहयोगियों पर आर्थिक प्रतिबंध लगा रहे हैं.
इन प्रतिबंधों की वजह से रूस की मुद्रा में भारी गिरावट दर्ज की गई है. लेकिन अब तक ये स्पष्ट नहीं हो रहा है कि ये आर्थिक प्रतिबंध युद्ध रोकने की दिशा में कितने कारगर साबित होंगे.
बीबीसी ने यूक्रेन संकट पर आधारित अपने एक विशेष कार्यक्रम में पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल वीपी मलिक और अमेरिका में भारतीय राजदूत रहीं मीरा शंकर से बात करके इन सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश की है.
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क्या रूसी फौजों से कोई ग़लती हुई?
रूस और यूक्रेन युद्ध शुरू होने से पहले तक ये माना जा रहा था कि रूस को इस युद्ध में एक आसान जीत मिल सकती है.
लेकिन युद्ध के सात दिन गुजरने के बाद अब ये राय बदलती हुई दिख रही है.
रूस की सैन्य रणनीति, शुरुआती बढ़त और फिर उसकी गति में कमी आने पर जनरल वीपी मलिक कहते हैं -
"पुतिन और रूस की सेना ने पहले तीन दिन तेज़ सैन्य अभियान चलाया, उसके बाद में उन्होंने अपना मोमेंटम खो दिया. इसकी दो वजह हो सकती हैं, एक वजह तो शायद ये हो सकती है कि वो समझते थे कि तब तक यूक्रेन के राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की हथियार डाल देंगे. यूक्रेन की सेना हथियार डाल देगी, जो नहीं हुआ.
इसके बाद यूक्रेन को अपनी फौजों को पुन: संगठित करने का मौक़ा मिल गया. दूसरे देशों से मदद भी आना शुरू हो गई, जिससे उनका मनोबल भी बढ़ गया. मैं समझता हूँ कि ये रूसी सेना की ग़लती थी कि उन्होंने तीन या चार दिन के बाद अपना मोमेंटम छोड़ दिया.
इस ग़लती की वजह से उन्हें अब काफ़ी नुकसान उठाना पड़ेगा. इस समय यूक्रेन की सेना का मनोबल काफ़ी ऊँचा है. उन्हें मदद मिल रही है. उन्होंने अपने आपको विशेष रूप से शहरों में एक बार फिर संगठित कर लिया है. शहरों में हमेशा लड़ाई के हालात ख़राब होते हैं, उसमें बचाव करने वाले पक्ष को ज़्यादा फ़ायदा मिलता है. इसमें देरी भी होती है. जानमाल का नुकसान भी ज़्यादा होता है.
लेकिन यहाँ ये कहना ज़रूरी है कि रूस परेस्पशन बैटल यानी लोगों की नज़र में युद्ध हार चुका है. इसके साथ ही उसे यूक्रेन, विशेषत: कीएव समेत अन्य शहरों को जीतने में बहुत दिक्कत आएगी."

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सैन्य युद्ध कितना लंबा चलेगा?
लेकिन सवाल ये उठता है कि रूस और यूक्रेन के बीच सैन्य युद्ध कितना लंबा चलेगा.
ये सवाल इसलिए अहम है क्योंकि हालिया ख़बरों में यूक्रेन की ओर बढ़ते रूसी सैन्य काफ़िले की जानकारी आ रही है.
इसके साथ ही ये भी माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में रूस की ओर से आक्रामकता में इज़ाफा हो सकता है.
जनरल वीपी मलिक की मानें तो परेस्पशन वॉरफेयर या मनोवैज्ञानिक युद्ध भी रणनीति का ही हिस्सा होता है.
वह कहते हैं -
"आजकल परेस्पशन और मनोवैज्ञानिक युद्ध की अहमियत ज़्यादा बढ़ती जा रही है. ये बात सही है कि रूस की फौजें बहुत ताक़तवर हैं और यूक्रेन की फ़ौज उनका मुक़ाबला नहीं कर सकती है.
लेकिन रूस को अपने राजनीतिक मक़सद यानी यूक्रेन के राष्ट्रपति को हटाने और उनकी फौजों को खदेड़ने को हासिल करने में बहुत दिक्कतें आएंगी. आप जितनी भी फौजें ले आएं, शहर के अंदर सेनाएं लड़ाई नहीं करना चाहती हैं.
लेकिन अब ऐसा लगता है कि रूस की फौजों को शहर के अंदर, विशेष रूप से कीएव के अंदर जाना पड़ेगा. यूक्रेन की सेना के पास कम हथियार हैं लेकिन उनके पास जेवलिन 80 जी एम जैसे एंटी टैंक हथियार हैं. इसके साथ ही स्टिंजर मिसाइल जैसे एंटी - एयरक्राफ़्ट वेपन हैं. इससे उन्हें काफ़ी नुकसान उठाना पड़ेगा. ऐसे में ये लड़ाई ज़्यादा देर तक चलेगी और दोनों ओर से जानमाल का नुकसान बहुत ज़्यादा होगा."

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युद्ध रोकने में कारगर नहीं आर्थिक प्रतिबंध?
अमेरिका से लेकर ब्रिटेन समेत कई देशों ने रूसी बैंकों, उद्योगों और व्यवसायियों पर कड़े प्रतिबंध लगाए हैं. और जैसे-जैसे युद्ध आगे बढ़ रहा है, इन देशों की ओर से प्रतिबंधों का स्तर भी बढ़ता दिख रहा है.
रूसी मुद्रा में भारी गिरावट दर्ज की जा रही है. लेकिन इसके बावजूद रूसी आक्रामकता कम होने के संकेत नहीं मिल रहे हैं.
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या ये प्रतिबंध युद्ध रोकने की दिशा में कारगर साबित होंगे. यूरोप से लेकर अमेरिका में तमाम लोग इन प्रतिबंधों की प्रभाविकता पर सवाल उठा रहे हैं.
हमने इसी मुद्दे पर अमेरिका में भारतीय राजदूत रहीं मीरा शंकर से बात की.
मीरा शंकर मानती हैं कि यूरोपीय देशों द्वारा इस मसले पर किए जाने वाले एलानों को बयानबाजी मात्र नहीं मानना चाहिए.

मीरा शंकर इस मुद्दे पर कहती हैं -
अमेरिका और यूरोपीय देशों ने रूस पर काफ़ी कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए हैं. पहले भी आप देखें, जब शीत युद्ध चल रहा था, तब भी अमेरिका और नेटो ने कभी भी रूस या वार्सा पैक्ट को यूरोप में सीधे-सीधे चुनौती नहीं दी. इससे परमाणु युद्ध छिड़ने की आशंका बढ़ती है.
दूसरे देशों, विकासशील देशों में, एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका में उनके छद्म युद्ध ज़रूर चले. लेकिन यूरोप में कभी भी सीधे-सीधे सैन्य टकराव नहीं किया गया.
अब भी वही चल रहा है. लेकिन इस बार अमेरिका ने पहले से बहुत ही कड़े आर्थिक प्रतिबंध तैयार किए. और ये भी बता दिया कि अगर रूस यूक्रेन पर आक्रमण करता है तो हम ये आर्थिक प्रतिबंध लगाएंगे. इस बार अमेरिका को अपने पीछे यूरोप को एकजुट करने में सफलता मिली.

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शुरू में जर्मनी नहीं चाह रहा थी कि इतने कड़े प्रतिबंध लगाए जाएं. अमेरिका का एक निशाना नॉर्ड स्ट्रीम 2 पाइपलाइन पर भी था जो कि शुरू होने वाली थी. अमेरिका चाहता था कि इस पर रोक लगाई जाए. पहले जर्मनी ये नहीं चाहता था. लेकिन बाद में जर्मनी ने ख़ुद ही इसे निलंबित किया. अमेरिका ने भी नॉर्ड स्ट्रीम 2 पर प्रतिबंध लगाए हैं.
अगर आप लंबे तौर पर देखें तो यूरोप की रूस पर जो ऊर्जा से जुड़ी निर्भरता थी, वह कम हो जाएगी. रूस पर भी इन आर्थिक प्रतिबंधों का काफ़ी प्रभाव पड़ेगा. रूबल पहले ही तीस प्रतिशत तक गिर गया है. रूस के कई बैंकों को स्विफ़्ट सिस्टम से बैन कर दिया गया है.

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रूस के सेंट्रल बैंक की जो रिज़र्व्स (संपत्ति) बाहर के बैंकों में रखी है, उसे फ्रीज़ कर दिया गया है. रूसी लोगों को अब अपने बैंक में 20 फीसद ब्याज़ देना पड़ रहा है क्योंकि लोग घबराकर बैंक से पैसा निकाल रहे थे. इसे रोकने के लिए ब्याज़ दरें बढ़ा दी गई हैं.
रूस के साथ ऊर्जा के क्षेत्र में सहयोग करने वाली तमाम कंपनियों जैसे ब्रिटिश पेट्रोलियम वहाँ से निकल रही हैं. ऐसे में मुझे लगता है कि रूस को दिक्क़तों का सामना करना पड़ेगा. लेकिन इसे संदर्भ के साथ भी देखना चाहिए. मुझे लगता है कि अमेरिका और पश्चिमी देशों ने रूस को जो सुरक्षा को लेकर वैध चिंताएं थीं, उन्हें नज़रअंदाज कर दिया. और युद्ध को रोकने का मौका खो दिया.
और जहां तक इस युद्ध पर आर्थिक प्रतिबंधों के प्रभाव का सवाल है तो अभी ये नहीं कह सकते कि ये युद्ध ख़त्म करने में कारगर हो सकते हैं. क्योंकि युद्ध अभी और तेजी से बढ़ रहा है और ये नहीं कह सकते कि इन प्रतिबंधों से युद्ध ख़त्म हो जाएगा."
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