|
आर्थिक संभावनाओं से पिघल रही है बर्फ़ | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश की भारत यात्रा के दौरान चर्चा का एक प्रमुख पहलू होगा आर्थिक क्षेत्र में दोनों देशों के बीच मौजूदा रिश्ते और व्यापार बढ़ाने की संभावनाएँ. अमरीकी राष्ट्रपति ने पिछले दिनों अमरीका में एशिया सोसाइटी को संबोधित करते हुए भारत की 30 करोड़ की मध्यम वर्ग की आबादी का ज़िक्र करने के साथ ही एक तरह से द्विपक्षीय आर्थिक सहयोग की संभावनाओं को भी रेखांकित कर दिया है. एक समय दोनों देशों के बीच रहे अविश्वास के माहौल की जगह अब झलकने लगी है सहयोग की आकाँक्षा. आर्थिक मामलों के जानकार आलोक पुराणिक मानते हैं, “परमाणु विस्फोटों के बाद भारत पर प्रतिबंध की बात करने वाला देश अब जो परमाणु सहयोग की बात कर रहा है उसके पीछे है बदली हुई आर्थिक स्थिति.” आलोक पुराणिक इसे ‘अर्थव्यवस्था के नेतृत्त्व वाली राजनीतिक कूटनीति’ का नाम देते हैं. बदली परिस्थितियाँ 1991 के बाद से बदले इन आर्थिक हालात में पहले बिल क्लिंटन और अब राष्ट्रपति बुश के प्रशासन ने भारत से नज़दीक़ियाँ बढ़ाने की कोशिश की है. बिल क्लिंटन के प्रशासन के समय बौद्धिक संपदा अधिकार के कई मसले आ रहे थे और विश्व व्यापार संगठन का सदस्य होने के नाते भारत से अपेक्षा हो रही थी कि वह आर्थिक क्षेत्र और उदार बनाए. पूर्व वाणिज्य सचिव तेजेंद्र खन्ना के अनुसार, “मुझे याद है उस समय बात होती थी कि भारत अपना बीमा क्षेत्र अंतरराष्ट्रीय कंपनियों के काम के लिए और खोले. अब वहाँ से आज तक तो काफ़ी प्रगति हो गई और हमने कई नए प्रावधान करते हुए बीमा क्षेत्र को भी खोल दिया. तो तब से अब हालात तो काफ़ी बदले हैं.” आउटसोर्सिंग भारत और अमरीका के बीच आर्थिक संबंधों का ज़िक्र होते ही एक विषय उठता है ‘आउटसोर्सिंग’ का.
राष्ट्रपति बुश जब दूसरे कार्यकाल के लिए चुनाव में खड़े हुए तो उस समय ‘आउटसोर्सिंग’ एक बड़े चुनावी मुद्दे के रूप में उभरा और अमरीका में ये कहते हुए इसका विरोध हुआ कि इसकी वजह से अमरीकी लोगों की नौकरियाँ जा रही हैं. मगर अब हालात बदले हैं और अमरीका में आउटसोर्सिंग को एक ज़रूरत के रूप में महसूस किया जाने लगा है. जॉर्जिया विश्वविद्यालय में एशिया कार्यक्रम के निदेशक और दक्षिण एशिया के मामलों में बुश प्रशासन के सलाहकार डॉक्टर अनुपम श्रीवास्तव बताते हैं कि ‘मैकेंज़ी’ के एक अध्ययन में इस पर ध्यान दिया गया और दूसरे लोगों ने भी बताया कि अमरीका जब एक डॉलर आउटसोर्स करता है तो एक डॉलर 47 सेंट वापस आता है. अनुपम श्रीवास्तव कहते हैं, “इस तरह की बहस के बाद ये महसूस किया गया कि अगर कंपनियों को प्रतियोगी रखना है तो आउटसोर्सिंग करना ही होगा. राष्ट्रपति बुश के दूसरे कार्यकाल में ये कोशिश हो रही है कि अगर अमरीकी कंपनियाँ भारत में काम बढ़ाएँ और भारतीय कंपनियाँ अमरीका में आकर काम करें तो नौकरी के मौक़े बढ़ेंगे, लागत कम होगी और प्रतियोगी क्षमता बढेगी.” 'चीन भी एक पहलू' भारत और अमरीका के बीच बढ़ते आर्थिक संबंधों में विभिन्न पहलुओं के साथ एक पहलू चीन के साथ भारत की बढ़ती नज़दीक़ी भी मानी जा रही है.
अमरीका को एक चिंता ये भी है कि भारत और चीन के संबंध इतने मज़बूत न हो जाएँ कि भारत पूरी तरह चीन के प्रभाव में न चला जाए. इस बीच इस यात्रा से भारतीय उद्योग जगत उम्मीद लगाए बैठा है कि सॉफ़्टवेयर क्षेत्र में और संभावनाएँ बनेंगी और उद्योग चाहेगा कि भारत-अमरीका सहयोग से किसी तीसरे देश में काम हो सके. आर्थिक विश्लेषक आलोक पुराणिक के अनुसार, “भारतीय उद्योग चाहेगा कि दूरसंचार और बिजली के क्षेत्र में अमरीका कुछ व्यापक निवेश करे.” वहीं डॉक्टर अनुपम श्रीवास्तव मानते हैं कि अमरीका के सर्वोच्च प्रतिनिधि के तौर पर राष्ट्रपति बुश एक विश्वास दिलाने की कोशिश करेंगे कि अमरीका भारत का एक भरोसेमंद सहयोगी है और इस संबंध को बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध भी है. दोनों ही देशों की प्रमुख कंपनियों के प्रमुख कार्यकारी अधिकारियों को साथ लेकर बने ‘सीईओ फ़ोरम’ के भी इस दौरान मिलने और प्रगति की समीक्षा करने की योजना है. यानी शीत युद्ध के समय दोनों ही देशों के ठंडे रिश्तों पर रही बर्फ़ अब आर्थिक संभावनाओं की गर्मी से पिघलती नज़र आती है. |
इससे जुड़ी ख़बरें 'परमाणु स्वायत्तता दाँव पर नहीं'27 फ़रवरी, 2006 | भारत और पड़ोस भारत यात्रा को लेकर आशावादी हैं बुश24 फ़रवरी, 2006 | पहला पन्ना 'भारत-अमरीका स्वाभाविक साझीदार'23 फ़रवरी, 2006 | पहला पन्ना वामदलों ने परमाणु समझौते की निंदा की21 जुलाई, 2005 | भारत और पड़ोस आतंकवाद के ख़िलाफ़ एकजुटता पर ज़ोर19 जुलाई, 2005 | पहला पन्ना परमाणु ऊर्जा पर भारत उत्साहित19 जुलाई, 2005 | पहला पन्ना भारत-अमरीका परमाणु समझौता19 जुलाई, 2005 | आपकी राय परमाणु क्षेत्र में पूरे सहयोग का भरोसा18 जुलाई, 2005 | पहला पन्ना | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||