अमित शाह का जयंत चौधरी को ऑफ़र, उत्तर प्रदेश चुनाव में क्या हैं इसके मायने

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- Author, सरोज सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए इस बार राष्ट्रीय लोकदल प्रमुख जयंत चौधरी ने समाजवादी पार्टी के साथ चुनावी गठबंधन किया है.
ये जानते हुए भी बुधवार को भाजपा सासंद परवेश वर्मा ने उन्हें बीजेपी में आने का ऑफ़र दिया है.
हालांकि जयंत चौधरी ने उनके ऑफ़र को तुरंत ही ख़ारिज भी कर दिया. लेकिन इस ऑफ़र ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट वोट बैंक की अहमियत को एक बार फिर सुर्खियों में ला दिया.
10 फरवरी को उत्तर प्रदेश में पहले चरण की वोटिंग में इस इलाके की 58 सीटों पर मतदान होना है.
जाट नेताओं के साथ बैठक का मक़सद
कृषि क़ानूनों की वापसी के बाद, चर्चा थी कि जाटों की नाराज़गी दूर करने के लिए बीजेपी ने ये क़दम उठाया है. इस इलाके के ज़्यादातर जाट, किसानी करते हैं.
लेकिन बुधवार को जिस अंदाज़ में बीजेपी ने जयंत चौधरी को 'चुनाव बाद भी दरवाज़े खुले' होने वाला ऑफ़र दिया, उसके बाद राजनीतिक जानकार इस ऑफ़र के कई तरह के मायने निकाल रहे हैं.
बीबीसी ने इस बारे में बीजेपी सांसद परवेश वर्मा से बात की. उनसे पूछा कि इस ऑफ़र और बैठक के पीछे मक़सद क्या है?
उन्होंने कहा, "चुनाव से पहले हर समाज के लोगों के साथ ऐसी मुलाकातें आम बात होती हैं. इन मुलाकातों के मायने ये नहीं की वो लोग हमसे नाराज़ हैं. इस बैठक में 50 से ज़्यादा विधानसभा के प्रतिनिधि शामिल थे, जो 12 -14 ज़िले से आते हैं. अमित शाह इस इलाके के इंचार्ज हैं, उन्होंने लोगों से मिल कर एक अपील की है. इस बैठक का बस यही मक़सद था."
अमित शाह इन दिनों पश्चिमी उत्तर प्रदेश के दौरे पर हैं. पिछले दिनों वो कैराना में थे और वहाँ पलायन का मुद्दा उठाया था.
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बीजेपी से जाटों की नाराज़गी के कारण
हालांकि कई जानकार और जाट नेता बीजेपी सांसद परवेश वर्मा की बात से सहमत नज़र नहीं आते.
द हिंदू अख़बार से जुड़ीं वरिष्ठ पत्रकार निस्तुला हेब्बार बुधवार की बैठक के बारे में कहती हैं, "बीजेपी में जाट वोट को लेकर एक चिंता तो अब भी है. जयंत चौधरी का अखिलेश के साथ जाना, बीजेपी की मुश्किलें और बढ़ा सकता है. बीजेपी जानती है कि जाटों के आजतक के सबसे बड़े नेता चौधरी चरण सिंह ही रहे हैं. उनका वोट माँगने के लिए जयंत चौधरी का नाम लेना ज़रूरी था. इस वजह से उन्होंने एक संदेश देने की कोशिश की कि जयंत चौधरी ग़लत जगह जा पहुँचें हैं, हमारे दरवाज़े अब भी ख़ुले हैं. ये एक तरीके से जाट वोटरों को थोड़ा कन्फ़्यूज़ करने की कोशिश भी है."

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में विधानसभा की तकरीबन 100 सीटें आती हैं.
सीएसडीएस के आँकड़ों के मुताबिक़ इस इलाके में मुसलमान 32 फ़ीसदी और दलित तकरीबन 18 फ़ीसदी हैं. यहाँ जाट 12 फ़ीसदी और ओबीसी 30 फ़ीसदी हैं.
2013 के मुज़फ़्फ़रनगर दंगों के बाद के चुनावों में जाट वोट बैंक बीजेपी अपनी तरफ़ करने में कामयाब रही है. इस वजह से 2014, 2017, 2019 के चुनाव में बीजेपी को इस इलाके में अच्छी सफ़लता भी मिली है.
2017 में बीजेपी के 13 जाट नेता, विधायक चुनकर आए थे.
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कृषि क़ानून की वापसी से क्या हुआ?
लेकिन क्या कृषि क़ानून की वापसी ने जाटों को बीजेपी के साथ लाने में मदद नहीं की?
इस सवाल के जवाब में निस्तुला कहती हैं, "कृषि क़ानून एक मुद्दा था, लेकिन अब बात ये भी उठ रही है कि जब क़ानून वापस लेना ही था तो एक साल तक किसानों को धरने पर बैठे रहने क्यों दिया? जो जाट बीजेपी के सपोर्ट में हमेशा रहे और कृषि क़ानून के पक्ष में लोगों को समझाने-बुझाने का काम कर रहे थे, क़ानून वापसी के बाद वो ख़ुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं. अब वो तबका भी अब बीजेपी से नाराज़ है.
"दूसरा कारण है गन्ने की खेती. जाट बेल्ट में ज्यादातर किसान गन्ने की खेती करते हैं. उनके लिए गन्ने का राज्य परामर्श मूल्य (एसएपी) अब भी एक मुद्दा है. हालांकि कीमतें कुछ बढ़ी है, पर अब भी बहुत किसान खुश नहीं है.
"इसके अलावा जाटों की नाराज़गी का एक कारण आरक्षण भी है, जिसका मुद्दा 2017 के पहले भी उन्होंने उठाया था.
"साथ ही साथ बीजेपी के कुछ जाट विधायकों के ख़िलाफ़ उनके इलाके में भी सत्ता विरोधी लहर (एंटी इनकंबेंसी) भी है."

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जाट आरक्षण का मुद्दा
यशपाल मलिक, अखिल भारतीय जाट आरक्षण संघर्ष समिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं. वो भी बीजेपी से जाटों की नाराज़गी के वही कारण गिनाते हैं जो निस्तुला गिना रही हैं.
गन्ना किसानों की नाराज़गी को लेकर वो कहते हैं, "पाँच साल में एक बार भाव बढ़ाया वो भी 25 रुपये. पड़ोसी राज्यों में जहाँ बीजेपी की सरकार है वहाँ गन्ने की कीमत (एसएपी) उत्तर प्रदेश से अब भी ज़्यादा है."
गुरुवार को जाटों के साथ अमित शाह की बैठक में वो नहीं गए थे, ना ही उनको निमंत्रण था. लेकिन बीजेपी के साथ हुई पिछली बैठकों का वो हिस्सा रहे हैं.
बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, " 2015 में भी ऐसी बैठक प्रधानमंत्री आवास पर हुई थी, वहाँ भी सेंट्रल लिस्ट में जाट आरक्षण की माँग हमने की थी, हमसे वादा भी किया गया. 2017 में चौधरी बिरेंदर सिंह के घर पर ऐसी बैठक हुई थी. वहाँ भी हमें आरक्षण देने का वादा किया गया था. लेकिन पाँच साल बाद भी वो वादा पूरा नहीं हुआ. तो इस बार मैं क्यों जाता."
जाटों की बीजेपी से नाराज़गी पर वो आगे कहते हैं, "ऐसा नहीं है कि सब जाट बीजेपी से नाराज़ हैं. कुछ बीजेपी के साथ भी हैं. लेकिन उन इलाकों में बीजेपी के लिए मुश्किल ज़्यादा है जहाँ मुसलमान और जाट एक साथ आ गए हैं."
दरअसल राजनीतिक जानकार मानते हैं कि 2013 के मुज़फ़्फ़रनगर दंगों के बाद जाट-मुसलमान एकता में दरार आ गई थी, जिसकी वजह से जाट बीजेपी के साथ चले गए थे. लेकिन किसान आंदोलन ने इस दरार को पाटने का काम किया और कई इलाकों में अब वो एकता वापस लौट आई है. इस बात का आने वाले चुनाव में एसपी - आरएलडी गठबंधन को फ़ायदा मिल सकता है. किसान आंदोलन ने आरएलडी के लिए संजीवनी का काम किया है. बीजेपी की बेचैनी इसी बात को लेकर है.

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इस बार के चुनाव में आरएलडी की स्थिति
शरद गुप्ता उत्तर प्रदेश की राजनीति को कई दशकों से कवर कर रहे है. फिलहाल वो लोकमत ग्रुप में सीनियर एडिटर हैं. पूर्व में अमर उजाला में राजनीतिक मामलों के संपादक रहे चुके हैं.
बीबीसी से बातचीत में वो कहते हैं, "अगर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाट बीजेपी से नाराज़ नहीं होते तो बुधवार की मीटिंग होती ही नहीं और ना ही जयंत चौधरी को साथ आने का ऑफ़र बीजेपी देती. जाटों में खाप का बहुत प्रभाव होता है, इस समय ज़्यादातर खाप जयंत के साथ है. बीजेपी की बैठक में कोई बड़ा जाट या खाप नेता नहीं पहुँचा था. जो पहुँचे वो पार्टी के ख़ुद के नेता या पदाधिकारी ही थे."
परवेश वर्मा के जाटों के समर्थन के दावे पर वो पूछते हैं, " अगर जाटों का पहले से समर्थन बीजेपी के पास है तो इसका मतलब जयंत के पास उनका समर्थन नहीं होगा, ऐसे में जयंत को ऑफ़र क्यों? जयंत को ऑफ़र देकर बीजेपी ने एक तरह से स्वीकार कर लिया है कि जाटों का समर्थन बीजेपी को नहीं मिल रहा है और जयंत चौधरी जीत रहे हैं. चुनाव के बाद वो बीजेपी के साथ आ जाएंगे और बीजेपी को उनकी ज़रूरत पड़ेगी."
वो आगे सवाल पूछते हैं कि बीजेपी ने ये ऑफ़र स्वामी प्रसाद मौर्य, दारा सिंह चौहान को क्यों नहीं दिया?

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आरएलडी का ट्रैक रिकॉर्ड
यहाँ ये जानना भी ज़रूरी है कि समाजवादी पार्टी के साथ आरएलडी का ये पहला गठबंधन है. जबकि बीजेपी के साथ वो पहले भी हाथ मिला चुके हैं.
2017 के चुनाव में एक सीट पर आरएलडी उम्मीदवार को जीत मिली थी. ये चुनाव आरएलडी ने अकेले लड़ा था.
2002 के विधानसभा चुनाव में आरएलडी का सबसे बेहतरीन प्रदर्शन रहा था, जब बीजेपी के साथ उनका गठबंधन था और उन्होंने 14 सीटें जीतीं थी.
इसके बाद 2007 में आरएलडी ने अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया और 10 सीटों पर उनके उम्मीदवार जीते.
2012 का चुनाव आरएलडी ने कांग्रेस के साथ लड़ा और 9 सीटें जीती.
पिता की मौत के बाद ये जयंत चौधरी का पहला चुनाव है जब सभी फैसले वो ख़ुद ले रहे हैं.
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