भाजपा में जाने को क्यों मचल रहे हैं कांग्रेसी विधायक

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- Author, विनोद शर्मा
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
एक के बाद एक झटकों से कांग्रेस अभी उबर नहीं पा रही है कि हिमाचल प्रदेश और बिहार में उसके विधायकों में विद्रोह की सुगबुगाहट शुरू हो गई है.
हिमाचल में कुछ विधायकों ने जहां मौजूदा मुख्यमंत्री वीरभद्र के ख़िलाफ़ बग़ावती तेवर अपना लिया है वहीं बिहार में भी कुछ कांग्रेसी विधायकों टूटने की आशंका पैदा हो गई है.
बग़ावती तेवर वाले विधायकों का ग़ुस्सा शांत करने के लिए अब सोनिया गांधी ने हस्तक्षेप किया है. बीते गुरुवार को बिहार प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष अशोक चौधरी और विधायक दल के नेता सदानंद सिंह को इसी संबंध में दिल्ली बुलाया गया था.
राजनीतिक रूप से अक्सर शांत रहने वाले हिमाचल प्रदेश और इसके उलट बिहार इन दोनों राज्यों में कांग्रेस के एक हिस्से में पिछले कुछ दिनों से हलचल देखी जा रही है. इस हलचल को इन दोनों राज्यों के कुछ कांग्रेसी नेताओं के मन में अंसतोष की उपज माना जा रहा है.

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बग़ावती तेवर
हिमालच प्रदेश और बिहार में कांग्रेस के भीतर उथल-पुथल कहीं कांग्रेस को भारी न पड़ जाए.
कांग्रेस के भीतर उत्तेजना हर राज्य में और केंद्र में भी है क्योंकि वो चुनाव लगातार हार रही है. पंजाब एक अपवाद है जहां कैप्टन अमरिंदर सिंह पार्टी की बदौलत नहीं बल्कि अपनी छवि के बूते जीते. कांग्रेस का तंत्र तमाम राज्यों में चरमराया हुआ है और कई वर्षों से तवज्जो की राह देख रहा है.
लेकिन कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व की तरफ़ से ऐसा कुछ नहीं हो रहा जिससे पार्टी का चरमराया हुआ ढांचा दुरुस्त हो सके.
हिमाचल प्रदेश की बात करें तो मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह पिछले चुनाव से पहले भी रूठ गए थे और तब बहुत मुश्किल से उन्हें मुख्यमंत्री पद के दावेदार के तौर पर आगे बढ़ाया गया था.
वीरभद्र सिंह का कार्यकाल अब ख़त्म हो रहा है लेकिन वो किसी और युवा के लिए आसानी से जगह बनाने के लिए तैयार नहीं हैं.
यही वजह है कि हिमाचल में कांग्रेस के भीतर उनसे नाराज़गी है और ये वो लोग हैं जो चाहते हैं कि उन्हें भी मुख्यमंत्री बनने का मौका मिले.

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हिमाचल में खींचतान
हिमाचल में कांग्रेस प्रमुख और मुख्यमंत्री के बीच इसी बात पर खींचतान चल रही है.
बिहार की स्थिति कमोबेश थोड़ी अलग है. यहां जो चुने हुए विधायक हैं, वो सत्ता में जाना चाहते हैं.
यहां कांग्रेसी विधायकों को उन्हें उम्मीद थी कि उनकी सरकार बन जाएगी और उन्हें मंत्री पद भी मिल जाएंगे. गठबंधन सरकार में कुछ लोग सरकार में आए भी.
लेकिन इसी बीच गठबंधन टूट गया और कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई है. इतना ही नहीं जनता दल यूनाइटेड (जदयू) ने भारतीय जनता पार्टी के साथ गठबंधन कर लिया है.
इसकी वजह से कांग्रेस के विधायक इस कोशिश में होंगे कि अगर वो जदयू या भाजपा में जल्द ही शामिल हो जाएंगे तो संभावना है कि उन्हें मंत्री पद मिल भी जाए.

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कांग्रेस को जुगत लगानी होगी
लेकिन कांग्रेस के विधायक पार्टी छोड़कर निकले तो जो दल-बदल निरोधी क़ानून है, उसके तहत जितनी संख्या होनी चाहिए, उसी हिसाब से उन्हें रणनीति तय करनी होगी, वरना मंत्री बनना तो दूर विधायक भी नहीं रहेंगे.
भाजपा को कांग्रेसियों को लुभाने का मौका मिल रहा है. कांग्रेस को इस पर सोचना होगा कि क्यों लोग पार्टी को छोड़कर जा रहे हैं.
पार्टी के भीतर जब इस तरह की खींचतान चले और पार्टी केंद्र में मज़बूत नज़र नहीं आती है तो फिर भाजपा को मौका मिल जाता और वो कांग्रेस के प्रमुख चेहरों को अपनी ओर लाने की कोशिश करती है.
असम में हेमंत बिश्वशर्मा के संदर्भ में हमने यही देखा है. उत्तरप्रदेश में रीता बहुगुणा जोशी या गुजरात में शंकर सिंह वाघेला के मामले में यही नज़र आया.

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कांग्रेस ध्यान नहीं दे रही
इस तरह के और भी उदाहरण दिए जा सकते हैं जिनकी वजह से ये लगता है कि कांग्रेस अपने संगठन पर ज़्यादा ध्यान नहीं दे रही है जिसकी वजह से उसे नुकसान उठाना पड़ रहा है.
यही मुख्य कारण है कि कई ग़लतियों के बावजूद सत्तारूढ़ भाजपा की लोकप्रियता में कोई कमी नज़र नहीं आ रही है.
यहां तक कि प्रधानमंत्री की लोकप्रियता में भी कमी नहीं आई है जो किसी भी प्रधानमंत्री के तीन साल पूरे होने पर कम हो ही जाती है.
कांग्रेस को इस पर विचार करना होगा, हिमाचल प्रदेश के अलावा राजस्थान और गुजरात में भी चुनाव होने हैं जहां सीधा मुकाबला भाजपा और कांग्रेस के बीच है.
(बीबीसी संवाददाता संदीप सोनी से बातचीत पर आधारित)
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