|
लहलहा रही है कर्ज़ की विषबेल | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
कभी महाराष्ट्र का पश्चिमी इलाक़ा विदर्भ कपास की खेती के लिए मशहूर था लेकिन पिछले कुछ सालों से इसकी चर्चा किसानों की आत्महत्या के कारण होती है. गैर सरकारी संगठनों का कहना है कि 2005 में जून से नवंबर तक विदर्भ इलाक़े में सौ से ज़्यादा किसानों ने हताशा में आत्महत्या कर ली है. ग़ैरसरकारी संगठन दावा करते हैं कि आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या पिछले दस सालों में 1100 से ज़्यादा पहुँच चुकी है. दूसरी ओर राज्य के कृषिमंत्री राणा जगजीत सिंह पाटिल से लेकर अधिकारियों तक कई लोगों से बीबीसी ने संपर्क किया लेकिन उनके पास किसानों की आत्महत्या का कोई आँकड़ा ही उपलब्ध नहीं था. तीन दशक पहले तक जिस कपास की खेती से यहाँ के किसानों की ज़िंदगी की तमाम ज़रूरतें पूरी होती थीं आज वही उनकी मौत की वजह बन रही है. यवतमाल ज़िले के कोसारा गाँव में ही पिछले एक महीने में ही तीन आत्महत्याएँ हो चुकी हैं. भारती नामदेव गावली के पति ने दीवाली से कुछ दिन पहले कीटनाशक दवा पीकर आत्महत्या कर ली थी. भारती के दो छोटे बच्चे और बूढ़े सास-ससुर हैं. भारती बताती हैं कि उनके ऊपर बैंक और साहूकार का लगभग एक लाख से ज़्यादा का कर्ज़ था और पति के गुज़रने के बाद उनके पास आमदनी का कोई साधन नहीं है. लेनदार हर रोज़ आकर दरवाजा खटखटा जाता है और ज़मीन बेच कर कर्ज़ अदायगी की सलाह दे जाता है. ये स्थिति अकेली भारती की नहीं है बल्कि आत्महत्या के लिए मजबूर सभी किसान परिवारों की है. जीएम बीज नब्बे के दशक की शुरुआत तक यहाँ के किसान पारंपरिक बीज से ही खेती करते थे. इस बीज से कोई ज़बरदस्त पैदावर नहीं होती थी लेकिन तब इस बीज की फ़सल के लिए किसान को अतिरिक्त उर्वरक या कीटनाशक की ज़रुरत नहीं पड़ती थी. वर्ष 1994 में बाज़ार में कथित रुप से ज़बरदस्त पैदावर की गारंटी देने वाला अनुवांशिक रुप से उन्नत बीज आया.
ये बीज महंगा था. इस बीज से अच्छी फ़सल लेने के लिए अधिक शक्तिशाली और महंगे खाद और कीटनाशकों की ज़रुरत होती थी. एक अध्ययन के मुताबिक़ आज से बीस साल पहले जहाँ पारंपरिक बीज के साथ कपास की खेती पर प्रति एकड़ एक हज़ार रुपए की लागत आती थी वहीं इस समय ये लागत बढ़कर आठ हज़ार रुपए प्रति एकड़ हो गई है. जबकि कपास की ख़रीद की न्यूनतम दर खेती की लागत की तुलना में ना के बराबर बढ़ी है. पिछले दस वर्षों मे कपास की कीमत में 1600 रुपए प्रति क्विंटल की तुलना में 2160 रुपए प्रति क्विंटल कि मामूली वृद्धि हुई है. फिर एक दिक्कत ये भी है कि अक्सर जो बीज उपलब्ध होता है उसकी कोई गारंटी नहीं होती कि वो असली है या नहीं. किसान कहते हैं कि इस साल की अधिकतर फ़सल नकली बीज बोने के कारण बरबाद हो गई. दरों का असंतुलन विदर्भ जनआंदोलन समिति के अध्यक्ष किशोर तिवारी का कहना है कि महाराष्ट्र राज्य सरकार की एकाधिकार योजना के तहत कपास की प्रति क्विंटल क़ीमत और केंद्र सरकार की न्यूनतम दर मे पाँच सौ रुपए का अंतर है और राज्य सरकार का कहना है कि वो केंद्र की दर पर ही किसानों से कपास ख़रीदना चाहेगी.
शुरू में खेती के घाटों को पूरा करने के लिए किसानों ने सरकारी बैंक से ऋण लिया. समय पर ऋण न लौटा पाने वाले किसानों को बैंकों ने अगली खेती के लिए फिर से कर्ज़ देने से इंकार कर दिया. किसानों के पास इस स्थिति में स्थानीय साहूकारों को पास जाने के अलावा दूसरा कोई उपाय नहीं था. स्थानीय साहूकारों ने किसानों को ऋण तो दिए लेकिन बेहद ऊँची दरों पर. बाज़ार में ऋण की ये दर 150 प्रतिशत तक होती है. किसानों ने कपास की इस आत्मघाती फ़सल की जगह सोयाबीन की खेती की लेकिन आर्थिक दृष्टि से नतीजा कुछ अलग नहीं निकला. विधेयक का आश्वासन किशोर तिवारी के अनुसार, "स्थिति बहुत ही भयानक है और अगर आत्महत्या के इस सिलसिले को रोकना है तो सरकार को इस स्थिति को राष्ट्रीय आपदा घोषित कर देनी चाहिए." वे कहते हैं, "सरकार को कपास का समर्थन मूल्य तीन हज़ार रुपए प्रति क्विंटल तय कर देना चाहिए और नफ़ाख़ोरों के बजाय सरकार किसानों को अपने बैंकों से ऋण दे." वे बिचौलियों के ख़िलाफ़ भी सख़्ती की मांग करते हैं. इस संदर्भ में टिप्पणी के लिए राज्य के गृहमंत्री आर आर पाटील बहुत कोशिशों के बाद भी उपलब्ध नहीं हो सके हालाँकि चंद दिनों पहले नागपुर में एक रैली को संबोधित करते हुए उन्होंने स्वीकार किया है कि क़र्ज़ के नाम पर किसानों का शोषण होता आ रहा है. उन्होंने कहा कि ज़िला पुलिस अधीक्षकों को ऐसे साहूकारों के ख़िलाफ़ सख़्ती से कार्रवाई के आदेश दिए जाएँगे. उन्होंने कहा कि दिसंबर में एक अधिवेशन में विधेयक लाया जाएगा जिसमें किसानों को सस्ती ब्याज़ दरों पर क़र्ज़ मुहैया कराने का प्रावधान होगा. ग्रामीण विकास मंत्री रघुवंश प्रसाद ने बीबीसी से कहा है कि वो राज्य सरकार से इस स्थिति की जाँच पड़ताल के लिए कहेंगे. उनके अनुसार सरकार के न्यूनतम साझा कार्यक्रम के तहत इस बात का प्रावधान है कि किसानों को बैंकों से आसानी से सस्ती ब्याज़ दर पर ऋण उपलब्ध कराया जाए जिससे किसानों को महाजनों से महंगी दर पर ऋण न लेना पड़े. लेकिन ऐसा क्यों नहीं हो रहा है इस बात की पूरी तहकीकात होनी चाहिए. एक बात तो तय है कि भूमंडलीकरण के इस दौर में भारतीय किसान फ़िलहाल खुले बाज़ार की प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार नहीं हैं और आत्महत्या जैसा घातक क़दम उठा रहे हैं. और सरकार अब भी विधेयक लाने की तैयारियों में जुटी हुई है, किसानों की ओर मानों पीठ किए हुए. | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
| |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||