गुजरात चुनाव में देरी से किसका नफ़ा, किसको नुकसान

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- Author, दिलनवाज़ पाशा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
गुजरात के चुनाव कार्यक्रम की घोषणा न करने को लेकर कांग्रेस ने चुनाव आयोग पर सवाल उठाए हैं. चुनाव आयोग ने 12 अक्तूबर को हिमाचल प्रदेश का चुनावी कार्यक्रम घोषित कर दिया लेकिन गुजरात के लिए चुनाव की तारीख़ों का ऐलान नहीं किया.
चुनाव आयोग के इस क़दम के बाद सवाल उठ रहा है कि क्या गुजरात के चुनावों की घोषणा में देरी से भाजपा को फ़ायदा होगा?
राजनीतिक विश्लेषक आरके मिश्रा कहते हैं, "बीजेपी ये समझती है कि उसके ख़िलाफ़ सोशल मीडिया पर जो माहौल बना है, वो ठंडा हो जाएगा और ज़मीन पर जो सामाजिक अभियान चल रहे हैं वो भी नरम पड़ जाएंगे लेकिन ये कम होता नज़र नहीं आ रहा है, ऐसे में ये लग नहीं रहा है कि चुनावों की घोषणा में देरी का बीजेपी को बहुत फ़ायदा नहीं होगा, हां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को थोड़ा और समय ज़रूर मिल जाएगा."

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सोशल मीडिया
वहीं वरिष्ठ पत्रकार अजय उमट कहते हैं, "भाजपा चाहती है कि चुनाव जितना हो सकें, देर से हों. क्योकि जातिगत समीकरण अभी भाजपा के पक्ष में नहीं हैं और भाजपा जितना हो सकता है सरकारी योजनाओं के ज़रिए जनता को लुभाना चाहती है."
उनका कहना है, "भाजपा को लग रहा है कि जुलाई में जो माहौल उसके पक्ष में था, अब वैसी बात नहीं हैं. गुजरात में भारी बारिश के साथ आई बाढ़ के बाद राहत कार्यों से जनता संतुष्ट नहीं है. लोगों में ग़ुस्सा है."
अजय उमट के मुताबिक "भाजपा ने जितने भी चुनावी कैंपेन बनाए उसके ख़िलाफ़ आम लोगों की ओर से सोशल मीडिया पर जिस तरह के जवाब आए हैं, उनसे भाजपा नेतृत्व चिंतित है. सोशल मीडिया पर चल रहा नारा 'विकास पागल हो गया है' भाजपा को दिखा रहा है कि ज़मीन पर राजनीतिक उथल-पुथल है. ऐसे में भाजपा चाहती है कि सरकारी घोषणाएं के ज़रिए लोगों को मनाया जाए ख़ासकर पटेल वर्ग को."

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सत्ता विरोधी लहर
चुनावी कार्यक्रम घोषित होने पर चुनाव आचार संहिता लागू हो जाती है और सरकार के अधिकार बेहद सीमित हो जाते हैं. भाजपा सरकार आचार संहिता न लगने का पूरा फ़ायदा उठाने की कोशिश कर रही है.
अजय उमट कहते हैं, "बीते पंद्रह दिनों में गुजरात में सरकार ने क़रीब सात-आठ हज़ार करोड़ रुपये की घोषणाएं की हैं. सबसे ज़्यादा पटेल समुदाय को लुभाने की कोशिश की गई है. इसके अलावा समाज के अन्य असंतुष्ट वर्गों को भी लुभाने की कोशिश की गई है. बीते रविवार को भी गुजरात कैबिनेट की अहम बैठक हुई और कई तरह के फ़ैसले लिए गए."
गुजरात में भारतीय जनता पार्टी 22 सालों से सत्ता में हैं और इस बार उसे विरोधी लहर का सामना करना पड़ रहा है. चुनावों से कुछ महीने पहले भाजपा ने 182 में से 150 सीटें जीतकर रिकॉर्ड बनाने का लक्ष्य तय किया था लेकिन अब पार्टी सरकार बचाने के लिए संघर्ष करती दिख रही है.

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मोदी की रैली
आरके मिश्र कहते हैं, "गुजरात में इस समय हालात ऐसे हो गए हैं कि नरेंद्र मोदी को आख़िर में चुनाव को अपनी आन का मुद्दा बनाना पड़ेगा. प्रधानमंत्री का बार-बार गुजरात आना इसी बात का संकेत है."
उनका कहना है, "वडोदरा की रैली के बाद नरेंद्र मोदी ने रैली के स्थानीय आयोजक से कहा कि रैली में बाहरी लोग ज़्यादा दिख रहे हैं. प्रधानमंत्री का ये कहना गुजरात के राजनीतिक हालात को बयान करता है. शहरी क्षेत्रों में भाजपा मज़बूत है. ऐसे में प्रधानमंत्री का रैली में शहरी लोगों की कम उपस्थिति पर ग़ौर करना बताता है कि उन्हें संकेत मिल गया है कि पार्टी के लिए गुजरात में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है."
मिश्र कहते हैं, "नरेंद्र मोदी के बयान भी ये बताते हैं गुजरात में पार्टी कमज़ोर है और उन्हें चीज़ें अपने हाथ में लेने की ज़रूरत पड़ रही हैं."

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मोदी की इज़्ज़त का मसला?
गुजरात का चुनाव बीजेपी के लिए इसलिए भी बेहद अहम है क्योंकि यहां हार 2019 के आम चुनावों पर भी असर डालेगी.
मिश्र कहते हैं, "यदि भाजपा चुनाव हार जाती है या बेहद कम अंतर से जीतती है तो इससे 2019 आम चुनावों में भी भाजपा के लिए स्थितियां मुश्किल हो जाएंगी क्योंकि अभी तक भाजपा देश को गुजरात मॉडल ही बेचती आ रही है. ऐसे में इस मॉडल को ही नकार दिया जाना भाजपा को नकारने जैसा होगा."
हालांकि आरके मिश्र मानते हैं कि नरेंद्र मोदी गुजरात के चुनाव को हर हाल में जीतना चाहेंगे और इसके लिए वो हर संभव प्रयार करेंगे.
मिश्र कहते हैं, "मोदी इस चुनाव को अपनी इज़्ज़त का मुद्दा बना लेंगे और अंतिम दौर में ये चुनाव बेहद भावनात्मक अपील तक भी पहुंच सकता है."
इस बार गुजरात में चुनाव बेरोज़गारी, आर्थिक विकास और मूलभूत सुविधाओं के मुद्दें पर ज़्यादा लड़ा जा रहा है.
उमट कहते हैं, "अभी गुजरात चुनावों में सांप्रदायिकता का शोर नहीं हैं. लोग रोज़गार और भ्रष्टाचार की बात कर रहे हैं. मोदीनोमिक्स और गुजरात मॉडल जैसे शब्द जो गुजरात से निकले उन पर सवाल उठ रहा है."
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