नज़रिया: हिमाचल प्रदेश चुनाव में मुक़ाबला वीरभद्र सिंह बनाम नरेंद्र मोदी का?

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- Author, हेमंत कुमार
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
हिमाचल में इस बार भी परंपरा जारी रखने और परंपरा तोड़ने की जंग है. परंपरा यह है कि हर चुनाव के बाद सरकार बदल जाती है. बीजेपी का ज़ोर है कि परंपरा जारी रहे. सत्तासीन कांग्रेस का इरादा तोड़ने का है. वैसे हिमाचल में पार्टी विशेष के बाग़ियों ने हमेशा ही ऐसे तमाम इरादों पर पानी फेरा है.
इसलिए, इस बार दारोमदार इस बात पर है कि कौन ज़्यादा बाग़ियों को नाथ पाता है. इसी पर पार्टी का वोट शेयर भी निर्भर करेगा. अरसा बीत गया जब प्रदेश के मुद्दों पर चुनाव लड़े गए थे. लिहाज़ा मुद्दों को छोड़ बाकी तमाम समीकरण ही हार-जीत तय करेंगे. 68 विधानसभा वाले हिमाचल में कुल 476 ने नामांकन दाख़िल किया है.

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भाजपा में लीडरशिप तय नहीं
मतदान 9 नवंबर को है. यह दिन हिमाचल के लिए वैसे भी ऐतिहासिक है. तकरीबन 114 साल पहले इसी दिन पहली रेलगाड़ी शिमला पहुंची थी. भाप इंजन से शुरू हुई गाड़ी महज़ डीजल इंजन तक पहुंची है. सियासत में कांग्रेस की हालत तो भाप इंजन जैसी है लेकिन बीजेपी अबके अपने इंजन को सीधे बिजली के ज़रिये चलाने की कोशिश में है.
भाजपा हाईकमान ने जिस ट्रैक और इंजन की परिकल्पना की है, उसमें इंजन के अलावा सब कुछ है. डिब्बे दिल्ली से जोड़ दिए गए हैं. साथ ही कह दिया है कि अभी वर्चुअल इंजन के सहारे सफ़र पर निकलो. 18 दिसंबर को चुनाव परिणाम यदि पक्ष में रहे तो बता दिया जाएगा कि इंजन कौन होगा.

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नड्डा का नाम
भाजपा ने यहां पहली बार सीएम पद के लिए प्रत्याशी घोषित नहीं किया है. अकसर साफ़ सा रहता था कि अमुक की लीडरशिप में चुनाव होंगे. इस बार पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल और मौजूदा केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जगत प्रकाश नड्डा बड़े नाम हैं. चर्चाऐं इनके अलावा भी हैं.
असल में कई राज्यों के चुनावी नतीजों से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह जिस करिश्माई औरा को प्राप्त हुए हैं, उसकी चकाचौंध से यहां के नेताओं की भी आंखें चुंधियाई हुई हैं. मैसेज कुछ यूं भी तिर रहे हैं कि पार्टी ने सीएम पद का चेहरा यूपी, हरियाणा आदि में भी घोषित नहीं किया था.

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कांग्रेस में वही पुराना राग
इसलिए, सरप्राइज़ के लिए भी तैयार रहिए. घोषणा करनी चाहिए या नहीं करनी चाहिए इस पर यहां भी मंथन चल रहे हैं लेकिन अभी तक तो तराज़ू में मेंढक तौलने जैसी बात नज़र आ रही है.कांग्रेस अभी भी भाप वाले इंजन के दौर से गुज़र रही है. बहुत कुछ हेरिटेज सरीखा है.
वीरभद्र सिंह के रूप में यहां पार्टी के पास ऐसा नेता है जो ऐन चुनाव के दौरान इतनी भाप बनाते आए हैं कि धुंआ सीधा दिल्ली में निकलता है. और चाहते या न चाहते हुए भी उन्हें वीरभद्र सिंह को ही सारी कमान सौंपनी पड़ती है. अबके भी ऐसा ही हुआ है.

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सत्ता में वापसी
कांग्रेस की मजबूरी यह है कि लगातार पांच विधानसभा चुनाव में कांग्रेस आलाकमान वीरभद्र सिंह का विकल्प तलाश ही नहीं पाई. 1993 में पंडित सुखराम को आलाकमान ने उनसे भिड़ाया लेकिन ख़ूब शक्ति प्रदर्शन के बाद सीएम की कुर्सी पर वीरभद्र सिंह ही काबिज़ हुए.
साल 1998 में हार के बाद वीरभद्र सिंह फिर पार्टी में हाशिये पर धकेले गए लेकिन 2003 का चुनाव आते-आते वे फिर ऐसे मज़बूत हुए कि सत्ता में वापसी हो गई. 2007 में फिर कांग्रेस बाहर हो गई और वीरभद्र सिंह लोकसभा के लिए चुनकर केंद्र में मंत्री बन गए. 2012 में भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते उन्हें मंत्री पद छोड़ना पड़ा.

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सीबीआई और ईडी
ऐन चुनावों के समय हिमाचल वापस आए और ऐसा खेल खेला कि पहली बार सरकार रिपीट करने की दहलीज़ पर पहुंची भाजपा से वीरभद्र सिंह ने सत्ता छीन ली.
अबकी बार भी भ्रष्टाचार के तमाम आरोपों, सीबीआई और ईडी की जांच और ज़मानत पर होने के बाद भी उन्होंने आख़िर में सारी स्थितियां अपने अनुकूल कर लीं और फिर पार्टी के सुप्रीम लीडर बन गए. 83 साल के वीरभद्र सिंह नौवीं बार मैदान में हैं.
वो तो कई नाटकीय घटनाक्रमों के बीच कांग्रेस नेत्री विद्या स्टोक्स का नामांकन रद्द हो गया अन्यथा 90 साल की उम्र में वे चुनाव लड़ रही होतीं. वहीं, पार्टी ने बेशक परिवारवाद को तिलांजलि देने की कसम ली हो लेकिन हिमाचल में सारी कसमें जाती रहीं.

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मोदी बनाम वीरभद्र
वीरभद्र सिंह तो चुनाव में खड़े हैं ही, उनके पुत्र को भी टिकट मिला है. स्वास्थ्य मंत्री कौल सिंह की बेटी टिकट को दिया गया है. विधानसभा अध्यक्ष बीबीएल बुटेल के बेटे को टिकट मिला है. इसी सरकार में मंत्री रहे दिवंगत कर्ण सिंह का बेटा चुनाव मैदान में है. विधानसभा में उपाध्यक्ष रहे रामनाथ शर्मा के बेटे कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं.
बेटे नीरज की जगह उनके पिता को टिकट दिया गया है. भाजपा इस बार परिवारवाद से अछूती रही है और इसके लिए पार्टी की की प्रशंसा भी की जा रही है. यदि भाजपा किसी नेता की लीडरशिप में चुनाव नहीं लड़वाती है तो लड़ाई को मोदी बनाम वीरभद्र की नज़र से भी देखा जा रहा है. मोदी का हिमाचल से नाता रहा है.

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कांग्रेस की सरकार
वे यहां पार्टी के चर्चित संगठन सचिव रहे हैं. धूमल को मुख्यमंत्री बनाने में उनका अहम रोल रहा है. मोदी का हिमाचल में ग्रास रूट पर काम रहा है और यहां के नेताओं से लेकर, यहां के तमाम सियासी पहलुओं से भी वे पूरी तरह वाकिफ हैं. हालांकि पार्टी में दबाव बराबर बनाया जा रहा है कि लीडर घोषित किया जाए.
लेकिन घोषित नहीं करवाने के लिए भी लॉबिंग की जा रही है. दिल्ली ने फिलहाल तो ज़्यादा तरजीह नहीं दी लेकिन चर्चा जारी है. लगातार दो बार पहाड़ को फतह करने की हसरत अजब पहेली जैसी है. 1985 के बाद किसी भी पार्टी की सरकार रिपीट नहीं हुई हैं. 1985 में कांग्रेस की सरकार बनी तो 1990 में भाजपा की.

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कहां हैं हिमाचल के मुद्दे?
1993 में फिर कांग्रेस सत्तासीन हुई तो 1998 में भाजपा. इसी प्रकार 2003 में कांग्रेस की वापसी हो गई तो 2007 में भाजपा. अगले चुनाव 2012 में हुए और कांग्रेस की सरकार बनी. इन सभी चुनावों में 1998 में कांग्रेस सरकार रिपीट कर रही थी लेकिन पंडित सुखराम की पलटी और एक सीट उनके मुंह से सत्ता छीन ले गई.
वहीं भाजपा भी 2012 में रिपीट करते-करते रह गई. अब यह शाप बरकरार रहता है या कुछ और होता है, इसके लिए जद्दोजहद जारी है. वे दिन कभी के लद गए जब हिमाचल को साफ सुथरी सियासत के लिए जाना जाता था. उठापटक की सियासत तो कई चुनाव पहले शुरू हो गई थी लेकिन कीचड़ उछालने की परंपरा 2003 के चुनाव में आरंभ हुई.

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निशाने पर वीरभद्र
संभवतयः पहला मौका होगा जब चुनावी प्रचार के दौरान उछाले गए कीचड़ को लेकर अदालत में लंबे समय तक मानहानि के मामले चले. 2012 में वीरभद्र सिंह मुद्दा हो गए. पार्टी में भी और भाजपा के लिए भी. वीरभद्र सिंह के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते जिस तरह का चुनावी प्रचार और ज़ुबानी जंग हुई, वैसी कभी नहीं देखी.
इस बार भी सरकार के पांच साल वीरभद्र सिंह और उनके परिवार के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामलों को लेकर ज़्यादा चर्चा में रहे. तो वीरभद्र सरकार भी धूमल और उनके सांसद पुत्र अनुराग ठाकुर के ख़िलाफ़ डटी रही. सो इस बार भी भाजपा का मुद्दा मुख्य रूप से भ्रष्टाचार ही है और निशाने पर वीरभद्र सिंह.
हिमाचल में पर्यटन, रोज़गार जैसे मुद्दे कई चुनावों में गौण ही रहे हैं.
(लेखक स्थानीय अख़बार 'हिमाचल दस्तक' के संपादक हैं.)
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