उत्तर प्रदेश चुनाव: मेरठ ज़िले के सिवालखास में 'जाट-मुस्लिम एकता' का टेस्ट- ग्राउंड रिपोर्ट

- Author, वात्सल्य राय
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, सिवालखास, मेरठ
"जो जनता का प्यार है, जो जोश है, (चौधरी) जयंत (सिंह) जी के लिए, गठबंधन के लिए, वो ही मेरे दिल में और वही मेरी आंखों में, आपको देखने को मिल रहा है."
आंखों से पानी छलक रहा था लेकिन राष्ट्रीय लोकदल के नेता डॉक्टर राजकुमार सांगवान ने ये दावा करते हुए एक बार भी अपनी भावनाओं को छुपाने या आंसू पोंछने की कोशिश नहीं की.
सांगवान मुस्कुरा रहे थे. पीछे उत्साहित समर्थक नारे लगा रहे थे. लेकिन उनकी आंखों से जो टपक रहे थे, उन्हें लेकर यक़ीन से दावा नहीं किया जा सकता है कि वो आंसू ख़ुशी के ही थे.
डॉक्टर सांगवान मेरठ ज़िले की सिवालखास सीट से राष्ट्रीय लोकदल के टिकट के सबसे मज़बूत दावेदारों में थे लेकिन यहाँ पार्टी के सिंबल पर चुनाव पूर्व विधायक ग़ुलाम मोहम्मद लड़ रहे हैं.
ग़ुलाम मोहम्मद पिछली बार साल 2012 में समाजवादी पार्टी के टिकट पर विधायक चुने गए थे. इस बार समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल गठजोड़ करके चुनाव मैदान में हैं.
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सीट लोकदल की, प्रत्याशी सपा का
सिवालखास की सीट लोकदल के खाते में है लेकिन प्रत्याशी समाजवादी पार्टी ने दिया है.
गठबंधन के दोनों दल इस फ़ैसले को मुज़फ़्फ़नगर से शुरू हुए प्रयोग की अगली कड़ी बताते हैं. मुज़फ़्फ़रनगर की छह सीटों में से किसी पर गठबंधन ने मुसलमान प्रत्याशी को नहीं उतारा है. इस प्रयोग का मक़सद साल 2013 के दंगे के बाद 'जाट-मुसलमानों के बीच बन गई खाई को पाटना' बताया जा रहा है.
लेकिन क्या ज़मीन पर इस प्रयोग के वैसे ही नतीजे हैं, जैसे दोनों दलों के नेता सोच रहे हैं?
सिवालखास विधानसभा बागपत लोकसभा सीट का हिस्सा है. ये इलाक़ा मेरठ ज़िले में है. यहाँ मुसलमान वोटरों की संख्या जाटों से ज़्यादा बताई जाती है लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का दावा है कि चुनाव की दिशा जाट वोटर ही तय करते हैं.

किसके साथ चौधरी चरण सिंह का गाँव?
पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह ने छात्र जीवन में जिस भूपगढ़ी गाँव में कई साल बिताए वो भी इसी विधानसभा का हिस्सा है. जाट समुदाय के कई संगठन, नेता और आमजन इस सीट पर पहला हक़ अपना मानते हैं.
भूपगढ़ी के अजित सिंह कहते हैं, "जाट बिरादरी कैंडिडेट को हराना और जिताना दोनों जानती है."
वो कहते हैं, "चौधरी चरण सिंह का इस गाँव से ख़ून का रिश्ता है और हम सांगवान की दावेदारी का समर्थन कर रहे थे. ग़ुलाम मोहम्मद को जब टिकट दिया, तो विरोध हुआ लेकिन छुटपुट विरोध तो चलता है."
इसी गाँव के विजित सिंह कहते हैं, "जब राजकुमार सांगवान का नाम था, तब एकतरफ़ा था कि आरएलडी की तरफ़ जाएगी सीट लेकिन आज की तारीख़ में ग़ुलाम मोहम्मद जी का टिकट आया है तो उससे काफ़ी जाट लोग कटे हैं. "

ग़ुलाम बोले- हम चरण सिंह के वंशज
ग़ुलाम मोहम्मद जाटों को साथ लाने की कोशिश में जुटे हैं और इसी क्रम में दावा करते हैं कि वो चौधरी चरण सिंह के राजनीतिक वारिस हैं.
ग़ुलाम मोहम्मद ने बीबीसी से कहा, "हम चौधरी चरण सिंह साहब के पॉलिटकली वंशज हैं. हमारी एक राजनीतिक विचारधारा है. (टिकट को लेकर जो ग़ुस्सा था) वो क्षणिक था, लेकिन हम आपसे बता रहे हैं अगले दिन जैसे सूरज निकलता है, सूरज की किरणें जैसे फैलती हैं, हमारा विवाद अंधेरे की तरह दूर हो गया."
ग़ुलाम मोहम्मद के प्रचार में जुटे डॉक्टर राजकुमार सांगवान भी दावा करते हैं, "यहाँ जाति धर्म से ऊपर उठकर काम होता है. दोनों दलों के लोग, दोनों दलों के नेताओं को ताक़त देने के लिए आज प्रत्याशी के साथ हैं. हम प्रदेश की हुकूमत को बदलेंगे."

बीजेपी के मौजूदा विधायक को टिकट नहीं
जीत का दावा भारतीय जनता पार्टी भी कर रही है. बीजेपी भी यहाँ प्रयोग कर रही है.
साल 2017 में जितेंद्र सतवाई ने पहली बार ये सीट बीजेपी की झोली में डाली थी लेकिन इस बार पार्टी ने उम्मीदवार बदल दिया. जितेंद्र सतवाई की जगह मनिंदर पाल सिंह को प्रत्याशी बनाया गया है.
प्रत्याशी बदले जाने की वजह पूछने पर सतवाई कहते हैं, "ये तो पार्टी का निर्णय है. पहली बार यहां बीजेपी जीती थी और पहली बार यहां जाट जीता था. पूरे पांच साल मेहनत और लगन से काम किया है. कोई दाग नहीं है. मैं चुनाव लड़ता तो सीट निकालकर देता बीजेपी को."
किसान आंदोलन शुरू होने के बाद से सतवाई को कई बार किसानों ख़ासकर लोकदल समर्थकों की ओर विरोध झेलना पड़ा था.

इमेज स्रोत, UP POLICE
बीजेपी उम्मीदवार का विरोध, केस
कई गाँवों में खुलकर विरोध बीजेपी के मौजूदा उम्मीदवार मनिंदर पाल सिंह का भी हो रहा है. कुछ मामलों में पुलिस ने केस भी दर्ज किया है. एक केस सोमवार को भी दर्ज हुआ. लेकिन मनिंदर पाल सिंह का दावा है कि इसमें उनकी कोई भूमिका नहीं.
वो कहते हैं, "नौजवान होते हैं, कई बार उन्हें कोई बहका देता है, तो नारे लगा देते हैं. उनसे मेरी कोई नाराज़गी नहीं है. हमने कोई रिपोर्ट दर्ज नहीं की. "
मनिंदर पाल सिंह के काफिले पर पथराव की रिपोर्टें भी सामने आईं थी, इस बारे में सवाल करने पर उन्होंने बताया, "छुर (गांव) में हम घर-घर वोट मांगने गए थे. वहाँ कुछ बच्चे लोकदल के झंडे लिए खड़े थे, मुझे देखकर उन्होंने नारे लगाए. मेरी गाड़ी निकल गई तब किसी ने दो तीन गाड़ियों पर पथराव कर दिया."
उन्होंने आगे कहा, "वो नौजवान बच्चे हैं, उनके भविष्य से खेलना मेरा काम नहीं है. अगर उन्होंने ग़लती की है तो वो मान लेंगे कि ग़लती हुई है. अगर किसी और ने की है तो उसकी सज़ा उन्हें क्यों दी जाए. आज उसी गाँव के लोग रोज़ मुझे कहते हैं कि आप आइए. जो ग़लती हुई, उसके बाद सब लोगों ने खेद भी व्यक्त किया है."

'बीजेपी ने बाँट दिया'
हालांकि, कई स्थानीय लोग दावा करते हैं कि ये उम्मीदवार और बीजेपी से नाराज़गी ही है जो प्रचार के दौरान रह-रह कर सामने आ रही है.
अजित सिंह कहते हैं, "कुछ नेता ऐसे भी हैं जो कह रहे हैं कि जाटों की चौधराहट ख़त्म हो गई. ये जो शब्द हैं, वो अमित शाह जी को डोर डोर घुमवा रहे हैं. एक गृह मंत्री को बैलेट पेपर बांटने पड़ रहे हैं. "
बीजेपी के उम्मीदवार जाट समुदाय से ही हैं लेकिन लोकदल समर्थक उरिंदर तेवतिया का दावा है कि वो 'बाहरी' हैं और इसे लेकर उनकी पार्टी के लोग ही विरोध जता चुके हैं.
जाट समुदाय के कुछ लोग बीजेपी से नाराज़गी की बड़ी वजह किसान आंदोलन को बताते हैं.
सनी नाम के एक किसान कहते हैं, "बीजेपी से तो नाराज़गी है जी. 13 महीने तक तो हम वहां (दिल्ली बॉर्डर पर) बैठे रहे. "
वो शिकायती लहजे में कहते हैं, "बीजेपी ने हमें बाँट दिया. हम जाट कह कर अपने आपको संबोधित करते हैं. हैं तो हम किसान. असल में सारा किसान ही बीजेपी के ख़िलाफ़ है."

आरोपों की झड़ी
मनिंदर पाल सिंह इस दावे को ग़लत बताते हैं.
वो कहते हैं, "ये किसान नहीं एक पार्टी के समर्थक हैं. उसका झंडा लेकर चलते हैं. अगर कोई किसान के पक्ष में बात कर रहा होता तो वहाँ आम किसान खड़ा होता. आम किसान तो कहीं है नहीं."
बीजेपी की प्रचार टीम यहाँ एक और प्रयोग में लगी दिखती है. विधानसभा के घाट गाँव के दौरे के वक़्त मनिंदर पाल सिंह के काफिले के साथ जो प्रचार गाड़ी चल रही थी, उसमें समुदाय विशेष को इंगित कर गाने बजाए जा रहे थे.
वहीं, गाँव की सभा में एक बीजेपी समर्थक ने मौजूद लोगों से कहा, "पाँच साल पहले कॉलेजों के बाहर ये स्थिति रहती थी कि लड़कियां जा नहीं सकती थीं. कलावे बांध-बांध कर आतंकी मोटरसाइकिल लिए छेड़खानी करते थे. योगी जी की जबसे सरकार आई है तब से कॉलेजों के बाहर मुझे एक भी आतंकी दिखाई नहीं देता है."
वहीं, मनिंदर पाल सिंह भी आरोप लगाते हैं कि गठबंधन के मौजूदा प्रत्याशी के विधायक रहते हुए क़ानून व्यवस्था की स्थिति ठीक नहीं थी.
उन्होंने कहा, "गुलाम मोहम्मद पाँच साल रहे, पाँच साल में जितना बुरा हाल यहां का रहा. आम जनता से पूछ लीजिए, ना पशु बचा, ना ट्रैक्टर बचा, ना मोटरसाइकिल बची, सब उठाकर ले गए लोग."

इमेज स्रोत, Wasim Ahmed/BSP
कहाँ हैं बाक़ी दल?
आरोप- प्रत्यारोपों और दावों के दंगल में कांग्रेस उम्मीदवार जगदीश शर्मा भी पीछे नहीं रहना चाहते. इस सीट से खड़े 13 उम्मीदवारों में वो ख़ुद के सबसे आगे होने का दावा करते हैं.
वो दावा करते हैं, "मुझे जिस दिन सिंबल मिला भाजपा उसी दिन हार गई. संकेत ये भी दे रहा हूँ कि पहले पूरा ब्राह्मण वर्ग भाजपा के साथ था. ब्राह्मण ने ही भाजपा को जिताया था. तब हमारा कोई कैंडिडेट ही नहीं था. यहाँ लगभग 62 हज़ार ब्राह्मण हैं. और ब्राह्मण जब खड़ा हो जाता है तो उसके साथ अन्य वर्ग भी खड़े हो जाते हैं."
जीत का दावा बहुजन समाज पार्टी के उम्मीदवार नन्हे खां भी कर रहे हैं.
वो कहते हैं, "मेरा पास आपके किसी और सवाल का कोई जवाब नहीं है. मुक़ाबले का मुझे पता नहीं. अपना पता है. मुझे पता है मैं जीतूंगा."
स्थानीय पत्रकार शाह आलम त्यागी कहते हैं कि यहाँ जीतेगा वही जो समीकरण दुरुस्त कर लेगा.
त्यागी कहते हैं, "मुस्लिमों का रुझान गठबंधन की ओर दिखता है. भाजपा की तरफ़ कुछ एससी वोट का रुझान दिख रहा है. लेकिन निर्णायक जाटों का वोट ही होगा."
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