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अर्थव्यवस्था में कहाँ खड़ा है कृषि क्षेत्र? | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत को आज़ाद हुए 59 साल हो चुके हैं और इस दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था की दशा में ज़बरदस्त बदलाव आया है. औद्योगिक विकास ने अर्थव्यवस्था का हुलिया ही बदल दिया है. लेकिन औद्योगिक विकास के बावजूद इन 59 सालों में एक तथ्य जो नहीं बदला है वो ये कि आज भी भारत के 65 से 70 फ़ीसदी लोग रोज़ी-रोटी के लिए कृषि और कृषि आधारित कामों पर निर्भर हैं.
ये एक अजीब विसंगति है कि जनसंख्या का इतना बड़ा हिस्सा कृषि पर निर्भर करता है लेकिन कृषि में विकास की दर औद्योगिक और सेवा क्षेत्र के मुकाबले कहीं कम है. पिछले कुछ सालों में कृषि क्षेत्र में विकास दर दो से तीन प्रतिशत के बीच रही है. वर्ष 2002-03 में कृषि क्षेत्र में विकास दर शून्य से भी कम थी. 2003-04 में इसमें ज़बरदस्त उछाल आया और ये 10 फ़ीसदी हो गई लेकिन 2004-05 में विकास दर फिर लुढ़क गई और ऐसी लुढ़की कि 0.7 फ़ीसदी हो गई. आर्थिक प्रगति में इस विसंगति को केंद्र सरकार भी स्वीकार करती है. केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री पवन कुमार बंसल कहते हैं, “कृषि पीछे है इसमें कोई दो राय नहीं. अगर विकास दर को 10 फ़ीसदी करना है तो कृषि में भी चार फ़ीसदी की दर से विकास करना होगा.” क्या है समस्याएँ लेकिन सवाल ये उठता है कि उद्योग और सेवा क्षेत्रों के उलट भारत में कृषि क्षेत्र में विकास की रफ़्तार धीमी क्यों है. अगर अतीत में थोड़ा झाँककर देखें तो 60 के दशक में जब हरित क्रांति आई तो बेहतर बीजों, खाद और नई तकनीक की बदौलत पैदावार में ज़बरदस्त बढ़ोत्तरी हुई. पैदावार बढ़ी, कृषि में विकास दर बढ़ी और इसका सीधा फ़ायदा किसानों और ग्रामीण लोगों को हुआ. देखते ही देखते भारत के खाद्य भंडार भरने लगे और भारत खाद्यान्नों का निर्यात करने लगा. हरित क्रांति के फ़ायदे भारत को 80 के दशक तक मिलते रहे. फिर 90 के दशक में शुरू हुआ आर्थिक सुधारों का दौर. इनके चलते उद्योगों में तो प्रगति हुई लेकिन कृषि क्षेत्र में एक ठहराव सा आ गया. इस ठहराव के लिए कई कारणों को ज़िम्मेदार माना जाता है- सिंचाई और ऋण सुविधाओं का अभाव, कृषि में निवेश की कमी, घटिया किस्म के बीज और फसलों में विविधिकरण न होना. सिंचाई
कृषि के विकास को एक प्रमुख कारण जो प्रभावित कर रहा है वो है सिंचाई. आज भी भारत में करीब 40 फ़ीसदी हिस्से असिंचित है. सिंचाई सुविधाओं के अभाव में कई किसानों को मॉनसून पर ही निर्भर रहना पड़ता है. पंजाबी विश्वविद्यालय में कृषि विशेषज्ञ प्रोफ़ेसर एसएस गिल कहते हैं कि किसानों के पास सिंचाई व्यवस्था न होना बुनियादी समस्या है और बिना इस सुविधा के कृषि क्षेत्र में विकास नहीं हो सकता. 2002-03 में कृषि में विकास दर शून्य से भी कम होने का मुख्य कारण था सूखे की स्थिति. इसके अगले ही साल झमाझम बारिश हुई तो कृषि में विकास दर 10 फ़ीसदी तक पहुँच गई. यानि पानी समय पर नहीं बरसा तो किसान की साल भर की मेहतन पर पानी फिर सकता है. पंजाबी विश्वविद्यालय में कृषि विशेषज्ञ प्रोफ़ेसर एसएस गिल इस बारे में कहते हैं, " किसान भले ही पैदावर बढ़ाने के लिए अच्छे किस्म के बीज प्रयोग करें या आधुनिक तकनीक का सहारा लें लेकिन अगर फसलों को पानी नहीं मिलेगा, तो फसलें सूखेगीं ही. " उनका कहना है, "समस्या के समाधान के लिए नहरों का निर्माण और पुरानी नहरों की मरम्मत ज़रूरी है और अगर राज्य सरकारें पंचायतों के साथ मिलकर ये काम करें तो बेहतर परिणाम सामने आएँगे." प्रोफ़ेसर गिल कहते हैं," पुराने ज़माने में लोग छोटे छोटे तालाबों में बारिश का पानी संरक्षित कर लेते थे, आज भी रेन हारवेस्टिंग की ज़रूरत है और ये काम अगर पंचायत और सामुदायिक स्तर पर हो तो अच्छा है, इसमें गैर सरकारी संस्थाओँ का सहयोग लिया जा सकता है." वे सहकारिता आंदोलन को भी और मज़बूत करने के पक्षधर हैं. कर्ज़ का बोझ
कभी बारिश न होने के चलते फसल चौपट- कभी बाढ़, कभी सूखा और कभी कीटों की मार. फसल बर्बाद होने से किसानों को ख़ासा आर्थिक नुकसान होता है. और अगर किसान साहूकारों के कर्ज़ के बोझ तले दबें हों तब तो किसानों पर मुसीबतों का पहाड़ ही टूट पड़ता है. प्रोफ़ेसर एसएस गिल कहते हैं, "भारत में ज़्यादातर छोटे और मझोले किसान हैं जिनकी आमदनी कम होती है और वे फसलों का बीमा नहीं करवा पाते. ऋण के लिए वे साहूकारों से पैसा लेते हैं, अगर पैदावार अच्छी न हो तो कर्ज़ा चुका नहीं पाते और कर्ज़े के कुचक्र में फँस जाते हैं." ऐसे में अगर किसानों के लिए किफ़ायती ऋण और बीमा की सुविधा हो तो ये उनके लिए सुरक्षा कवच का काम कर सकता है. प्रोफ़ेसर एसएस गिल कहते हैं कि ज़्यादातर छोटे और गरीब किसानों को तो ये जानकारी ही नहीं है कि बीमा योजना की सुविधा भी है और कई किसान कर्ज़ न चुका पाने के कारण आत्महत्या कर रहे हैं. अन्न का कटोरा कहे जाने वाले पंजाब राज्य में भी कई जगह किसान आत्महत्या कर चुके हैं. समस्या को देखते हुए पिछले कुछ सालों से सरकार ने किसानों के लिए राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना और किसान क्रेडिट कार्ड योजना लागू की है ताकि ऋण की समस्या से निपटा जा सके. निवेश और शोध चिंता का एक अन्य विषय है कृषि क्षेत्र में निवेश की कमी. क्रेडिट एजेंसी क्रिसिल के निदेशक डीके जोशी कहते हैं, "पहले सरकार कृषि क्षेत्र में काफ़ी निवेश करती थी. लेकिन जब भारत की वित्तीय स्थिति अच्छी नहीं थी तो कृषि क्षेत्र में निवेश में कटौती होने लगी. इसका विपरीत असर अब दिखाई दे रहा है." भारत में फसलों की पैदावार तो बढ़ी है लेकिन इनकी गुणवत्ता में कमी के चलते भारतीय फसलें अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में प्रतिस्पर्धा में पिछड़ जाती हैं. फसलों की गुणवत्ता बढ़ाने में अहम भूमिका निभाती है नई तकनीक और उत्तम किस्म के बीजों का प्रयोग जो सस्ते दरों पर उपलब्ध हों. लेकिन ये सब तभी संभव है जब निरंतर शोध का काम होता रहे. केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री पवन कुमार बंसल ने कहा है कि शोध की अहमियत को समझते हुए केंद्र सरकार ने कृषि शोध के लिए राष्ट्रीय कोष का गठन किया है. विविधिकरण
एक अन्य बहुत बड़ी समस्या जो भारतीय कृषि को प्रभावित कर रही है वो है फसलों में विविधिकरण न होने की. कई विशेषज्ञों का कहना है कि गेहूँ और धान के बजाय अब अन्य फसलों पर ध्यान दिया जाना चाहिए. इस प्रकिया में बागवानी एक बेहतर विकल्प बनकर उभर सकती है. इसमें फलों, सब्ज़ियों, मसालों और फूलों की खेती शामिल है. पंजाबी विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर एसएस गिल कहते हैं," कम से कम पंजाब और उत्तर प्रदेश जैसे इलाक़ों में तो विविधीकरण होना चाहिए. लेकिन जिस तरह गेहूँ और धान के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारित होते हैं और उनकी खरीद के लिए सरकार व्यापक इंतज़ाम करती है, उस तरह के इंतज़ाम मसालों, फलों आदि के लिए नहीं होते जिस कारण किसान विविधिकरण के प्रति उत्साहित नहीं है." भारत में लोगों को रोज़गार अवसर मुहैया करवाने, किसानों की स्थिति बेहतर बनाने और निर्यात बढ़ाने में बागवानी क्षेत्र का बड़ा हाथ है. वर्ष 2003-04 में फलों और सब्ज़िओं की पैदावार में भारत विश्व में दूसरे नंबर पर था. फलों, फूलों और सब्ज़ियों की खेती में निर्यात में भी काफ़ी संभनाएँ हैं. कृषि आधारित क्षेत्र
बात अगर कृषि क्षेत्र की हो रही है तो कृषि आधारित कामों की चर्चा करना भी ज़रूरी है. इसमें मुख्य तौर पर मछलीपालन, पशुपालन और पोल्ट्री का काम शामिल है. एक अनुमान के मुताबिक पोल्ट्री उद्योग से करीब 20 लाख लोगों को रोज़गार मिलता है जबकि मछलीपालन से करीब एक करोड़ लोगों को. भारत की राष्ट्रीय आय में भी पोल्ट्री और मछलीपालन उद्योग का अहम योगदान है. ये काम न सिर्फ़ लोगों के लिए अतिरिक्त आय का ज़रिया है बल्कि जिस दौरान खेती का काम न हो या फसल खराब हो जाएँ तो किसानों की रोज़ी रोटी का मुख्य साधन भी बन जाते हैं. भविष्य में लक्ष्य भारत में कृषि क्षेत्र की मौजूदा हालत पर आर्थिक मामलों के जानकार आलोक पुराणिक कहते हैं, "खेतीबाड़ी में मेहनत ज़्यादा है लेकिन किसान को फ़ायदा कम मिलता है. अब तो कई किसान सिर्फ़ मजबूरी में ही खेती कर रहे हैं." तमाम आर्थिक चुनौतियों के बीच भारत ने लक्ष्य रखा है 10 फ़ीसदी की विकास दर हासिल करने का. लेकिन भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ कहे जाने वाले कृषि क्षेत्र में विकास के बगैर ये लक्ष्य हासिल कर पाना भारत के लिए मुश्किल हो सकता है. अगर उद्योगों में विकास के साथ-साथ भारत के खेत खलिहान भी हरे भरे हों, तो भारत समुचित और समग्र विकास का दावा कर सकता है- ऐसा विकास जिसका फ़ायदा सिर्फ़ शहरों को ही नहीं गाँवों-कस्बों तक भी पहुँचे. |
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