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यात्रा पर परमाणु समझौते की छाया | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पिछले लगभग 60 वर्षों में भारत, अमरीकी राष्ट्रपतियों के दौरों का पड़ाव कम ही बना है और राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश इस दौरान भारत की यात्रा करने वाले सिर्फ़ पाँचवें अमरीकी राष्ट्रपति होंगे. इससे पहले डेविड आइज़नहावर, रिचर्ड निक्सन, जिमी कार्टर और बिल क्लिंटन बतौर राष्ट्रपति, भारत की यात्रा कर चुके हैं. वैसे राष्ट्रपति बुश की इस यात्रा के दौरान काफ़ी चर्चा हो रही है भारत और अमरीका के बीच परमाणु क्षेत्र में सहयोग की और इस क्षेत्र में क्लिंटन के मुक़ाबले बुश प्रशासन का झुकाव भारत की ओर कुछ ज़्यादा ही माना जा रहा है. रक्षा संबंधी मामलों के जानकार कॉमोडोर उदय भास्कर का इस बारे में कहना है, “क्लिंटन प्रशासन की भारत को व्यापक परमाणु निषेध संधि यानी सीटीबीटी के दायरे में लाने की कोशिश थी मगर बुश प्रशासन ने सीटीबीटी को ख़ारिज ही कर दिया और तनाव लाने वाला ये मसला द्विपक्षीय संबंधों से ग़ायब हो गया.” 'असैनिक' और 'सैनिक महत्त्व' के केंद्र जॉर्ज बुश के इस कार्यकाल में रिश्ते को और मज़बूती दी भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की पिछले साल हुई अमरीका यात्रा ने, जिसमें 18 जुलाई को दोनों देशों ने साझा घोषणा पत्र जारी किया. उस घोषणा पत्र में भारत को ‘आधुनिक परमाणु प्रौद्योगिकी संपन्न एक ज़िम्मेदार देश’ माना गया. उसी में बात हुई भारत को असैनिक इस्तेमाल के लिए परमाणु प्रौद्योगिकी देने की.
अब मामला अटका हुआ है कि आख़िर भारत के कौन से परमाणु केंद्र असैनिक हैं और कौन से सैनिक महत्त्व के हैं. अमरीका के साथ हुए उस सौदे के मुताबिक़ भारत को असैनिक परमाणु ठिकानों की सूची घोषित करनी है और उन परमाणु ठिकानों को अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों के लिए खोलना होगा. अमरीका से छपने वाली पत्रिका 'साइंस' के दक्षिण एशिया में वरिष्ठ संवाददाता पल्लव बागला का कहना है कि ये काम बहुत मुश्किल है. बागला कहते हैं, “भारत ने कभी परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर नहीं किए इसलिए उसे इसकी ज़रूरत भी नहीं पड़ी. अब जब दोनों कार्यक्रम अलग रखने की ज़रूरत नहीं थी तो ये एक दूसरे पर काफ़ी हद तक आधारित रहे हैं.” उनके अनुसार कम पैसे में प्रौद्योगिकी ख़ुद विकसित करके और इस तरह का कार्यक्रम बनाने में भारत को काफ़ी मेहनत लगी है, जिसे अलग-अलग करना आसान नहीं है. अमरीका में विरोध की असलियत अब भारत को परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में प्रस्तावित मदद देने के लिए अमरीका को अपने 1978 के परमाणु अप्रसार क़ानून में संशोधन करने होंगे क्योंकि उसके तहत परमाणु प्रौद्योगिकी के निर्यात को लेकर काफ़ी कड़े प्रावधान हैं और उनके रहते भारत को ये प्रौद्योगिकी नहीं दी जा सकती.
भारत को इस प्रस्तावित प्रौद्योगिकी को लेकर अमरीकी संसद में विरोध के स्वर कुछ मुखर रूप से उठे हैं. जॉर्जिया विश्वविद्यालय में एशिया कार्यक्रम के निदेशक और दक्षिण एशिया के मामलों में बुश प्रशासन के सलाहकार डॉक्टर अनुपम श्रीवास्तव बताते हैं कि विरोध करने वालों में से कई लोग ऐसे हैं जो परमाणु अप्रसार के उस अभियान के सदस्य रहे हैं जिसका अमरीका ने नेतृत्व किया था तो उनके सोचने का दायरा काफ़ी संकुचित है. डॉक्टर अनुपम श्रीवास्तव के अनुसार, “वे लोग आज भी यही बात कह रहे हैं कि भारत में प्रौद्योगिकी की सुरक्षा की स्थिति काफ़ी अच्छी रही है तो उसे ये प्रौद्योगिकी देने की क्या ज़रूरत है, मगर वे लोग ये नहीं समझ पा रहे हैं कि इसके बाद भारत के लगभग 80 प्रतिशत परमाणु केंद्र असैनिक होकर अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था में आ जाएँगे.” 'महत्त्वपूर्ण समझौता' माना जा रहा है कि अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य में भारत के बढ़ते प्रभाव, बढ़ते बाज़ार और उसकी साख को देखते हुए ही अमरीका भारत के साथ इस तरह के समझौते पर इतना ज़ोर दे रहा है. डॉक्टर अनुपम श्रीवास्तव भारत और अमरीका के बीच पिछले साल 18 जुलाई को हुए समझौते को काफ़ी महत्त्वपूर्ण मानते हैं. उनके अनुसार जब ये लागू हो जाएगा तो न केवल भारत अंतरराष्ट्रीय परमाणु गुट के अंदर आ जाएगा बल्कि अमरीका के लिए भी इसे परमाणु अप्रसार के क्षेत्र में बड़ी सफलता के रूप में देखा जाएगा. उनके अनुसार राष्ट्रपति बुश की यात्रा के अंतिम क्षणों में भारत और अमरीका के अधिकारियों के बीच जो बातचीत चल रही है वो कुछ बचे हुए मतभेदों को दूर करने की है जो अगर राष्ट्रपति बुश के आने से पहले नहीं हल हुए तो उनकी यात्रा पूरे होने के कुछ ही दिन के भीतर दूर कर लिए जाएँगे. |
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