उत्तर प्रदेश चुनाव: अखिलेश को करहल में चुनौती देने वाले एसपी सिंह बघेल कौन हैं

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- Author, अनंत झणाणे
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए, लखनऊ से
सोमवार को जब अखिलेश यादव करहल से अपना नामांकन दाख़िल करने पहुँचे तो उन्हें लग रहा था कि इस बार उनका मुक़ाबला भाजपा के संजीव यादव से होने जा रहा है. लेकिन कुछ ही देर के बाद केंद्रीय क़ानून राज्य मंत्री प्रोफ़ेसर एसपी सिंह बघेल वहां पहुँचे और ख़ामोशी के साथ करहल से नामांकन कर दिया.
करहल से पर्चा दाख़िल करने के बाद एसपी सिंह बघेल ने ट्वीट किया, "लोकतंत्र में जो अपने क्षेत्र को पुश्तैनी कहता है वो लोकतंत्र का अपमान करता है."
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करहल मैनपुरी लोकसभा सीट में आती है जहाँ से मुलायम सिंह मौजूदा सांसद हैं. करहल से ही मुलायम सिंह ने अपनी स्कूली शिक्षा पूरी की थी और वहां बतौर शिक्षक नौकरी की थी.
करहल से अपनी उम्मीदवारी के बारे में बीबीसी से एसपी सिंह बघेल ने कहा, "मुझे चुनौती देने की पूरी उम्मीद है. कल से तूफ़ान मच गया है यहाँ पर. करहल विधानसभा रोचक स्थिति में है. जनता का मनोबल बढ़ गया है."
वे कहते हैं, "जनता के दिमाग़ में बात आ गई है कि भाजपा ने जिस प्रत्याशी को उतारा है वो सैफ़ई परिवार के सामने न झुका है न झुकेगा. जबसे छोड़ आए हैं तबसे तीन चुनाव लड़ चुके हैं. लोकसभा से आगरा में एमपी हूँ, केंद्रीय मंत्री हूँ. उसके पहले उत्तर प्रदेश में भाजपा से कैबिनेट मंत्री रहा हूँ और उसके पहले राज्य सभा सांसद रहा हूँ."
अपनी दावेदारी को मज़बूत क़रार देते हुए वे कहते हैं, यहाँ की जनता यही चाहती है कि जो झुके नहीं, दबे नहीं, डरे नहीं, जो सामना करे उनकी गुंडागर्दी का उनके जातीकरण का, तो उसको वो जिताना चाहते हैं."
एसपी सिंह बघेल का राजनीतिक सफ़र
एसपी सिंह उत्तर प्रदेश के औरैया ज़िले के भाटपुरा गांव में 1960 में पैदा हुए. वो मिलिट्री साइंसेज़ में एमएससी हैं, इतिहास में एमए और पीएचडी भी हैं. पेशे से बघेल आगरा के आगरा कॉलेज में सैन्य शास्त्र के एसोसिएट प्रोफ़ेसर हैं.
एसपी सिंह बघेल के राजनीतिक करियर को काफ़ी क़रीब से देखने वाले आगरा के वरिष्ठ पत्रकार विनोद भारद्वाज कहते हैं, "यह सब इंस्पेक्टर थे पुलिस में. जब 1989 में मुलायम सिंह यादव पहली बार मुख्यमंत्री बने तो एसपी सिंह बघेल उनके सुरक्षाकर्मी बने. बाद में एसपी सिंह बघेल को मुलायम सिंह यूथ ब्रिगेड का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया."

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विनोद भारद्वाज के अनुसार मुलायम सिंह ने अपने शासनकाल में उन्हें आगरा कॉलेज में सैन्य विज्ञान का प्रोफ़ेसर बनवा दिया था और फिर मुलायम सिंह ने उन्हें चुनाव लड़ाया.
1998, 1999 और 2004 में बघेल जलेसर सीट से समाजवादी पार्टी से लोकसभा सांसद रहे. 2010 में वो सपा छोड़ बसपा में शामिल हो गए और मायावती ने उन्हें राज्य सभा का सांसद बनवाया.
बसपा के बाद उन्होंने भाजपा का दामन थामा और 2015 में वे भाजपा के ओबीसी मोर्चे के अध्यक्ष बन गए. 2017 में फ़िरोज़ाबाद की टूंडला आरक्षित सीट से विधायक चुने गए और योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री बने.
2019 में भाजपा ने उन्हें आगरा की आरक्षित सीट से चुनाव लड़वाया और वे चौथी बार सांसद बने. 2021 के केंद्रीय मंत्रिमंडल विस्तार में उन्हें केंद्रीय विधि और न्याय राज्य मंत्री बनाया गया.
बीबीसी से एसपी सिंह बघेल ने मुलायम सिंह से अपने रिश्तों के बारे में कहा, "मेरी परवरिश ऐसी है कि हम अपने बुज़ुर्गों का सम्मान करें. आपने फ़ोटो देखा होगा कि स्मृति ईरानी जो हमारी कैबिनेट मंत्री हैं, उन्होंने मुलायम सिंह जी के पैर छुए. वो एक अलग बात है. मुलायम सिंह जी से किसी प्रकार का बैर नहीं है."

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क्या है एसपी सिंह बघेल की जाति से जुड़ा विवाद?
एसपी सिंह बघेल के आगरा लोक सभा सीट से 2019 के चुनाव को बसपा के उम्मीदवार मनोज कुमार सोनी ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में चुनौती दी है.
इस बारे में बसपा नेता मनोज कुमार सोनी के वकील विजित सक्सेना ने कहा, "बसपा के प्रत्याशी मनोज कुमार सोनी ने इस चुनाव को इस आधार पर हाई कोर्ट में चुनौती दी कि एसपी सिंह बघेल ओबीसी कैटेगरी के हैं. वो एससी नहीं हैं, इसलिए वो आरक्षित सीट पर चुनाव नहीं लड़ सकते हैं."
फ़िलहाल मामला हाईकोर्ट में लंबित है. इस बारे में वकील विजित सक्सेना का कहना है, "अभी फ़िलहाल इशूज़ बने हैं, इसके बाद एविडेंस होगा, उसके बाद बहस होगी और उसके बाद कोर्ट अपना फ़ैसला सुनाएगा."
बीबीसी ने इस बारे में एसपी सिंह बघेल से उनकी राय जाननी चाही. लेकिन यह सवाल पूछने पर फ़ोनलाइन में ख़राबी आ गयी और मंत्री जी ने कहा कि वो क्षेत्र में चुनाव प्रचार पर हैं और फ़ोन का सिगनल कमज़ोर होने की वजह से बात नहीं कर पा रहे हैं. उसके बाद कई बार उनसे संपर्क करने की कोशिश की गई लेकिन एसपी सिंह बघेल से बात नहीं हो पाई.
तो क्या एसपी सिंह बघेल की जाति से जुड़ा विवाद चुनावी मुद्दा बन सकता है?
वरिष्ठ पत्रकार विनोद भारद्वाज कहते हैं, "यह मुद्दा तो है. लेकिन यह कोर्ट में लंबित मामला है तो आदमी इसमें कुछ कहने से बचना चाहता है. बाक़ी सोशल मीडिया पर इस बारे में बहुत सारे पोस्ट हैं."

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यादव परिवार के ख़िलाफ़ एसपी सिंह बघेल का चुनावी ट्रैक रिकॉर्ड?
एसपी सिंह बघेल अब तक तीन बार यादव परिवार से मैदान में भिड़ चुके हैं. उनका सबसे पहला मुक़ाबला 2009 में अखिलेश यादव से फ़िरोज़ाबाद लोक सभा सीट पर हुआ और वो बसपा के प्रत्याशी बन कर मैदान में उतरे. अखिलेश यादव ने उन्हें 67,000 वोटों से हरा दिया.
2009 में अखिलेश कन्नौज और फ़िरोज़ाबाद दोनों सीटों से चुनाव जीते थे तो उन्होंने फ़िरोज़ाबाद छोड़ दी.
2009 के लोकसभा उपचुनाव में डिंपल यादव को मैदान में उतारा गया और उनका मुक़ाबला कांग्रेस के राज बब्बर और बसपा के एसपी सिंह बघेल से हुआ.
डिंपल यादव राज बब्बर से चुनाव हार गईं और एसपी सिंह बघेल तीसरे नंबर पर रहे. तीसरे नंबर पर रहने के बाद भी डिंपल यादव से सिर्फ़ 13000 कम वोट मिले.
2014 के लोक सभा चुनाव में वो तीसरी बार फ़िरोज़ाबाद से चुनाव लड़े और पहली बार भाजपा के उम्मीदवार बने. इस बार उनका मुक़ाबला समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता रामगोपाल यादव के बेटे अक्षय यादव से हुआ.
रामगोपाल, अखिलेश यादव के चाचा हैं. 2014 की मोदी लहर के बावजूद अक्षय यादव ने 1,14,000 वोटों से एसपी सिंह बघेल को हराया.
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तो 1998 से शुरू हुए अपने राजनीतिक करियर में यादव परिवार के ख़िलाफ़ उनका चुनावी ट्रैक रिकॉर्ड हार का रहा है, लेकिन इसके बावजूद भाजपा ने उन्हें अखिलेश यादव के ख़िलाफ़ करहल में टिकट दिया है.
उत्तर प्रदेश में बीबीसी के पूर्व संवाददाता और वरिष्ठ पत्रकार रामदत्त त्रिपाठी कहते हैं, "उनके और मुलायम सिंह यादव के बीच में जो संबंध हुआ करते थे अब वो हैं नहीं. राजनीति में उनकी अब अपनी शख़्सियत है, पहचान है. तब से लेकर अब तक उनका काफ़ी लम्बा राजनीतिक सफ़र रहा है. वो पढ़े लिखे हैं, विनम्र हैं और इस चुनाव में भाजपा की पूरी फ़ोर्स उनके साथ होगी. वो अकेले यह चुनाव नहीं लड़ेंगे."
क्या होगा करहल में चुनावी घमासान?
एसपी सिंह बघेल ने अपना नामांकन दाख़िल करने से जुड़ा एक फ़ेसबुक पोस्ट लिखा है, "यह मेरा सौभाग्य है कि दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने मुझे जिसे कुछ लोग पुश्तैनी, ख़ानदानी मज़बूत क़िला बता रहे हैं, उसे गिराने की ज़िम्मेदारी दी है."
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मैनपुरी की राजनीति पर लम्बे समय से रिपोर्टिंग करते आ रहे स्थानीय वरिष्ठ पत्रकार विनोद भरद्वाज कहते हैं, "करहल विधान सभा सीट यादव बाहुल्य है. मैं समझता हूँ कि कहीं कोई दिक़्क़त वहां अखिलेश यादव को है ही नहीं. लेकिन इन्होंने एक घेराबंदी ज़रूर कर ली है. मतलब अखिलेश को करहल पर ध्यान देना पड़ेगा."
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मैनपुरी के वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप चौहान के मुताबिक़ एसपी सिंह बघेल के आने से करहल और आस-पास की सीटों के सामाजिक और जातीय समीकरण पर असर पड़ सकता है.
उनके मुताबिक़, "अगर भाजपा यहाँ से यादव कैंडिडेट लड़ाती तो अखिलेश यादव बिल्कुल निश्चिंत होकर कहीं भी घूम सकते थे. लेकिन एसपी सिंह बघेल के आने से मैनपुरी की दूसरी सीटों पर भी समीकरण बदल सकता है."
प्रदीप चौहान के अनुसार करहल, किसनी, मैनपुरी और भोगांव सीट पर भी कुछ असर पड़ सकता है. पहले लग रहा था कि पाल, धनगर और बघेल समाज के वोट सपा में जा रहे हैं, लेकिन अब यह वोट भाजपा के पाले में संगठित हो सकते हैं.
जिस सीट पर सोमवार तक पूरा चुनाव एकतरफ़ा लग रहा था वहां अचानक भाजपा ने माहौल बदलने का काम किया है.
प्रदीप चौहान कहते हैं, "पूर्व में भाजपा करहल से हल्का प्रत्याशी देती रही है, फिर भी उन प्रत्याशियों को वोट मिलते रहे हैं. तो भाजपा का करहल में वोट तो है. जो नॉन यादव वोट हैं उसमे ठाकुर भी हैं, पाल, बघेल, शाक्य, बनिया और उसके अलावा छोटी जातियां भी हैं जो भाजपा का समर्थन करती आई हैं."
प्रदीप चौहान ये भी कहते हैं कि, "हो सकता है कि अखिलेश को यहाँ दो-चार दिन प्रचार करना पड़े. और यही भाजपा चाहती है कि यह दो चार दिन थोड़ा डिस्टर्ब हो जाएँ. चुनाव बहुत रोचक होगा, बहुत दिलचस्प होगा और बिल्कुल हल्का नहीं होगा."

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रामदत्त त्रिपाठी मानते हैं कि अखिलेश के पास करहल में यादव बिरादरी का भरोसा है, मुख्यमंत्री पद का चेहरा होने का आकर्षण है और करहल अखिलेश यादव के पारिवारिक गांव सैफ़ई से सटी हुई सीट भी है.
लेकिन अखिलेश के कमज़ोर पहलू का ज़िक्र करते हुए रामदत्त त्रिपाठी कहते हैं, "करहल की और मैनपुरी की तरफ़ अखिलेश यादव का कोई ऐसा काम नहीं है. मुख्यमंत्री रहते हुए अखिलेश यादव ने वहां के लिए ऐसा काम नहीं किया है, तो वो मुक़ाबला मुश्किल होगा. बघेल उस इलाक़े के हैं, आस पास के लोगों को जानते हैं."

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अखिलेश के ख़िलाफ़ एक और बात जो सकती है, उसका ज़िक्र करते हुए रामदत्त त्रिपाठी कहते हैं, "अखिलेश की शख़्सियत और मुलायम की शख़्सियत में भी फ़र्क़ है और दोनों की तुलना नहीं की जा सकती है. मुलायम ज़्यादा ज़मीन से जुड़े हुए थे और उनके कई लोगों से निजी सम्बन्ध थे. कोई भी उनके घर कभी भी आ सकता था, उनसे मिल सकता था, उनसे बात कर सकता था. उनसे नोक झोंक होती थी, तब भी वो लोगों से रिश्ता बनाए रखते थे. लेकिन अखिलेश के लिए ऐसा नहीं कहा जा सकता है."
करहल में 20 फ़रवरी को मतदान होगा. अब देखना यह है कि एसपी सिंह बघेल अखिलेश यादव को घेरने में कितना कामयाब होते हैं. और क्या समाजवादी पार्टी अब गोरखपुर शहर सीट पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के ख़िलाफ़ एक मज़बूत प्रत्याशी उतार कर बघेल का बदला लेती है या नहीं.
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