उत्तर प्रदेश चुनावः मोदी बोले- योगी सरकार ने गन्ना किसानों को किया भुगतान, किसान उठा रहे सवाल

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- Author, अभिनव गोयल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उत्तर प्रदेश चुनाव के लिए पहली वर्चुअल रैली को संबोधित किया जिसमें उन्होंने दावा किया कि योगी सरकार ने "गन्ना किसानों के बक़ाए के भुगतान का लक्ष्य तेज़ी से पूरा कर लिया है". मगर प्रदेश के किसान उनके इस दावे पर सवाल उठा रहे हैं.
प्रधानमंत्री मोदी ने सोमवार को पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर, शामली, बागपत, सहारनपुर और गौतमबुद्ध नगर के मतदाताओं के साथ जन चौपाल नामक कार्यक्रम में गन्ना किसानों की बात की जिनके मुद्दे इस इलाक़े के चुनाव में महत्वपूर्ण समझे जाते रहे हैं.
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प्रधानमंत्री ने इस वर्चुअल रैली में कहा, ''हमने गन्ना किसानों की दिक्कतों को समझते हुए उनके बकाए के जल्द से जल्द भुगतान का लक्ष्य रखा था. हमने इस लक्ष्य को भी तेज़ी से पूरा किया. पश्चिमी यूपी के किसान इस बात को भूले नहीं हैं कि 2017 से पहले कैसे किसानों की मेहनत का पैसा सालों-साल किश्तों में दिलाया जाता था.
''योगी जी की सरकार ने बकाया भी चुकाया और नए सीजन का भुगतान भी तेज़ किया है. आज पिछले पेराई सत्र का 98 प्रतिशत से अधिक का भुगतान हो चुका है और मौजूदा सत्र का भी लगभग 70 फीसद भुगतान हो चुका है. किसानों का जितना भुगतान योगी जी की सरकार ने किया है उतना पिछली दो सरकारों ने अपने 10 सालों में नहीं किया था. ''
मगर प्रधानमंत्री मोदी के इन दावों पर किसान नेता और कई किसान सवाल उठा रहे हैं और योगी सरकार पर ग़लतबयानी के आरोप लगा रहे हैं.
किसान नेता राकेश टिकैत ने बीबीसी से बातचीत में कहा, ''देश के प्रधानमंत्री से झूठ बुलवाते हैं. उन्हें जो गलत कागज पढ़ने के लिए देते हैं ये उनकी गलती है. 16 फैक्ट्रियां हैं जिन्होंने पिछले साल से गन्ना किसानों का भुगतान नहीं किया है. बजाज चीनी मिल में हजारों किसानों का पैसा फंसा हुआ है''.
राकेश टिकैत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दावे को झूठा करार दे रहे हैं लेकिन जमीनी हक़ीक़त क्या है ये जानने के लिए बीबीसी ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ बड़े गन्ना किसानों से बातचीत की.

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क्या कहते हैं किसान?
कृष्ण पाल उत्तर प्रदेश में मुजफ़्फ़रनगर ज़िले के वैली गांव के रहने वाले हैं. 25 एकड़ जमीन पर गन्ने की खेती करते हैं. चीनी मिल पर कृष्ण पाल का करीब 15 लाख रुपये अभी भी फंसा हुआ है.
बीबीसी हिंदी से बातचीत में कृष्ण पाल बताते हैं, '' पिछले साल 30 अप्रैल 2021 तक चीनी मिल चली थी. इसमें से 25 मार्च 2020 तक का भुगतान अभी चार पांच दिन पहले ही हुआ है. पिछले साल अप्रैल 2021 के महीने में जो गन्ना दिया था उसका पांच लाख रुपये अभी भी फंसा हुआ है''
कृष्ण पाल बजाज ग्रुप की भैसाना चीनी मिल को अपना गन्ना देते हैं. वे बताते हैं, ''नरेंद्र मोदी ग़लत बयान दे रहे हैं. इस साल का सीजन नवंबर 2021 से शुरू हुआ है. इस सीजन का एक पैसा भी नहीं आया है. करीब 10 लाख रुपये फंसे हुए हैं.''
मुजफ़्फ़रनगर ज़िले के बसी गांव के रहने वाले अरुण कुमार 500 बीघा ज़मीन पर गन्ने की खेती करते हैं. उनका करीब 45 लाख रुपये चीनी मिल पर बकाया है.
अरुण कुमार बताते हैं, ''पिछले सीजन का करीब 15 लाख रुपये और इस सीजन का करीब 30 लाख रुपये चीनी मिल में फंसा हुआ है. मोदी जी की गलती नहीं है, मिल वाला आदमी ठीक नहीं है. मंसूरपुर, खतौली, देवबंद जैसी फैक्ट्रियों ने किसानों का भुगतान कर दिया है''
मुजफ़्फ़रनगर के रहने वाले गन्ना किसान अनुज बालियान कहते हैं, ''झूठ कहा जा रहा है कि पैसे दे दिए हैं. किसान के पास पैसे नहीं पहुंचे हैं, हो सकता है उन्होंने गलत खाते में डाल दिए हों.''

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ज़मीनी हक़ीक़त क्या है?
दरअसल, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गन्ना किसान अपनी फसल को अलग-अलग चीनी मिल में ले जाते हैं. कुछ मिलें समय पर भुगतान कर रही हैं तो कुछ ऐसी हैं जो पिछले साल से किसानों का बकाया दबाए बैठी हैं. मुश्किल यहीं से शुरू होती है.
किसान नेता राकेश टिकैत बताते हैं, ''गन्ना एक्ट के तहत अगर 14 दिन में गन्ना किसान को पैसे ना मिले तो उन्हें ब्याज समेत पैसे देने का प्रावधान है. कुछ फैक्ट्रियों ने पिछले साल फरवरी तक का भुगतान 11 महीने के बाद किया है लेकिन किसी भी किसान को ब्याज नहीं दिया गया''.
मुजफ़्फ़रनगर के गन्ना किसान कृष्णपाल का कहना है, ''हमारा लाखों रुपये का बकाया गन्ना सोसाइटी के पास पड़ा हुआ है. इसकी उन्हें परवाह नहीं है. जबकि हम दो कट्टे खाद भी उनसे ले आएं तो हमें उसका ब्याज भरना पड़ता है''.

सवाल सिर्फ़ गन्ना भुगतान का ही नहीं है, गन्ने की लागत और लाभ का भी है.
बिजनौर के रहने वाले किसान नेता गजेंद्र सिंह कहते हैं, ''सरकार ने पांच साल पहले 50 प्रतिशत लाभकारी मूल्य देने का वादा किया था. गन्ने का दाम 325 रुपये से 350 रुपये प्रति क्विंटल किया है. सरकार ने सिर्फ 25 रुपये प्रति क्विंटल ही बढ़ाया है. डीजल 56 रुपये से बढ़कर 92 रुपये हो गया है जबकि किसान को एक किलो पर सिर्फ 25 पैसे ही बढ़कर मिले हैं''.
गन्ना किसान राजीव नीटू मुजफ़्फ़रनगर में दुलारा गांव के रहने वाले हैं. वोअपना गन्ना मंसूरपुर चीनी मिल में देते हैं. राजीव बताते हैं, ''मुझे 15 जनवरी 2022 तक भुगतान कर दिया गया है. ज्यादा समस्या एक दो फैक्ट्रियां ही कर रही हैं''.
क्या कह रही है राज्य सरकार?
उत्तर प्रदेश के गन्ना मंत्री सुरेश राणा ने बीबीसी से बातचीत में कहा, ''उत्तर प्रदेश में जब हमारी सरकार आई थी तो 6 साल का 12,500 करोड़ का बकाया था जिसका भुगतान हमने किया. पिछली सरकार ने पांच साल में 95 हजार करोड़ का भुगतान किया, हमारी सरकार 1 लाख 60 हजार करोड़ का भुगतान कर चुकी है.''
सुरेश राणा बताते हैं, ''हमारी सरकार में गन्ना खेतों का क्षेत्रफल 28 लाख हेक्टेयर हो गया है जबकि पिछली सरकार में ये 20 लाख हेक्टेयर था. गन्ना क्षेत्र में 8 लाख हेक्टेयर की बढ़ोतरी इसलिए हो पाई क्योंकि योगी-मोदी की सरकार ने किसानों के लिए बेहतरीन काम किया है.''

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गन्ने पर सियासत
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज वर्चुअल रैली में गन्ने के भुगतान का जिक्र किया है तो इसके राजनीतिक मायने भी हैं. पश्चिमी उत्तर प्रदेश के पांच जिलों में ज़्यादातर किसान गन्ने की खेती से जुड़े हैं. हर बार चुनाव आते ही गन्ना के भुगतान की समस्या चुनावी मुद्दा बन जाती है.
किसान नेता राकेश टिकैत का कहना है, ''यहां इनका (बीजेपी) गन्ना और जिन्ना दोनों चलते हैं. जिन गन्ना किसानों का भुगतान नहीं हुआ है, वो सरकार से नाराज हैं. ऐसे किसानों की संख्या हज़ारों में है.''
उत्तर प्रदेश के गन्ना मंत्री सुरेश राणा कहते हैं, ''उत्तर प्रदेश में 120 चीनी मिल हैं. 94 चीनी मिल 14 दिनों में भुगतान कर रही हैं. 26 में से 10 चीनी मिल मौजूदा सीजन का 70 फीसदी भुगतान कर रही हैं. बजाज, मोदी, सिंभावली चीनी मिल से जुड़े गन्ना किसानों की परेशानी दूर करने के लिए योगी आदित्यनाथ ने क़ानून बनाया है.
''इस क़ानून के तहत अगर कोई चीनी मिल भुगतान नहीं करेगी तो उसकी सहायक कंपनियों से पैसा जब्त कर गन्ना किसानों का भुगतान सुनिश्चित किया जाएगा. उसी क्रम में हमने 1 हज़ार करोड़ रुपये बजाज एनर्जी से ज़ब्त किए और उससे गन्ना किसानों का भुगतान किया है.''
गन्ना मंत्री के दावों के उलट मुजफ़्फ़रनगर जिले के वैली गांव के रहने वाले कृष्ण पाल बताते हैं, ''हमारे जैसे 60 हज़ार किसानों का पैसा अभी भी फंसा हुआ है. ज्यादातर बकाया बजाज चीनी मिल में लटका हुआ है''.
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