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किस मोड़ पर है भारतीय अर्थव्यवस्था? | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
वर्ष 2006 के मार्च महीने में ब्रिटेन का आम बजट पेश किया गया. बजट में ब्रितानी वित्त मंत्री के भाषण का एक मुख्य अंश कुछ यूँ था. “भारत और चीन से मिलने वाली कड़ी प्रतिस्पर्धा का मतलब है कि हम हाथ पर हाथ धर कर नहीं बैठे रह सकते” इससे पहले अमरीकी राष्ट्रपति बुश ने अपने अहम राष्ट्रीय भाषण में कुछ ये कहा, “हम हाथ पर हाथ धर कर नहीं बैठ सकते. दुनिया की अर्थव्यवस्था में हम भारत और चीन जैसे नए प्रतियोगी देख रहे हैं.”
दो बड़े और विकसित देश और दोनों की टिप्पणियों में एक सी बात-चीन और भारत जैसी उभरती आर्थिक महाशक्तियों का मुकाबला करना होगा. आख़िर क्यों छाया हुआ है भारत का हौवा पूरी दुनिया में. जवाब जानने के लिए नज़र डालते हैं कुछ आँकड़ों पर. इस साल पेश किए गए आर्थिक सर्वेक्षण में वर्ष 2005-06 में भारत में 8.1 प्रतिशत विकास दर की बात कही गई थी. वहीं भारतीय रिज़र्व बैंक ने अप्रैल में अपनी वार्षिक नीति पर जारी बयान में भारत में वर्ष 2006-07 में विकास दर 7.5-8.0 फ़ीसदी के बीच रहने की उम्मीद जताई है. भारतीय अर्थव्यवस्था की मौजूदा स्थिति पर केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री पवन कुमार बंसल कहते हैं, “भारतीय अर्थव्यवस्था बहुत अच्छे मोड़ पर है इस वक़्त हमें तो उम्मीद है कि आने वाले सालों में विकास दर और बढ़ेगी.” पिछले दो सालों में भारत में 8.5 और 7.5 फ़ीसदी की दर से विकास होता रहा है. बेहतर स्थिति विकास दर के अलावा अगर आर्थिक प्रगति के दूसरे मापदंडों की बात करें तो भी भारतीय अर्थव्यवस्था काफ़ी बेहतर स्थिति में नज़र आ रही है.
24 मार्च को ख़त्म हुए सप्ताह में विदेशी मुद्रा भंडार करीब 148.662 अरब डॉलर तक पहुँच गया. कभी विदेशी संस्थानों से कर्ज़ लेने वाले भारत ने वर्ष 2003 में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष को कर्ज़ देने की घोषणा की. वर्ष 2005 में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में 33.8 फ़ीसदी की वृद्धि हुई. ये तो हुई सरकारी आँकड़ों की बात. हाल ही में संयुक्त राष्ट्र ने भी एक रिपोर्ट जारी की है जिसमें कहा गया है कि अगले दो सालों तक भारत में आठ फ़ीसदी की दर से विकास होता रहेगा, औद्योगिक क्षेत्र में आठ तो सेवा क्षेत्र में 8.5 प्रतिशत की विकास दर रहेगी. भारत की गिनती अब दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में होती है. विश्व की अर्थव्यवस्था को चलाने में भारत बड़ा खिलाड़ी बनता जा रहा है. आईटी सेक्टर में पूरी दुनिया भारत का लोहा मानती है. औद्योगिक-सेवा क्षेत्र में विकास
सवाल ये है कि आख़िर विकास रूपी गाड़ी के वो कौन से इंजन हैं जिनके चलते भारतीय अर्थव्यवस्था की गाड़ी सरपट दौड़े जा रही है. भारत की अर्थव्यवस्था में सबसे ज़्यादा विकास हुआ है उद्योग और सेवा क्षेत्र में. वर्ष 2002-03 में दसवीं पंच वर्षीय योजना शुरू होने के बाद से इन दोनों क्षेत्रों में सालाना 7 फ़ीसदी या उससे ज़्यादा की दर से विकास हुआ है. उद्योगो में मैन्यूफैक्चिरिंग, खनन और बिजली क्षेत्र अग्रणी रहे हैं. जबकि सेवा क्षेत्र की बात करें तो इसमें मोटे तौर पर तीन क्षेत्र आगे हैं- बैंकिंग, बीमा और रीयल ऐस्टेट जिनमें 9.5 फ़ीसदी के दर से विकास हुआ है. फ़ोर्ब्स पत्रिका की मानें तो दुनिया के कुल अरबपतियों की सूची में भारत के 23 अरबपति शामिल हैं. दूसरा पहलू
कुल मिला कर कहें तो बहुत ही सकारात्मक, उज्जवल और चमकती दमकती तस्वीर उभर कर सामने आ रही है मौजूदा भारतीय अर्थव्यवस्था की. लेकिन तस्वीर का एक पहलू और भी है जो आँकड़ो की चमक दमक को कुछ हद तक तो फ़ीका कर देता है. पारंपरिक तौर पर कृषि प्रधान कहे जाने वाले भारतवर्ष में 2005-06 में कृषि की विकास दर केवल 2.3 फ़ीसदी रहने की बात कही गई थी.2002-03 में तो हालत इतनी बदतर हो गई थी कि ये शून्य से भी नीचे चली गई थी(-6.9 फ़ीसदी) ये स्थिति तब है जब आज भी भारत की करीब 65 से 70 फ़ीसदी जनसंख्या रोज़गार के लिए कृषि या कृषि आधारित कामों पर निर्भर करती है. आधारभूत ढाँचा-रोज़गार?
भारत में कई जगहों में अब भी सड़क, बिजली और पानी जैसी मूलभूत ज़रूरतों की कमी है और ये तस्वीर सिर्फ़ गाँवों की ही नहीं- बंगलौर जैसे शहरों की भी है. इन मूलभूत ज़रूरतों के अभाव में उद्योग और सेवा सेक्टर में जारी विकास इतनी ही गति से बरकरार रह पाएगा ये भी एक बड़ा सवाल है. क्रेडिट एजेंसी क्रिसिल के निदेशक डीके जोशी भारत के आर्थिक विकास से खुश तो हैं लेकिन आधारभूत ढाँचे और बेरोज़गारी जैसी समस्याओं को चिंता का विषय मानते हैं. रोज़गार के अवसरों की बात करें तो भारत में इस समय करीब तीन करोड़ साठ लाख बेरोज़गार युवा है. कहने को भारत दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है लेकिन मानव विकास सूचकाँक में भारत का नंबर है 127. पिछले साल आई संयुक्त राष्ट्र की विकास रिपोर्ट में कहा गया था कि भारत में हो रहे विकास का फ़ायदा ग़रीबों तक नहीं पहुँच पा रहा है. राह किधर? तेल की आसमान छूती कीमतें और भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाला दूरगामी असर भी चिंता का विषय है. अनुमान के मुताबिक मौजूदा 25 लाख बैरल प्रति दिन तेल की खपत के मुकाबले, 2010 तक भारत को 31 लाख बैरल तेल प्रति दिन चाहिए होगा. भारतीय अर्थव्यवस्था में कुल आयात का 30 प्रतिशत हिस्सा तेल का होता है. चीन से तुलना करें तो विदेशी निवेश, आधारभूत ढाँचे और विकास दर- हर मायने में चीन भारत से आगे है. भारतीय अर्थव्यवस्था और उसकी दो विपरीत तस्वीरें. आख़िर क्या है वास्तविकता. आर्थिक मामलों के जानकार आलोक पुराणिक के अनुसार भारतीय अर्थव्यवस्था की मिश्रित तस्वीर उभर कर सामने आ रही है. उनका कहना है, "आने वाले सालों में भारतीय अर्थव्यवस्था का तीन स्तरों पर वर्गीकरण हो जाएगा, एक ओर होंगे सर्विसिज़ सेक्टर, विदेशी निवेश और सेंसेक्स जैसे पहलू जहाँ माहौल काफ़ी सकारात्मक है. दूसरी तरफ़ है मध्यम वर्ग की अर्थव्यवस्था जिमसें अपार संभनाएँ दिखाई पड़ती हैं लेकिन कई तरह की परेशानियाँ भी हैं और तीसरे स्तर पर है एक ऐसा वर्ग जिसका ऊपर के दो वर्गों से कोई लेना देना नहीं है, उनकी समस्याएँ शायद वैसी की वैसी रहने वाली हैं और शायद बढ़ने वाली हैं." औद्योगिक और सेवा क्षेत्र में विकास की बदौलत भारत में विकास की गाड़ी तेज़ी से दौड़ तो रही है लेकिन अभी भी उसके सामने कई तरह की चुनौतियाँ हैं. लिहाज़ा फ़र्राटे से दौड़ रहे विकास के घोड़े को अगर लंबे रेस का घोड़ा बनना है तो आधारभूत ढाँचे, सड़क, बिजली और पानी जैसी मूलभूत ज़रूरतों की सही खुराक सही समय पर इसे देते रहना होगा. |
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