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'पूरे नहीं हो पाएँगे एड्स के लक्ष्य' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अंतरराष्ट्रीय द्विवार्षिक एड्स सम्मेलन की बैंकॉक में जारी तैयारियों के बीच सम्मेलन के एक अधिकारी ने बीबीसी को बताया है कि विकासशील देशों में एड्स से निपटने के लिए जो लक्ष्य तय किए गए थे वो पूरे नहीं हो पाएँगे. एड्स से युद्धस्तर पर निपटने के लिए कई संस्थाओं ने मिलकर वर्ष 2001 में काम शुरू किया था. इस शुरुआत को नाम दिया गया, “थ्री बाय फ़ाइव इनिशिएटिव”. इसी का नतीजा था कि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने पिछले साल “विश्व एड्स दिवस” के मौके पर औपचारिक रूप से तय किया कि वर्ष 2005 तक विकासशील देशों के 30 लाख लोगों को दवा बाँटी जाएगी. मगर अब एड्स सम्मेलन के सह सभापति जोप लैंग कह रहे हैं कि ऐसा नहीं हो पाएगा. विशेषज्ञ कहते हैं कि जिस समय ये लक्ष्य तय किया गया था तभी ये साफ़ था कि ये बहुत ही ऊँचा है और ज़मीन पर काम जब शुरू होगा तो ये और साफ़ हो जाएगा. संयुक्त राष्ट्र की संस्था यूएनएड्स भी कह रही है कि वो तय लक्ष्य से पीछे चल रही है. सम्मेलन के ठीक पहले ये बात कहकर सह सभापति प्रोफ़ेसर जोप लैंग ने एक नई बहस छेड़ दी है. ये मुद्दा सीधे सीधे इस बात से जुड़ा है कि एड्स से निपटने के लिए जितने पैसे की ज़रूरत है वो अंतरराष्ट्रीय समुदाय के कई वादों के बावजूद नहीं मिला है. कहा ये गया था कि दुनिया में एड्स, टीबी और मलेरिया से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय दान के ज़रिए पैसे इकट्ठे करेगा लेकिन ये हो नहीं सका है. प्रोफ़ेसर जोप लैंग ने दुनिया में एड्स के ख़िलाफ़ लड़ाई में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है और उनकी बात को हल्के से नहीं लिया जा सकता. नज़रें अब विश्व स्वास्थ्य संगठन की ओर भी लगी हैं जो रविवार को होने वाले सम्मेलन से पहले एड्स कार्यक्रमों के बारे में औपचारिक जानकारी देने वाला है. |
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