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सस्ती दवाएं नहीं बन सकेंगी | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
विश्व व्यापार संगठन यानी डब्लूटीओ के प्रति प्रतिबद्धता में भारत ने पेटेंट विधेयक को पारित कर दिया है लेकिन इसने भारत के दवा उद्योग और दवा ख़रीदने वाले ग़रीब लोगों को चिंता में डाल रखा है. लोकसभा ने मंगलवार को जिस पेटेंट विधेयक को पारित किया है उसमें प्रावधान है कि भारतीय दवा कंपनियाँ उन दवाओं का सस्ता जेनेरिक संस्करण तैयार नहीं कर पाएँगी जिनका पेटेंट है. स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम कर रही संस्थाओं का कहना है कि इस नियम के लागू होने से लाखों लोगों के लिए दवा ख़रीदना आसान नहीं रह जाएगा क्योंकि दवाएँ भारी महँगी हो जाएँगी. इसमें कई जीवनरक्षक दवाएँ शामिल हैं. उल्लेखनीय है कि भारत एड्स जैसी जानलेवा बीमारियों के लिए सस्ती जेनेरिक दवाएँ बनाता है जो कई देशों में निर्यात भी की जाती हैं. पेटेंट डब्लूटीओ में जिन विषयों पर सदस्य देशों में मतभेद थे पेटेंट उनमें से प्रमुख था. और भारत उन देशों में सबसे आगे था जो पेटेंट के मामले पर विरोध जता रहा था लेकिन आख़िर वह मान गया. डब्लूटीओ के नियमों के तहत सदस्य देशों को अपने देशों में क़ानून बनाकर किसी भी अविष्कारक के उत्पाद को बीस साल तक संरक्षण देना होगा यानी यह सुनिश्चित करना होगा कि उस उत्पाद की कोई नकल न हो सके. यह नियम दवाओं पर भी लागू होता है. भारत में पेटेंट को लेकर चिंता इसलिए भी थी क्योंकि भारत दवाओं के सबसे बड़े उत्पादकों में से एक है. भारत में दवा 225 अरब रुपयों का उद्योग है. भारत में बनने वाले जेनेरिक दवाओं के सस्ते संस्करण कई देशों के लिए संबल रहे हैं और इस विधेयक से उन सभी देशों के लिए एक नई समस्या शुरु हो जाएगी. हालांकि डब्लूटीओ के बाद से भारत में कई दवाओं को स्थानीय रुप से विकसित का सिलसिला शुरु हुआ है. हालांकि डब्लूटीओ ने प्रावधान किया है कि कुछ देशों को दवाओं के मामले में कुछ छूट दी जाए लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि यह पर्याप्त नहीं है. |
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