उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावः फिर एक्शन में किसान, क्या बीजेपी होगी परेशान?

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- Author, सरोज सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
10 फरवरी को उत्तर प्रदेश में पहले चरण की वोटिंग है. इस चरण में बीजेपी के चुनाव प्रचार की कमान संभाले गृह मंत्री अमित शाह, पिछले कुछ दिनों से लगातार जयंत चौधरी को अपने साथ आने का ऑफ़र दे रहे हैं.
क़रीब -क़रीब हर सभा में वो उनका नाम एक बार तो ले ही लेते हैं.
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि 'अखिलेश-जयंत की जोड़ी' ने बीजेपी की टेंशन पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बढ़ा दी है.
लेकिन अब इस इलाके में बीजेपी की एक और टेंशन की वजह किसान भी बन सकते हैं.
तीनों कृषि क़ानून वापस लेने के बाद, किसान धरने पर से उठ गए हैं, लेकिन बीजेपी के ख़िलाफ़ अब कुछ किसान चुनाव प्रचार करने में जुट गए हैं.
यूपी चुनाव शुरू होने से ठीक हफ़्ता भर पहले संयुक्त किसान मोर्चा ने 'मिशन उत्तर प्रदेश' मुहिम लॉन्च करने का ऐलान किया है.
उनका कहना है कि किसानों का धरना स्थगित हुआ था पर आंदोलन ख़त्म नहीं हुआ है.
संयुक्त किसान मोर्चा से सरकार के वादों पर दोबारा से चर्चा की, जिसके बाद 'मिशन उत्तर प्रदेश' लॉन्च करने का ऐलान किया है.

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क्या है 'मिशन उत्तर प्रदेश'?
संयुक्त किसान मोर्चा का कहना है कि बीजेपी एक ही भाषा समझती है - 'वोट, सीट और सत्ता' की.
मिशन उत्तर प्रदेश के तहत वो प्रदेश के किसानों से बीजेपी को वोट ना देने की अपील करेंगे.
उत्तर प्रदेश के नौ ज़िलों में जाकर बीजेपी के ख़िलाफ़ जनसभा और प्रेस कॉन्फ्रेंस करेंगे.
ये ज़िले हैं - मेरठ, मुरादाबाद, लखनऊ, कानपुर, झांसी, इलाहाबाद, सिद्धार्थनगर, बनारस और गोरखपुर.
इन ज़िलों का चुनाव किस आधार पर किया है? इस सवाल के जवाब में संयुक्त किसान मोर्चा से जुड़े योगेन्द्र यादव कहते हैं, "7 चरणों में उत्तर प्रदेश में चुनाव हो रहे हैं. उन सातों चरण के मुख्य ज़िले हमने चुने हैं. ये संख्या आगे बढ़ भी सकती है."
संयुक्त किसान मोर्चा का कहना है कि सरकार ने 2017 और 2021 में किसानों से किया वादा, पूरा नहीं किया है.
इसलिए उन्होंने प्रदेश भर के किसानों के नाम एक चिट्ठी लिखी है जिसमें सरकार ने जो वादे पूरे नहीं किए, उनकी लिस्ट गिनाई है.
संयुक्त किसान मोर्चे के प्रतिनिधि, उत्तर प्रदेश में जगह-जगह जाकर लोगों को ये पर्चा बांटेंगे और बीजेपी को वोट ना देने की अपील करेंगे.
हालांकि उन्होंने ये भी साफ़ किया है कि किसान 'किस पार्टी को वोट दें' इस बारे में वो किसानों से कुछ नहीं कह रहे.
इस चिट्ठी के मुताबिक़ :
- 2017 में सरकार ने किसानों का लोन माफ़ करने का वादा किया था, लेकिन केवल 44 लाख का और वो भी एक लाख तक का किसानों का लोन माफ़ किया गया है.
- सरकार ने वादा किया था, 14 दिनों में गन्ने की पेमेंट दिलाने का, लेकिन वो भी पूरा नहीं हुआ.
- उत्तर प्रदेश की जनता से वादा था पर्याप्त बिजली और सस्ती बिजली दिलाने का, लेकिन यूपी में बिजली सबसे महँगी है.
- वादा था फसल की दाना-दाना ख़रीद का. लेकिन सरकार ने धान की फसल का एक तिहाई और गेहूं की पैदावार का छठांश भी नहीं ख़रीदा.
- वादा था गोवंश की रक्षा का, लेकिन आवारा पशुओं की वजह से किसान परेशान हैं.

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गन्ने के भुगतान पर योगी सरकार का पक्ष
पहले चरण में उत्तर प्रदेश में जहाँ चुनाव हो रहे हैं, उसे यूपी का गन्ना बेल्ट भी कहा जाता है.
बीबीसी ने भी अपनी ग्राउंड रिपोर्ट में पाया कि गन्ने का भुगतान समय पर नहीं हो रहा है. यह किसानों के लिए एक बड़ा मुद्दा है.
जब गन्ना मंत्री सुरेश राणा से बीबीसी ने इस बारे में सवाल पूछा तो उन्होंने कहा, "उत्तर प्रदेश में 120 चीनी मिल हैं. उनमें से 94 ऐसी मिल हैं जिनका 14 दिन के अंदर हम भुगतान कर रहे हैं."
"जो बची हुई 26 मिल हैं उनमें से 16 ऐसी हैं जो इस समय करंट में भी 70 परसेंट पर हैं. बची 10, उनके लिए हम क़ानून लेकर आ गए हैं."

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अजय मिश्र टेनी चुनाव में कहाँ हैं?
इसी चिट्ठी में संयुक्त किसान मोर्चा ने लखीमपुर खीरी में किसानों के साथ जो हुआ, उसकी भी याद दिलाई है.
चिट्ठी में लिखा है कि पूरी घटना का षड्यंत्रकारी मंत्री अजय मिश्र 'टेनी' अब भी खुलेआम घूम रहे हैं. बीजेपी ने उन पर कोई कार्रवाई नहीं की है.
3 अक्टूबर, 2021 को लखीमपुर खीरी में 4 किसानों और एक पत्रकार की हत्या का आरोप केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्र 'टेनी' के बेटे पर है.
इस पूरे मामले की जाँच एसआईटी कर रही है. पिछले साल दिसंबर में एसआईटी ने अदालत से कहा था कि पूरा मामला 'सुनियोजित साज़िश' का है.
इसके बाद गृह राज्य मंत्री पत्रकारों को कैमरे पर धमकाते भी नज़र आए थे.
हालांकि उत्तर प्रदेश चुनाव में अजय मिश्र 'टेनी' का नाम स्टार प्रचारकों की सूची से ग़ायब है.
यूपी चुनाव की तारीखों के ऐलान से पहले प्रधानमंत्री आवास पर सांसदों के साथ चर्चा में भी वो नज़र नहीं आए थे और ना ही कहीं अकेले चुनाव प्रचार करते उनकी तस्वीर ही सामने आई है.
साफ़ है कि बीजेपी ने चुनाव में उन्हें लाइमलाइट में नहीं रखा है, लेकिन पार्टी से अलग भी नहीं किया है.
किसान आंदोलन स्थगित करते हुए संयुक्त किसान मोर्चा की छह डिमांड में से एक माँग मंत्री को हटाने की भी थी. और अब किसानों ने दोबारा से अपनी पुरानी माँग दोहराई है.
उनका दावा है कि उत्तर प्रदेश के छोटे-बड़े 57 किसान संगठन इस मिशन में उनके साथ हैं.

संयुक्त किसान मोर्चा की अपील का किसानों पर कितना असर?
बीबीसी के संवाददाताओं ने उत्तर प्रदेश में जगह-जगह घूम कर संयुक्त किसान मोर्चा की अपील पर किसानों से बात की.
बुलंदशहर के गन्ना किसान राजकुमार, अपनी फसल बेचने निकले थे. रास्ते में उन्होंने बीबीसी संवाददाता वात्सल्य राय से बात की.
जब उनसे पूछा गया कि क्या वो इस चुनाव में 'बीजेपी को सज़ा' देने की संयुक्त किसान मोर्चे की अपील से सहमत हैं?
जवाब में राजकुमार ने किसान होने के नाते बिजली और गन्ना भुगतान में देरी की तमाम परेशानियाँ गिनाईं, लेकिन 'बीजेपी को सज़ा' देने के सवाल पर बोले, "किसान होने के नाते सज़ा तो नहीं दे पाएंगे. इस वक़्त देश में हिंदू-मुसलमान का मामला चल रहा है. हिंदुत्व बचाने के लिए बीजेपी ज़रूरी है. किसानों की अपनी दिक़्क़तें हैं, लेकिन हिंदू- मुसलमान की दिक़्क़त ज़्यादा बड़ी है."
गन्ने का भुगतान समय पर हो रहा है या नहीं? इस सवाल पर राजकुमार कहते हैं, "14 दिन में तो नहीं हो रहा है, लेकिन अखिलेश सरकार के मुक़ाबले जल्दी पैसा ज़रूर मिल रहा है."
राजकुमार के साथ ही तरुण भी अपनी फसल बेचने निकले थे.
उनके लिए सस्ती बिजली मिलना कितना बड़ा मुद्दा है? इस सवाल पर बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, " जब हम बचेंगे तो ही सस्ती बिजली लेंगे ना. इसलिए हिंदुत्व बड़ा मुद्दा है."
तरुण मानते हैं कि परिस्थितियां किसानों के लिए पहले से बेहतर ज़रूर हुईं हैं, लेकिन अब भी सुधार की गुंजाइश है.
राजकुमार और तरुण जैसे किसानों को संयुक्त किसान मोर्चा कैसे मना पाएगी? ये सवाल हमने संयुक्त किसान मोर्चा से जुड़े नेता योगेन्द्र यादव से पूछा.
उन्होंने साफ़ शब्दों में कहा, "किसानों का किसानी से ज़्यादा हिंदुत्व के मुद्दे से जुड़ना, हमारे लिए चुनौती है. देश के अलग-अलग हिस्से में ये सवाल अलग-अलग स्वरूप में आता है. इससे मुक़ाबला करने के लिए हमारा एक ही नारा रहा है - 'किसानी मेरी जाति, किसानी मेरा धर्म'. हम इस नारे से किसानों को अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं."

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वहीं लखीमपुर खीरी के किसान अरुण कुमार वर्मा से बीबीसी के सहयोगी पत्रकार प्रशांत पाण्डेय ने बात की.
वो पाँच एकड़ की ज़मीन पर किसानी करते हैं. ज़्यादातर रकबे पर गन्ने की खेती करते हैं.
बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, "पिछले दो सालों से हाल ज़्यादा ख़राब हो गया, अगर किसान को उचित दाम मिलता तो दिल्ली में आंदोलन क्यों होता."
"धान 1200 रुपए में बेचना पड़ा, गेहूँ की खरीद भी सेंटर पर सरकारी रेट में हो नहीं पाती. गन्ने का पेमेंट साल भर से नहीं मिला. हम बस बच्चों की फीस,दवा ही जुटा पा रहे हैं. बिजली के रेट भी आधे होने चाहिए."

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लखीमपुर खीरी के दूसरे किसान विक्रम सिंह ने बीबीसी के सहयोगी पत्रकार प्रशांत पाण्डेय से कहा, " मंत्री की बर्ख़ास्तगी हो या एमएसपी पर गारंटी की माँग, ये सरकार हमारी किसी माँग को नहीं मान रही."
"मंत्री को शायद जातिगत वोटों के नुक़सान की आशंका को लेकर सरकार बचा रही है. पर सरकार ने ना तो बजट में कुछ किसानों को दिया और ना ही किसानों से किया गया वादा पूरा किया. हम लोग संयुक्त किसान मोर्चा के पर्चे को आगे बढ़ाएंगे."
किसान मोर्चा की अपील और ग्रांउड पर किसानों से बातचीत के बाद, इस बार देखना दिलचस्प होगा कि किसान, किसान की तरह वोट करते हैं या हिंदू-मुसलमान बन कर वोट करते हैं.
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