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अमरीकी दबाव या सहयोग का स्वाभाविक असर | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत और अमरीका की बढ़ती नज़दीक़ियों के बीच पहले, राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन और अब संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार को विदेश नीति पर अमरीका के बढ़ते प्रभाव को लेकर आलोचना सहनी पड़ी है. पिछले दिनों अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी, आईएईए में ईरान के विरुद्ध मतदान करने के बाद मनमोहन सिंह सरकार पर आरोप लगे कि उसने अमरीका के साथ हुआ परमाणु समझौता बचाए रखने के दबाव में ऐसा रुख़ अपनाया. सरकार की सहयोगी कम्युनिस्ट पार्टियों ने ख़ासतौर पर उस फ़ैसले की आलोचना की. उसी दौरान भारत में अमरीकी राजदूत डेविड मलफ़र्ड ने बयान दिया था कि अगर भारत ने आईएईए की बैठक में ईरान के रुख़ का समर्थन किया तो परमाणु समझौते पर असर पड़ सकता है. मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता नीलोत्पल बसु उस बयान की आलोचना करते हुए उसे भारत की विदेश नीति पर अमरीका के बढ़ते प्रभाव का ही सूचक मानते हैं. प्रमुख विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी ने ईरान के मामले में भारतीय रुख़ का तो समर्थन किया मगर पार्टी प्रमुख राजनाथ सिंह सरकार की विदेश नीति को लचर बताते हैं. राजनाथ सिंह कहते हैं, “एनडीए सरकार के समय भारत और अमरीका के संबंध बराबरी के थे मगर यूपीए सरकार की लचर विदेश नीति की वजह से एक धारणा बन गई है कि भारत अब अमरीका के दबाव में काम कर रहा है.” 'महाशक्ति के साथ का असर' पाकिस्तान में भारत के पूर्व उच्चायुक्त जी पार्थसारथी भारतीय विदेश नीति पर अमरीका का प्रभाव बढ़ता हुआ तो मानते हैं मगर उनके अनुसार महाशक्ति के साथ का ये असर तो होगा ही. पार्थसारथी के अनुसार, “अमरीका की कोशिश है कि वह भारत की विदेश नीति पर असर डाले और शीत युद्ध के समय सोवियत संघ भी ऐसी कोशिश करता था. मगर इसका मतलब ये कतई नहीं होगा कि भारत ऐसे दबाव में आ जाए.” वह कहते हैं कि ईरान से संबंध बिल्कुल नहीं रखने की अमरीकी माँग तो नहीं मानी जा सकती मगर पाकिस्तान और चीन की मदद से अगर ईरान परमाणु हथियार हासिल कर लेता है तो वो भी भारत के राष्ट्रीय हित में नहीं होगा. वहीं अमरीका के जॉर्जिया विश्वविद्यालय में एशिया कार्यक्रम के निदेशक और दक्षिण एशिया के मामलों में बुश प्रशासन के सलाहकार डॉक्टर अनुपम श्रीवास्तव इस प्रभाव को सिर्फ़ नकारात्मक दृष्टिकोण से ही देखने के पक्षधर नहीं हैं. डॉक्टर श्रीवास्तव कहते हैं कि ये प्रभाव तो अभी और बढ़ेगा मगर ये ख़तरनाक नहीं है. उनके अनुसार, “दोनों देशों के बीच आदान-प्रदान बहुआयामी होता गया है और भारत की कूटनीति के लोग इतने सक्षम हैं कि वे अपने हितों की रक्षा कर सकें और उसे बेहतर ही बना सकें.” अमरीकी प्रभाव से जुड़े इन सभी तर्कों के बीच पूर्व विदेश मंत्री यशवन्त सिन्हा ईरान से जुड़े मामले में अमरीका के कथित दबाव को विदेश नीति के प्रावधानों के अनुरूप नहीं मानते. सिन्हा कहते हैं कि राष्ट्रपति बुश ख़ुद को भारत और पाकिस्तान दोनों का ही दोस्त मानते हैं ठीक वैसे ही भारत को भी ये अधिकार है कि वह अमरीका का भी दोस्त रहे और ईरान का भी. उनके अनुसार, “ये विदेश नीति में नहीं होता है कि कोई देश दूसरे से कहे कि तुम हमसे रिश्ता रखो और उससे से मत रखो.” बरक़रार है एक हिचक विश्लेषकों का मानना है कि इस क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए भारत को कूटनीतिक रूप से प्रभावी बनाना अमरीका अपने हित में मानता है, मगर अविश्वास का दौर इतना लंबा रहा है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता जैसे विषयों पर अभी एक हिचक बरक़रार है. डॉक्टर अनुपम श्रीवास्तव बताते हैं, “सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता के मसले पर अभी भारत के लिए अमरीका में राजनीतिक या कूटनीतिक स्तर पर समर्थन नहीं है. मगर ये भी कहा जा रहा है कि अगर भारत का विकास यूँ ही होता रहा तो उसे संयुक्त राष्ट्र के पुनर्गठन के दौरान महत्त्वपूर्ण जगह देनी ही होगी.” कुलमिलाकर कहें तो भारत और अमरीका के मज़बूत होते कूटनीतिक रिश्तों पर भारत के बाज़ार और मज़बूत होती साख का असर आगे भी दिखता रहेगा. |
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