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किसानों को भा रही है हर्बल खेती | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
आजकल लोग रासायनिक सौंदर्य प्रसाधनों और रासायनिक दवाइयों की जगह हर्बल सौंदर्य प्रसाधनों और हर्बल औषधि के इस्तेमाल को प्राथमिकता दे रहे हैं. हर्बल उत्पादों की इस माँग का ही असर है कि मध्यप्रदेश के सैकड़ों किसानों ने औषधीय पौधों और सुगंधित पौधों की खेती बड़े पैमाने पर करनी शुरू कर दी है. पूरे प्रदेश में लगभग 25 तरह के औषधीय पौधों तथा सुगंधित पौधों की खेती दो हज़ार एकड़ क्षेत्र में हो रही है. मध्यप्रदेश उद्यमिता विकास संस्थान के संकाय सदस्य डॉ. गुरूपाल सिंह जरयाल का दावा है कि भारत में मध्यप्रदेश पहला राज्य है जहाँ सबसे ज़्यादा औषधीय और सुगंधित पौधों की खेती हो रही है. यह पहली बार है कि हैदराबाद और बंगलोर की कंपनियों ने एक हज़ार टन जड़ी बूटियों की पुनर्ख़रीद(बाइबैक) के सौदे किए हैं. उद्यमिता संस्थान किसानों को प्रशिक्षण देने का काम करता है. जड़ी-बूटियाँ जरयाल बताते हैं कि पूरे प्रदेश में एक हज़ार एकड़ क्षेत्र में पत्थरचट्टा (कोलियस) की खेती हो रही है.
आयुर्वेदिक, यूनानी और होम्योपैथिक चिकित्सा पद्धति में दिल की बीमारी में कोलियस पौधे की जड़ से दवाई बनती है जिससे कोलस्ट्रॉल कम होता है. इसलिए कोलियस की भारी माँग है. सफ़ेद मुसली से ऐसी दवाई बनती है जिससे प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है. लेमनग्रास के तेल का उपयोग नींबू की खुशबू वाले साबुन आदि में होता है. श्यामा तुलसी से हर्बल चाय, डिओरडेंट यानी बदन की दुर्गंध दूर करने वाले पदार्थ और चमड़ा उद्योग में बदबू दूर करने में इस्तेमाल होता है. जामारोजा से गुलाब जैसी खुशबु आती है. इसके तेल का हर्बल इत्र बनाने में उपयोग होता है. इनकी लम्बी सूची है और इनमें से कई की इन दिनों जमकर खेती हो रही है. किसान को लाभ भोपाल के पास मिसरोद गाँव के किसान राधेश्याम पाटीदार ने कहा, "छह साल पहले तक मैं परंपरागत गेहूँ की खेती करता था. छह हज़ार रूपए प्रति एकड़ की आमदनी होती थी. अब 60 एकड़ में हर्बल खेती कर रहा हूँ. आमदनी पाँच गुना बढ़ गई है. मेरे खेतों में कोलियस, स्टीबिया (जिससे शुगर-फ्री गोली बनती है), सफ़ेद मुसली, सर्वगंधा, अश्वगंधा, श्यामा तुलसी, देसी गुलाब तथा आँवला की खेती हो रही है." वो बताते हैं, "खेती के लिए जैविक खाद और जैविक कीटनाशक मैं ख़ुद बनाता हूँ." राधेश्याम पाटीदार के किसान पुत्र अवध पाटीदार ने बताया कि वो दिसंबर में दुबई में हुए हर्बल मेले में शामिल हुए थे. अवध बताते हैं, "मैंने दुबई में पाया कि देसी गुलाब से बने गुलाबजल, इत्र, स्प्रे, गुलाब फ़ेसपैक की दुबई में भारी माँग है तथा दुबई से खाड़ी के दूसरे देशों में भी निर्यात होता है. इसलिए भोपाल लौटते ही मैंने देसी गुलाब की खेती शुरू कर दी." प्रदेश के हरदा के किसान संजय सिंह कुशवाह ने बताया कि वह 35 एकड़ खेत में लेमनग्रास, पामारोजा, सिंट्रोलैपा तथा खस जैसे सुगंधित पौधों की खेती करते हैं और उनका आसवन (डिस्टीलेशन) करते हैं. संजय अब तक सात सौ किलोग्राम सुगंधित तेल इत्र बनाने वाली कंपनियों को बेच चुके हैं. बड़वानी ज़िले के अंजड़ गाँव के किसान राजीव सोढ़ी ने कहा कि उन्होंने सीमांत किसानों को इकट्ठा किया और मिलकर 130 एकड़ में औषधीय पौधों की खेती की है. हर्बल व्यापार भोपाल के तेजस्विनी हर्बल्स एंड हर्बल प्रोडक्शन के मालिक राजेश तिवारी बताते हैं कि उन्होंने किसानों और लघु वन विभाग से खरीद कर 80 प्रकार की जड़ी-बूटियाँ बेचने का काम छह महीने पहले शुरू किया.
राजेश बताते हैं, "सबसे ज़्यादा माँग कोलियस, सफ़ेद मुसली, आम्बा हल्दी, लाल चंदन, मुलेठी, सर्वगंधा, नीम, जामुन गुठली, सोठ, ब्राम्ही और शंख पुष्पी की है. इनके लिए बड़ी संख्या में ग्राहक आ रहे हैं." इस बाबात जरियाल बताते हैं कि प्रदेश में किसान अब तक 70 आसवन संयंत्र लगा चुके हैं. उन्होंने बताया कि जर्मनी को सफ़ेद मुसली, सर्वगंधा निर्यात होता है. अमरीका में सफ़ेद मुसली की माँग है. लेकिन सुगंधित तेल और जड़ी-बुटियों की माँग तो पूरे विश्व में है. | इससे जुड़ी ख़बरें सस्ती दवाएं नहीं बन सकेंगी23 मार्च, 2005 | भारत और पड़ोस परेशान हैं कश्मीर के केसर उत्पादक20 जनवरी, 2005 | भारत और पड़ोस भारत के खेतों में चीनी उपकरण24 नवंबर, 2004 | भारत और पड़ोस कीटनाशक की जगह पेप्सी-कोक01 नवंबर, 2004 | भारत और पड़ोस स्वास्थ्य पर क्या असर? | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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