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भारतीय शेयर बाज़ार का हाल | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पिछले कुछ सालों में भारतीय अर्थव्यवस्था में काफ़ी तेज़ी आई है. बढ़ती विकास दर के अलावा भारतीय अर्थव्यवस्था से जुड़े कई सकारात्मक पहलू सामने आए हैं. इन सकारात्मक पहलूओं में से एक अहम पहलू है- भारतीय शेयर बाज़ार में जारी मज़बूती का दौर. भारत के सबसे बड़े शेयर बाज़ारों में से एक बीएसई यानि मुंबई शेयर बाज़ार के सूचकांक ने वर्ष 2006 में सब रिकॉर्ड तोड़ते हुए 12 हज़ार की ऊँचाई छुई है. सिर्फ़ दो साल पहले की ही बात है कि मई 2004 में यूपीए सरकार के गठन के बाद बीएसई का सूचकांक औंधे मुँह गिरा. लेकिन उसके बाद बीएसई के सूचकांक ने कुछ ऐसी रफ़्तार पकड़ी कि ये आठ हज़ार, दस हज़ार और फिर 12 हज़ार तक पहुँच गया. छह फ़रवरी 2006 को 10 हज़ार छूने के बाद अगले ही महीने 21 मार्च को 11 हज़ार का आँकड़ा छू लिया और फिर 20 अप्रैल को 12 हज़ार के आँकड़े तक पहुँच गया. हालांकि हाल के दिनों में कई बार बीएसई के सूचकांक में गिरवाट ज़रूर आई है, 28 अप्रैल को तो सूचकांक 490 अंकों तक लुढ़क गया था लेकिन ग़ौर करने लायक बात ये है कि नुकसान की भरपाई करने में शेयर बाज़ार ने ज़रा भी देरी न की. शनिवार को कुछ देर के लिए कारोबार हुआ तो बीएसई के सूचकांक ने फिर 12000 को छू लिया. यहाँ सवाल उठते हैं कि मुंबई शेयर बाजा़र की मज़बूती के पीछे कारण क्या है, क्या ये मज़बूती लंबे समय तक बरकरार रह पाएगी और क्या तेज़ी का ये दौर भारतीय अर्थव्यवस्था की मज़बूती को भी दर्शाता है? विदेशी निवेश जहाँ तक वजह की बात है तो विशेषज्ञ भारतीय शेयर बाज़ार में तेज़ी के कई कारण देखते हैं- विदेशी संस्थागत और घरेलू निवेश, भारतीय बाज़ार में मिलने वाला बेहतर प्रतिफल, अनुकूल आर्थिक नीतियाँ, सरकारें बदलने के बावजूद इन नीतियों में निरंतरता और भारतीय अर्थव्यवस्था में तेज़ी भारतीय शेयर बाज़ार में तेज़ी के पीछे विदेशी संस्थागत निवेशकों का बहुत बड़ा हाथ है. आर्थिक मामलों के जानकार आलोक पुराणिक मानते हैं कि भारतीय शेयर बाज़ार में मिलने वाला प्रतिफल अन्य देशों के शेयर बाज़ारों में मिलने वाले प्रतिफल से कहीं ज़्यादा है और इसलिए विदेशी संस्थागत निवेशक भारत की ओर आकर्षित हो रहे हैं. एक अनुमान के मुताबिक वर्ष 2005 में विदेशी संस्थागत निवेशकों ने भारतीय शेयर बाज़ार में नौ अरब डॉलर से ज़्यादा का निवेश किया. मुंबई आधारित असित सी सेक्यूरिटी कंपनी की सहायक उपाध्यक्ष शर्मिला उनके अनुसार आर्थिक विकास की दौड़ में भले ही चीन आगे हो लेकिन अगर शेयर बाज़ारों की तुलना की जाए तो भारतीय बाज़ार चीन से आगे है. आर्थिक नीतियाँ
शेयर बाज़ार में तेज़ी की एक अन्य वजह है पिछले कुछ सालों में केंद्र में सरकारें बदलने के बावजूद आर्थिक नीतियों में निरंतरता. भारत में वर्ष 2004 में भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए गठबंधन की जगह भले ही कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने ले ली हो लेकिन आर्थिक नीतियों में कोई बड़ा बदलाव नहीं किया गया है. नीतियों में समानता रहने से निवेशकों का भी शेयर बाजा़र में भरोसा बना रहता है. असित सी सेक्यूरिटी कंपनी की सहायक उपाध्यक्ष शर्मिला जोशी कहती हैं कि राजनीतिक स्थिरता और नीतियों में बदलाव न होना शेयर बाज़ार के लिए बहुत ही अच्छी बात है. स्थानीय पहलूओं से बेअसर
शेयर बाज़ार के बारे में कहा जाता है कि ये सेंटिमेंट ड्रिवन होता है यानि देश में व्याप्त माहौल कैसा है इस पर बाज़ार का मूड काफ़ी निर्भर करता है. वर्ष 2004 में हुए आम चुनाव के बाद, सुधारों के विरोधी वामपंथी दलों के समर्थन से यूपीए सरकार के गठन का समाचार जैसे ही फैला, मुंबई शेयर बाज़ार के सूचकांक में ऐतिहासिक गिरावट दर्ज की गई. लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि भारतीय शेयर बाज़ार अब इतना परिपक्व हो गया है कि वो राजनीतिक या क्षेत्रीय घटनाओं से बेअसर हो गया. सूनामी जैसी बड़ी त्रासदी भी शेयर बाजा़र के हौसले न डिगा सकी. लेकिन क्या शेयर बाज़ार में ये मज़बूती भारतीय अर्थव्यवस्था की मज़बूती को भी दर्शाती है और इससे फ़ायदा किसे हुआ है? शेयर दलाल आलोक चूड़ीवाला का कहना है भारतीय शेयर बाज़ार में जो तेज़ी है वो भारतीय अर्थव्यवस्था की मज़बूती को भी बखूबी दर्शाती है क्योंकि हर क्षेत्र की कुछ न कुछ हिस्सेदारी तो शेयर बाज़ार में है. उनका कहना है कि सूचकांक एक प्रतिनिधि होता है तीस बड़ी कंपनियों का और जैसे जैसे उन कंपनियों में मुनाफ़ा बढ़ता है, इनमें खरीदारी होती है, कंपनी के शेयरों के भाव बढ़ते हैं और इसका प्रत्यक्ष रूप से फ़ायदा कंपनियों, कंपनियों में काम करने वाले कर्मचारियों,उद्योगपतियों और शेयरधारकों को पहुँचता है. भविष्य
यहाँ ये सवाल उठना वाजिब है कि भारतीय शेयर बाज़ार में जो मज़बूती देखी जा रही है, क्या ये दौर आगे भी जारी रहेगा. आलोक चूड़ीवाला को उम्मीद है कि आने वाले दिनों में सूचकांक और ऊपर जाएगा क्योंकि कोई बिकवाली नहीं करना चाहता और अच्छे शेयरों की कमी सी हो गई है, यही वजह है कि आने वाले दिनों में शेयरों के भाव तेज़ी से बढ़ेंगे. 1990 में भी भारतीय शेयर बाज़ार में तेज़ी का ज़बरदस्त दौर आया था लेकिन 1992 में हर्षद मेहता कांड के चलते निवेशकों का विश्वास डगमगा गया था. यहाँ शेयर बाज़ार पर नज़र रखने वाली संस्था भारतीय प्रतिभूति विनिमय बोर्ड 'सेबी' की भूमिका काफ़ी अहम हो जाती है. कुछ दिन पहले ही पब्लिक इश्यू घोटाले पर कार्रवाई करते हुए प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने 24 महत्वपूर्ण शेयर दलालों को शेयर बाज़ार में कार्रवाई में हिस्सा न लेने का आदेश दिया था. एक डर ये भी जताया जाता है कि विदेशी निवेशक अगर भारतीय बाज़ार से एक साथ पैसा निकाल लें तो क्या होगा. आलोक चूड़ीवाला कहते हैं कि विदेशी संस्थाएँ लंबे समय के लिए निवेश करती हैं, उनका निवेश करने का नज़रिया दूरदर्शी होता है. साथ ही उनका कहना है कि भारतीय शेयर बाज़ार में घरेलू निवेश की अभी काफ़ी संभावना है जिसे पूरी तरह टटोला नहीं गया है. शेयर बाज़ार से जुड़े ज़्यादातर लोग और विशेषज्ञ बाज़ार के रुख़ को लेकर सकारात्मक है. विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय शेयर बाज़ार में भले ही बीच-बीच में थोड़ी गिरावट या करेक्शन आए लेकिन अब ये पीछे मुड़कर नहीं देखेगा. विशेषज्ञ निवेशकों को सावधान रहने की सलाह ज़रूर देते हैं. ज़ाहिर है शेयर बाज़ार से प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से जुड़े लोगों की यही इच्छा रहेगी कि शेयर बाज़ार में तेज़ी का दौर चलता रहे और 1992 की तरह ये बुलबुला कहीं फूट न जाए. |
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