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एड्स निरोधक टीके का मनुष्यों पर प्रयोग | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत में एचआईवी-एड्स निरोधक टीकों का पहली बार स्वस्थ व्यक्तियों पर प्रयोग किया जा रहा है. समाचार एजेंसियों के अनुसार पुणे के राष्ट्रीय एड्स अनुसंधान संस्थान में 18 से 45 वर्ष की उम्र के 30 स्वस्थ व्यक्तियों पर पहले चरण का परीक्षण किया जा रहा है. केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री अंबुमणि रामादौस ने विज्ञान और तकनीक मंत्री कपिल सिब्बल ने दिल्ली में एक संवाददाता सम्मेलन के दौरान ये जानकारी दी है. उन्होंने कहा कि एड्स निरोधक टीके का आविष्कार आज के समय की सबसे बड़ी चुनौती है. ये परीक्षण भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद यानि आईसीएमआर और इंटरनैशनल एड्स वैक्सीन कार्यक्रम तथा अमरीकी कंपनी टारगेटड जैनेटिक्स कॉर्पोरेशन के संयुक्त प्रयासों के तहत किये जा रहे हैं. आईसीएमआर के महानिदेशक एनके गांगुली का कहना था कि 'एदेनो एसोसियेटड वैक्टर बौर्न' नाम के इस टीके के जिन लोगों पर परीक्षण किये जाने हैं उन्हें ख़तरों से आगाह कर दिया गया है. उनकी सेहत की बराबर जांच की जा रही है और उन्हें मानसिक रूप से तैयार भी किया गया है. जहाँ पहले चरण में परीक्षण 15 महीने तक चलेगा वहीं दूसरे और तीसरे चरण के परीक्षण आठ और दस साल तक के समय में किए जाएँगे. इंटरनैशनल एड्स वैक्सीन कार्यक्रम के प्रतिनिधि मार्क चौट्वे का कहना है कि जिन लोगों पर परीक्षण होगा उन्हें एड्स होने ख़तरा नहीं है क्योंकि एचआईवी वायरस के कुछ कण ही उनके शरीर में जाएँगे. गांगुली ने बताया कि ये परीक्षण एड्स वायरस के भारत में सबसे ज़्यादा फैले स्ट्रेन सी-टाइप को ध्यान में रख कर किए जा रहे हैं. भारत में एड्स के 90 फीसदी मामलों में यही स्ट्रेन सी-टाइप देखा गया है. एपी समाचार एजेंसी के अनुसार एड्स एचआईवी वायरस के सबसे ज्यादा मामले दक्षिण अफ्रीका में और उसके बाद दूसरे नंबर पर भारत में मिलते हैं, जहां इस वायरस से पीड़ित लोगों की संख्या 50 लाख से भी ज़्यादा है. इसी तरह के परीक्षण जर्मनी और बेल्जियम में पहले ही चल रहे हैं और आरंभिक नतीजों के अनुसार ये परीक्षण एड्स वायरस से बचाव की दृष्टि से काफ़ी कारगर माने जा रहे हैं. |
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