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रविवार, 23 मार्च, 2008 को 00:36 GMT तक के समाचार
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आशुतोष गोवारीकर के साथ एक मुलाक़ात

आशुतोष गोवारीकर
आशुतोष गोवारीकर की पिछली तीन फ़िल्में काफ़ी सफल रही हैं

बीबीसी हिंदी सेवा के विशेष कार्यक्रम 'एक मुलाक़ात' में हम भारत के जाने-माने लोगों की ज़िंदगी के अनछुए पहलुओं से आपको अवगत कराते हैं.

इस हफ़्ते 'एक मुलाक़ात' में हमारे साथ हैं हिंदी सिनेमा के एक बहुत ही ख़ास निर्देशक आशुतोष गोवारीकर.

महबूब ख़ान के बाद आशुतोष बॉलीवुड के पहले निर्देशक हैं जिनकी फ़िल्म ऑस्कर के लिए नामांकित हुई थी.

आपके काम की इतनी तारीफ़ होती है, तो हर बार नई फ़िल्म को लेकर उम्मीदों का दबाव भी रहता होगा?

नहीं, फ़िल्म रिलीज़ के वक़्त मेरे ऊपर कोई दबाव नहीं रहता बल्कि मैं राहत महसूस करने लगता हूँ. मैं कहानी चुनने के समय दबाव महसूस करता हूँ. उस वक़्त मैं सोचता हूँ कि क्या यह एक मनोरंजक कहानी होगी? क्या दर्शक इसे पसंद करेंगे? इस तरह कहानी को मैं सारी कसौटियों पर जाँच लेता हूँ.

'जोधा अकबर' की कहानी को भी मैंने इन सारी कसौटियों पर कस लिया था और जिस तरह से यह फ़िल्म बनी है उससे मैं खुश हूँ. मैंने जैसी स्क्रिप्ट तैयार की थी, फ़िल्म पर्दे पर वैसी ही दिख रही है.

आपने कहा कि कहानी चुनने के समय सबसे ज़्यादा तनाव रहता है. मैंने अनुभव किया है कि फ़िल्म की कहनी पर आप बहुत गंभीरता से अध्ययन करते हैं. यह बहुत मेहनत का काम है, इसमें मज़ा आता है क्या?

मुझे तो मज़ा आता है. दरअसल मैंने अपनी तीनों फ़िल्मों चाहे वह लगान हो, स्वदेस हो या फिर जोधा अकबर इनके विषय ही ऐसे चुने थे जिसमें रिसर्च ज़रूरी थी. आपका कहना भी सही है कि ज़्यादा रिसर्च भी नहीं होनी चाहिए क्योंकि आख़िरकार एक फ़िल्म ही तो बनानी है. मैं कोशिश करता हूँ कि रिसर्च का दायरा फ़िल्म की कहानी के बाहर न जाए.

आप अगर 'जोधा अकबर' को देखेंगे तो इसका विषय अकबर के 13 साल से 28 साल तक का जीवन है. इसलिए मैंने अपने रिसर्च का दायरा बाबर, हुमायूँ और अकबर तक ही रखा है. जहाँगीर या शाहजहाँ के काल का न तो फ़िल्म में जिक्र है और न ही मैंने इस बारे में जानने की कोशिश की.

लेकिन ऐसे कितने निर्देशक होंगे, जो अगर किसी पर फ़िल्म बनाएं तो उसके दादा पर भी रिसर्च कर लें?

देखिए जब मैं ट्रेलर के ज़रिए ऐतिहासिक कहानी का वादा करता हूँ तो दर्शक फ़िल्म देखने के समय अपेक्षा करता है कि जो कहा गया है वह हो. जैसे 'लगान' के ट्रेलर के ज़रिए मैं कहता हूँ कि सन् 1893 की ऐतिहासिक कहानी है जिसमें गाँववाले ब्रिटिश राज के ख़िलाफ़ हैं. तो फ़िल्म देखने समय दर्शकों की चेतना में कहीं न कहीं अपेक्षा रही होगी कि ट्रेलर में जो कहा गया है वो हो. इसलिए यह ज़रूरी है कि कहानी के दायरे के मुताबिक रिसर्च हो.

हम और आप भी जब ऐतिहासिक चीज़ों को देखते हैं तो आक्रामक नज़रिए से देखते हैं क्योंकि हमें उसमें से खामियाँ निकालनी होती हैं या फिर कोई ग़लती रह गई है तो उसे निकालनी होती है. मुझे इससे बहुत डर लगता है.

आप इसे चाहे दर्शकों और आलोचकों की अपेक्षा कहें या फिर विश्वास, इस पर खरा तो उतरना ही पड़ता है.

बिल्कुल. जैसे 'स्वदेस' एक सोशल ड्रामा है लेकिन मुझे यह जानना था कि एक एनआरआई जो अपने सपनों को पूरा करने के लिए बाहर गया था क्या सोचता है. क्या वो खुश है? कितने बार एक दिन या एक महीने में वह अपने देश को याद करता है? मुझे इस बारे में रिसर्च करना था और इसके लिए मैंने एक प्रश्नावली तैयार करने अपने एनआरआई दोस्तों के पास भेजी. उनकी भावनाओं को फ़िल्म में शामिल किया.

 आमिर हर काम को नफ़ासत से करना पसंद करते हैं और उन्हें स्क्रिप्ट हर डिटेल्स जाननी होती है. इसके ज़रिए वह अपने पात्र की तैयारी करते हैं और पूरी तैयारी के साथ सेट पर आते हैं. आमिर को इससे अपनी भावना व्यक्त करने में आसानी होती है.

यह एक अलग प्रकार का रिसर्च था लेकिन मुझे लगा कि यह बहुत ज़रूरी है ताकि अमरीका में बैठा कोई भारतीय भी ख़ुद को इस फ़िल्म से जोड़ सके.

'लगान' बनाते वक़्त क्या आपने यह सोचा था कि फ़िल्म ऑस्कर के लिए नामांकित होगी और आपकी तुलना महबूब ख़ान से होने लगेगी?

ईमानदारी से कहूँ तो नहीं. ऑस्कर के लिए नामांकित होने के बारे में तो मैंने सोचा ही नहीं था लेकिन इतना जानता था कि फ़िल्म दर्शकों को पसंद आएगी. इस फ़िल्म में एक गाँव ब्रिटिश राज के ख़िलाफ़ उठ खड़ा होता है और क्रिकेट के ज़रिए लगान माफ़ करवाता है.

इसमें इतिहास भी है और आधुनिकता भी. फ़िल्म में राजनीति, क्रिकेट और बाग़ीपन का मिश्रण था और वह भी मनोरंजन के रूप में. इसलिए मैं यह तो जानता था कि फ़िल्म चलेगी, लेकिन कितनी चलेगी यह कोई भी नहीं बता सकता.

आपने अपनी पिछली तीनों फ़िल्मों में आज के दौर के तीनों बड़े स्टारों के साथ काम किया है. आमिर, शाहरुख़ और ऋतिक कैसे एक-दूसरे से अलग हैं?

तीनों के काम करने का तरीक़ा बिल्कुल अलग है लेकिन परिणाम एक ही है. तीनों बड़े सफल स्टार हैं. आमिर हर काम को नफ़ासत से करना पसंद करते हैं और उन्हें स्क्रिप्ट की हर डिटेल्स जाननी होती है. इसके ज़रिए वह अपने पात्र की तैयारी करते हैं और पूरी तैयारी के साथ सेट पर आते हैं. आमिर को इससे अपनी भावना व्यक्त करने में आसानी होती है.

शाहरुख़ एक बार स्क्रिप्ट जान लेते हैं और फिर अपने आप को छोड़ देते हैं. सेट पर वह सहज तरीक़े से उन्मुक्त होकर शॉट देते हैं. इसलिए उन्हें मैं जीनियस मानता हूँ.

ऋतिक दोनों का मिला-जुला रूप हैं. वो स्क्रिप्ट के ज़रिए जितना कर सकते हैं करते हैं और फिर सेट पर सहज शॉट देते हैं. जैसे 'जोधा अकबर' में उर्दू के काफ़ी शब्द हैं तो ऋतिक हर संवाद का उच्चारण सही करने के लिए बार-बार रियाज़ करके आते थे.

 ऐश्वर्या गज़ब की अभिनेत्री हैं और यह जानने के लिए मुझे उनके साथ फ़िल्म बनाने की ज़रूरत नहीं थी. मुझे लगता है कि पहली फ़िल्म ‘और प्यार हो गया’ से 'शब्द' तक में उन्होंने अपने तरीक़े अलग-अलग चीज़ों को करने की कोशिश की है. उनकी फ़िल्म 'गुरु' मैं अभी देख नहीं पाया हूँ. जब वो 'चोखेर बाली' और 'शब्द' जैसी फ़िल्में करती हैं तो आप नया करने की उनकी भूख को समझ सकते हैं. 'जोधा अकबर' में भी उन्होंने बहुत अच्छा काम किया है.

वैसे किसी ख़ास समय में आप किसी अभिनेता के अभिनय के तरीक़े को परिभाषित नहीं कर सकते. इसका कोई नियम नहीं है. मैंने आमिर के कई शॉट देखे हैं जो गज़ब के सहज थे. बहुत कुछ इस पर निर्भर करता है कि आप जिस निर्देशक के साथ काम कर रहे हैं उसका तरीका क्या है.

बड़े स्टार के साथ काम करने में थोड़ी दिक्कत तो होती होगी?

ऐसा ज़रूरी नहीं है. वैसे तो हर प्रॉजेक्ट जोखिम भरा होता है लेकिन 'पहला नशा' और 'बाज़ी' को छोड़ दे तो बाक़ी फ़िल्में काफ़ी जोखिम भरी थीं. 'लगान' के समय पीरियड फ़िल्में नहीं बन रही थीं और शाहरुख़ ने 'स्वेदस' से पहले कभी सोशल ड्रामा में काम नहीं किया था. मैं मानता हूँ कि आमिर के बिना भुवन की कल्पना नहीं की जा सकती थी, शाहरुख़ के बिना मोहन भार्गव नहीं हो सकता था और ऋतिक-ऐश्वर्या के बिना 'जोधा अकबर' नहीं बन सकती थी.

आप जब 'स्वदेस' जैसी फ़िल्म बनाते हैं तो चाहते हैं कि हर आम आदमी तक पहुँचे और बड़ा स्टार होने से आम आदमी तक पहुँचने में आसानी होती है.

तीनों में सबसे ज़्यादा पसंद कौन है?

व्यक्तिगत रूप से मुझे आमिर सबसे ज़्यादा पसंद हैं. आमिर के साथ मैंने 'बाज़ी' और 'लगान' की है. जब मेरे पास उनके लायक स्क्रिप्ट होगी तो आमिर के पास फिर जाऊंगा.

'तारे ज़मीं पर' देखी हैं आपने?

पिछले एक साल में मैं बहुत सारी फ़िल्में नहीं देख सका. अब मैं 'तारे ज़मीं पर' और 'चक दे इंडिया' जैसी फ़िल्में देखने वाला हूँ.

 अभिनय के दौरान मैंने जितना काम किया उससे खुश हूँ, मैंने क़रीब 25 निर्देशकों के साथ काम किया और उनकी कार्य शैली को समझने का मौक़ा मिला. लेकिन जिस तरह के रोल मुझे मिल रहे थे उससे मैं बहुत खुश नहीं था. इसलिए मैंने निर्देशन में रुचि लेनी शुरू कर दी. मैं निर्देशकों के काम और शैली को एकलव्य की तरह देखता रहता था. इस अनुभव से मुझे पहली फ़िल्म बनाने में काफ़ी मदद मिली.

निर्देशक बनने के बारे में कैसे सोचा?

अभिनय के दौरान मैंने जितना काम किया उससे खुश हूँ, मैंने क़रीब 25 निर्देशकों के साथ काम किया और उनकी कार्य शैली को समझने का मौक़ा मिला. लेकिन जिस तरह के रोल मुझे मिल रहे थे उससे मैं बहुत खुश नहीं था. इसलिए मैंने निर्देशन में रुचि लेनी शुरू कर दी. मैं निर्देशकों के काम और शैली को एकलव्य की तरह देखता रहता था. इस अनुभव से मुझे पहली फ़िल्म बनाने में काफ़ी मदद मिली.

जब मैंने निर्देशक के रूप में करियर की शुरुआत की तो 'पहला नशा' पहली फ़िल्म थी, हालांकि 'बाज़ी' भी क़रीब-क़रीब साथ ही आई थी.

आप तो कहते ही थे कि निर्देशक बनना है और आमिर के बारे में कहा जाता है कि वह अघोषित रूप से निर्देशक हैं. कई लोगों को लगता है कि 'लगान' में आमिर नहीं होते तो आपको और श्रेय मिलता.

आमिर ने कसम खाई थी कि वो निर्माता नहीं बनेंगे. पहली बार उन्हें एक ऐसी स्क्रिप्ट आई जो बहुत पसंद नहीं थी फिर भी उन्होंने न सिर्फ भुवन का किरदार निभाया बल्कि निर्माता बनने का ज़िम्मा भी उठाया. वो भी एक ऐसे निर्देशक के साथ जो उस समय फ़्लॉप था, क्योंकि 'बाज़ी' के बाद से तीन साल से मैं बेरोजगार था और फिर से अभिनय करने की सोच रहा था. उस दौरान आमिर ने ऐसे जोखिम भरे विषय के लिए हामी भरकर हौसला दिखाया था तो इसका श्रेय उन्हें मिलना ही चाहिए था.

मैं आमिर का हमेशा ही अभारी रहूँगा कि उन्होंने 'लगान' के ज़रिए मुझे नया जीवन दिया.'लगान' हमारे जीवन में बहुत ही संतोष देने वाल प्रॉजेक्ट रहा है जिसे याद करके हम दोनों के चेहरे पर मुस्कुराहट आ जाती है.

लोग एआर रहमान के डेट्स के लिए तरस जाते हैं लेकिन आपकी हर फ़िल्म के लिए तैयार हो जाते हैं. इसमें क्या राज़ है?

'लगान' के दौरान रहमान को प्रभावित करने के लिए मुझे कड़ी मेहनत करनी पड़ी थी. वह फ़िल्म उन्होंने मेरे नाम पर नहीं बल्कि आमिर के चलते की थी. इससे पहले दोनों साथ में 'रंगीला' कर चुके थे. उस दौरान जावेद अख़्तर साहब और एआर रहमान के साथ काम करने का मौक़ा मिला और 'स्वदेस' में यह जुड़ाव आगे बढ़ा. इससे हमलोग एक-दूसरे के साथ सहज हो गए.

मैं सौभाग्यशाली हूँ कि तीसरी बार मुझे दोनों के साथ काम करने का मौक़ा मिला. दो बार साथ काम कर चुका होने के कारण 'जोधा अकबर' का संगीत तैयार करने की प्रक्रिया बहुत मज़ेदार रही. हमलोगों ने तय किया था कि संगीत ऐसा हो जो 16 वीं शताब्दी के मुगल काल की छाप छोड़े और इसमें आधुनिकता भी हो.

कुछ निर्देशकों जैसे पुराने जमाने में राज कपूर साहब और आज कल संजय लीला भंसाली, सुभाष घई और आशुतोष गोवारिकर की फ़िल्मों में संगीत बहुत अच्छा होता है. इसकी क्या वजह हैं?

जहाँ तक मेरा सवाल है तो मेरी माँ शास्त्रीय संगीत की बहुत अच्छी गायिका हैं. मेरे घर में शुरू से संगीत का माहौल रहा है. लिहाजा मेरे लिए संगीत का बहुत महत्व है.

वैसे यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि किसी निर्देशक की संगीत में कितनी रुचि है. कुछ लोग कहानी पर ज्यादा ध्यान देते हैं और संगीत को छोड़ देते हैं. इससे फ़िल्म में गाना कब आता है और चला जाता है पता ही नहीं चलता. जबकि मैं पसंद करता हूँ कि गाना फ़िल्म की भावना को आगे बढ़ाए.

मुझे गाना कहाँ डालना है जब यह समझ में आ जाता है तो मैं जावेद साहब और रहमान से बात कर सकता हूँ. क्योंकि अगर जावेद अख़्तर पूछँगे कि यहाँ गाना क्यों डाला जा रहा है तो मेरे पास इसका जवाब होना चाहिए.

फ़िल्म की भावना के हिसाब से आपका ख़ुद का पसंदीदा गाना कौन-सा है?

मैं तो तीनों फ़िल्मों के लिए कह सकता हूँ. 'लगान' में घनन-घनन और 'स्वदेस' में ये तारा वो तारा...गाने फ़िल्म की भावना का प्रतिनिधत्व करते हैं.

'जोधा अकबर' की बात करें तो 'अजीमो शान शहंशाह...' फ़िल्म की ताक़त और मुगल और राजपूत गठजोड़ को दर्शाता है.

आपने 'लगान' और 'स्वदेस' में अभिनेत्री के रूप में स्थापित कलाकार को नहीं लिया था लेकिन 'जोधा अकबर' में इतनी बड़ी स्टार को लिया, क्यों?

इस फ़िल्म में दोनों ही किरदार बराबर महत्व के थे. इसलिए या तो मैं दोनों कलाकार नए लेता या फिर दोनों स्टार लेता. ऋतिक के साथ नई अभिनेत्री लेता तो फ़िल्म का नाम सिर्फ़ अकबर रखना पड़ता. जब मैंने पहली बार हैदर अली से कहानी सुनी तो मेरे दिमाग में सबसे पहले यही बात आई थी कि इसमें बड़े कलाकार होने चाहिए और फिर मुझे लगा कि वो ऋतिक और ऐश्वर्या ही होने चाहिए.

'लगान' में हम देख रहे थे कि भुवन यानी आमिर किस तरह से गाँव चंबानेर का हिस्सा लगना चाहिए. इसके लिए ज़रूरी था कि सारे चेहरे नए हों, इसलिए गौरी के रूप में ग्रेसी सिंह को लिया गया. इसी तरह से 'स्वदेस' में मोहन भार्गव चरणपुर के नए माहौल में आते हैं तो बहुत ज़रूरी था कि नई लड़की हो.

'लगान' का विचार कैसे आया?

मेरा मूल विचार यह दिखाने का था कि किस तरह से उपेक्षित व्यक्ति असंभव लक्ष्य को हासिल करते हैं और मुझे यह बताने के लिए समकालीन कहानी नहीं बनानी थी. रिसर्च के दौरान मुझे पता चला कि 19 वीं शताब्दी ख़त्म होने के लगभग भारत में क्रिकेट धीरे-धीरे पहुँच रहा था.

मैंने यह सोच रखा था कि मुझे सामूहिक जीत दिखानी है तो लगा कि अगर मैं यह दिखाऊं कि सारे नायक 'लगान' माफ़ कराने के लिए यानी अपने पापी पेट के लिए अंग्रेज़ों का खेल खेलते हैं और ब्रिटिश अफ़सरों की टीम को हराते हैं, तो यह लोगों को बहुत पसंद आएगा.

जब 'लगान' के बाद मैं आपसे मिला था आप सैनिक विद्रोह से जुड़ी किताबें पढ़ रहे थे, कहीं ऐसा तो नहीं कि 'मंगल पांडे' बनाने की सोच रहे थे और उस पर फ़िल्म बन गई?

 मैं अगर रेडियो पर फ़िल्म बनाऊंगा तो मैं जानना चाहूँगा कि रेडियो की खोज कैसे हुई. अगर मैं आज मैं ‘लॉर्ड ऑफ द रिंग्स’ देखता हूँ तो मेरे दिमाग में सबसे पहले यह बात आती है कि यह विचार निर्देशक के दिमाग में आया कैसे और अगर किताब से आया तो उसे किसने लिखी और फिर लेखक के दिमाग में यह विचार कैसे आया.मुझे विचार की उत्पति के बारे में जानने का बड़ा उत्साह रहता है. मैं बिना जाने फ़िल्म नहीं बना सकता.

मैं तब 'स्वेदस' के लिए रिसर्च कर रहा था. सही शब्द स्वदेश है लेकिन मैंने फ़िल्म में 'स्वेदस' का प्रयोग किया है. मैं उस समय यह जानने की कोशिश कर रहा था कि स्वदेशी आंदोलन का जन्म कैसे हुआ.

यही मेरे काम करने की शैली है. जैसे मैं अगर रेडियो पर फ़िल्म बनाऊंगा तो मैं जानना चाहूँगा कि रेडियो की खोज कैसे हुई. अगर मैं आज ‘लॉर्ड ऑफ द रिंग्स’ देखता हूँ तो मेरे दिमाग में सबसे पहले यह बात आती है कि यह विचार निर्देशक के दिमाग में आया कैसे और अगर किताब से आया तो उसे किसने लिखी और फिर लेखक के दिमाग में यह विचार कैसे आया.मुझे विचार की उत्पति के बारे में जानने का बड़ा उत्साह रहता है. मैं बिना जाने फ़िल्म नहीं बना सकता.

ऐश्वर्या के साथ काम करने का अनुभव कैसा रहा?

ऐश्वर्या गज़ब की अभिनेत्री हैं और यह जानने के लिए मुझे उनके साथ फ़िल्म बनाने की ज़रूरत नहीं थी. मुझे लगता है कि पहली फ़िल्म ‘और प्यार हो गया’ से 'शब्द' तक में उन्होंने अपने तरीक़े अलग-अलग चीज़ों को करने की कोशिश की है. उनकी फ़िल्म 'गुरु' मैं अभी देख नहीं पाया हूँ. जब वो 'चोखेर बाली' और 'शब्द' जैसी फ़िल्में करती हैं तो आप नया करने की उनकी भूख को समझ सकते हैं. 'जोधा अकबर' में भी उन्होंने बहुत अच्छा काम किया है.

सबसे ख़ूबसूरत अभिनेत्री कौन हैं?

ऐश्वर्या. अभिनेत्री में तीन चीज़ें होनी चाहिए- अभिनय, ख़ूबसूरती और समर्पण. ऐश्वर्या में ये तीनों हैं.

मैंने सुना है कि आपने कहा है कि अब पीरियड फ़िल्म नहीं बनाएंगे, तो अगली फ़िल्म के लिए कोई विषय चुना है?

नहीं, अभी तक सोचा नहीं है. मेरा मानना है कि जब भी कहानी ढूंढ़ने जाता हूँ तो नहीं मिलती है. लेकिन अगर कोई कहानी मुझे प्रेरित करती है और वो ऐतिहासिक भी तो मैं ज़रूर बनाऊंगा. मेरे लिए फ़िल्म बनाने से ज़्यादा जरूरी उसे बनाने की प्रक्रिया है.

'जोधा अकबर' बनाते वक़्त सबसे चुनौती भरा क्षण जब लगा हो कि मैंने इस फ़िल्म को बनाने का फ़ैसला क्यों किया?

इस तरह का ख़याल कभी नहीं आया. जब आप सभी योजनाएं काग़ज़ पर बना लेते हैं तो प्रोडक्शन का काम आ जाता है. वैसे भी इस फ़िल्म में प्रोडक्शन का सारा ज़िम्मा मेरी पत्नी पर था और मेरे ऊपर सिर्फ़ रचनात्मक चीज़ों का दबाव था. अगर वो नहीं होतीं तो मैं न तो 'जोधा अकबर' बना सकता था और न ही 'स्वदेस'.

ऐसी एक फ़िल्म जिसे देखकर लगा हो इसे मैंने बनाई होती?

'शोले', 'मदर इंडिया' और इसके अलावा मेरी तमन्ना है कि जेम्स बॉन्ड की कोई एक फ़िल्म बनाऊँ. आप सोचिए कि अगर मैं बॉन्ड की फ़िल्म बनाऊँगा तो उसमें छह गाने तो होंगे ही.

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