नज़रिया: 'स्ट्रीट फ़ाइट' के नए तरीक़े ढूंढ़िए, मोदी जी!

नरेंद्र मोदी

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    • Author, राजेश जोशी
    • पदनाम, रेडियो एडिटर, बीबीसी हिंदी

नरेंद्र मोदी की कई ख़ूबियों में से एक ख़ूबी ये है कि वो ज़रूरत पड़ने पर बेखटके प्रधानमंत्री की गरिमा वाला चोला उतार फेंकते हैं और फिर अपना पुराना 'स्ट्रीट फ़ाइटर' वाला चोला पहन लेते हैं जिसे पहनकर उन्होंने अब तक भारतीय जनता पार्टी के भीतर और बाहर के विरोधियों को परास्त किया है और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक साधारण प्रचारक से देश के प्रधानमंत्री पद तक पहुंचे हैं.

लोकसभा चुनाव जीतने और प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने शायद ही फिर कभी 'युवराज' कहकर कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी का मखौल उड़ाया हो. पर पिछले हफ़्ते हिमाचल प्रदेश में विधानसभा चुनावों के लिए अपनी पार्टी के प्रचार अभियान की शुरुआत करते हुए उन्होंने फिर से राहुल गांधी का मज़ाक उड़ाने के अंदाज़ में उन्हें 'युवराज' कहा और कहा कि कांग्रेस अध्यक्ष और युवराज सहित पूरी कांग्रेस पार्टी ज़मानत पर है.

'स्ट्रीट फ़ाइटर' वाला चोला पहनते ही मोदी अपने विरोधियों को जोकरों की जमात में बदलने की कोशिश करते हैं ताकि उन पर हमला बोलना आसान हो जाए और सुनने वाले के दिमाग़ में मोदी-विरोधियों की यही थेथरी छवि बन जाए.

अरुण शौरी

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बीजेपी के नेता भी इस फ़ेहरिस्त में

तो दिल्ली में 49 दिन तक सरकार चलाने वाले अरविंद केजरीवाल एके-49 कहलाए गए, राहुल गांधी युवराज हो गए. पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी का दायरा मोदी ने अल्पसंख्यकों तक सीमित कर दिया था.

इस कड़ी में ताज़ा नाम भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता यशवंत सिन्हा और अरुण शौरी का भी जुड़ गया है जिन्हें इशारे-इशारे में मोदी ने महाभारत के शल्य की उपाधि से विभूषित कर दिया.

मोदी ने कहा कि महाभारत के शल्य की तरह कुछ मुट्ठी भर लोग हमेशा हताशा की बात करते हैं और कहते हैं — कुछ भी ठीक नहीं होगा. "इन लोगों को हताशा फैलाने से रात को अच्छी नींद आती है."

पर नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण के हर तीसरे वाक्य पर ताली बजाने वाले कंपनी सेक्रेटरीज़ को ये नहीं बताया कि 'नकारात्मकता' फैलाने वाले शल्य को दुर्योधन ने एक चाल के ज़रिए महाभारत में कौरवों का पक्ष लेने के लिए तैयार किया था.

जब शल्य को इस छल का अंदाज़ा हुआ तब उन्होंने युधिष्ठिर को वचन दिया कि वो युद्ध में कर्ण को हतोत्साहित करते रहेंगे. शरीर से कौरवों के पक्ष में लड़ेंगे पर मन और दिमाग़ से पाण्डवों का साथ देंगे.

शल्य को मालूम था कि कौरव महाभारत का युद्ध नहीं जीत पाएंगे और वो युद्ध के दौरान कर्ण को लगातार यही सच बता रहे थे. पर कर्ण को शल्य का सच पसंद नहीं आया.

किसी भी युग, देश, काल और परिस्थितियों में तमाम बाधाओं को पार कर, अपने विरोधियों को परास्त कर एक ख़ास मुक़ाम तक पहुंचे कर्ण को फ़ैसलाकुन क्षणों में शल्य का सच निराशाजनक ही लगता है.

नरेंद्र मोदी और लालकृष्ण आडवाणी

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कुछ लोगों के लिए दरवाज़े बंद

गुजरात से दिल्ली की ओर क़दम बढ़ाने के साथ ही नरेंद्र मोदी ने लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी जैसे बुज़ुर्ग नेताओं के साथ-साथ यशवंत सिन्हा, अरुण शौरी जैसे बीजेपी के नेताओं को भी हाशिए पर डाल दिया था.

इससे पहले गुजरात में तो उन्होंने आरएसएस और विश्व हिंदू परिषद के कुछ लोगों के लिए भी कई दरवाज़े बंद कर दिए. मोदी का सितारा बुलंद था और उनके हर फ़ैसले को लीक से हटकर और बोल्ड माना जाता था. इसलिए दबे सुरों में थोड़ी बहुत आलोचना हुई पर इससे ज़्यादा कुछ नहीं कहा गया.

पर फिर आई आठ नवंबर 2016 की शाम जब नरेंद्र मोदी ने एक बोल्ड फ़ैसला लेकर ऐलान कर दिया कि आधी रात के बाद से 500 और 1000 के नोट लीगल टेंडर नहीं रह जाएंगे.

अगले कुछ महीने पूरा हिंदुस्तान बैंको के आगे लाइन लगाकर खड़ा था और ख़ुश होकर सोच रहा था मोदी जी ने अमीरों को भी हमारी तरह लाइन में खड़ा कर दिया है. मोदी ने नोटबंदी को वर्ग संघर्ष में बदल दिया. हालांकि, अमीर किसी को भी बैंकों की लाइन में खड़े नहीं दिख रहे थे.

जब लोगों में ये शंका घर करने लगी कि कहीं ऐसा तो नहीं कि सिर्फ़ वो ही लाइन में लगा दिए गए हैं अंबानी और अडानी नहीं — तो गांधीनगर से ख़बर आ गई कि प्रधानमंत्री मोदी की नब्बे वर्ष की मां हीराबेन तक बैंक की लाइन में खड़ी हुई हैं.

बैंक में पीएम मोदी की मां

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चारों ओर मोदी-मोदी के नारे गुंजायमान होने लगे पर विपक्ष ने मोदी के इस फ़ैसले पर हमला बोला तो मोदी ने जापान की यात्रा से लौटते ही तुरंत वहीं पुराना 'स्ट्रीट फ़ाइटर' वाला चोला ओढ़ा और गोवा में बेहद तरल आवाज़ में कहा कि मेरे विरोधियों का बस चले तो वो मुझे ज़िंदा जला दें.

राष्ट्र ने फिर मोदी-मोदी के नारे लगाए

फिर आया जीएसटी यानी गुड्स एंड सर्विसेज़ टैक्स जिसको मोदी गुड एंड सिंपल टैक्स कहते हैं. पर जिसकी जेब से जीएसटी जाता है वो समझने लगा कि ये कितना गुड और कितना सिंपल टैक्स है. आधी रात को संसद के दोनों सदनों का संयुक्त सत्र आहूत करते जीएसटी को दूसरी आज़ादी की तरह पेश किया गया. ये कई दूसरे इवेंट्स की तरह एक और इवेंट था जिसे देखकर राष्ट्रभक्तों के सीने गर्व से फूल गए.

पर जैसा कि 'इवेंट मैनेजमेंट' करने वाले जानते हैं कि इवेंट संपन्न होने के कुछ समय इसका नशा उतर जाता है और उत्तेजना ख़त्म हो जाती है, इस इवेंट का असर बहुत दिनों तक नहीं रहा. गुजरात में व्यापारी लाखों की संख्या में सड़कों पर उतर आए, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में किसान बेचैन होने लगे - उन्हें उनकी फ़सल की लागत तक नहीं मिल रही थी.

काला धन पता नहीं कहां बिला गया क्योंकि प्रतिबंधित नोट का 99 प्रतिशत से ज़्यादा हिस्सा लोगों ने बैंकों में जमा करा दिया. नोटबंदी के बावजूद हिंदुस्तान से आतंकवाद की जड़ें नहीं उखड़ पाईं और न कश्मीरी पत्थरबाज़ ही बाज़ आए.

नरेंद्र मोदी, लालकृष्ण आडवाणी और अमित शाह

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और जब ये बात सामने आई कि अर्थव्यवस्था के विकास की दर 5.7 प्रतिशत तक गिर गई तब लोगों ने अपने नेज़े-भाले सान पर चढ़ाने शुरू कर दिए. महाभारत हर बार घर के भीतर ही लड़ा जाता रहा है.

इस बार भी नरेंद्र मोदी की नीतियों पर हमला ख़ुद उनकी पार्टी के सुब्रह्मण्यन स्वामी जैसे पुरोधाओं ने किया. आरएसएस से जुड़े एस. गुरुमूर्ति - जो मोदी के परम समर्थकों में हैं - भी अर्थव्यवस्था के उत्तरोत्तर ख़स्ताहाल को नज़रअंदाज़ नहीं कर सके. अरुण शौरी तो लंबे अर्से से मोदी सरकार को ढाई लोगों की सरकार कहते आ रहे हैं — एक मोदी ख़ुद, एक बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह और आधे अरुण जेटली.

पर जब यशवंत सिन्हा ने इंडियन एक्सप्रेस में खुला लेख लिखकर जेटली को सीधे-सीधे और मोदी को थोड़ा इशारे से कठघरे में खड़ा किया तो लड़ाई कुरुक्षेत्र के मैदान में आ गई और मोदी जवाब देने को मजबूर हुए.

मोदी ने सिन्हा को परोक्ष रूप से शल्य कहा तो बहुत से लोगों ने कोने में रखी महाभारत की धूल झाड़कर उसे पढ़ना शुरू कर दिया. यशवंत सिन्हा ने भी नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी पर कटाक्ष करने के लिए महाभारत का ही सहारा लिया और एक समारोह में कहा - कौरव सौ भाई थे पर सिर्फ़ दो प्रसिद्ध हुए: दुर्योधन और दुशासन.

बीते साढ़े तीन बरस में यही सबसे बड़ा अंतर आया है. तब नरेंद्र मोदी एक स्ट्रीट फ़ाइटर की तरह अपने विरोधियों को सरेआम चारों खाने चित्त करते थे तो कहीं से कोई आवाज़ नहीं आती थी. अब यशवंत सिन्हा मोदी को उन्हीं की तरह, उन्हीं के मुहावरे में जवाब देकर राष्ट्रीय बहस का रुख़ मोड़ दे रहे हैं.

आपको अपने विरोधियों से लड़ने का मुहावरा बदलना होगा, मोदी जी.

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