| एचआईवी से लड़ने वाले जीन की खोज | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
वैज्ञानिकों ने उस प्रमुख जीन का पता लगा लिया है जिससे शरीर को एचआईवी संक्रमण से प्रतिरोध करने की क्षमता हासिल होती है. इस खोज से यह समझने में भी मदद मिलेगी कि क्यों एचआईवी संक्रमित कुछ लोगों में एड्स रोग के लक्षण वर्षों तक सामने नहीं आते जबकि कुछ लोग जल्दी ही एड्स की चपेट में आ जाते हैं. शोधकर्ताओं को उम्मीद है कि यह खोज एचआईवी संक्रमण को दूर करने वाले टीके के विकास में भी सहायक होगी. इस विषय पर ऑक्सफ़ोर्ड, क्वाज़ूलू-नटाल और हॉवर्ड विश्नविद्यालयों ने संयुक्त रूप से अध्ययन किया, जिसे नेचर पत्रिका ने प्रकाशित किया है. होड़ वैज्ञानिकों का मानना है कि एचआईवी संक्रमण और शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता के बीच जैसे होड़ सी चल रही है. एचआईवी वायरस बहुत तेज़ी से बढ़ कर शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को पीछे छोड़ने में लगा है. तो दूसरी ओर शरीर की प्रतिरोधक क्षमता का भी विकास हो रहा है और कम प्रभावशाली आनुवंशिक परिवर्तन ख़त्म हो रहे हैं और उन परिवर्तनों का प्रभाव बढ़ रहा है तो संक्रमण के ख़िलाफ ज़्यादा असरदार हैं. सामान्य तौर पर इस प्रक्रिया में हज़ारों वर्षों का समय लगता है, लेकिन ताज़ा अध्ययन से पता चला है कि एचआईवी संक्रमण के मामले में यह प्रक्रिया बहुत तेज़ी से होती है. एचआईवी संक्रमण की स्थिति में शरीर की प्रतिरोधक क्षमता की प्रतिक्रिया से न केवल एचआईवी वायरस में तेज़ी से परिवर्तन हो रहे है, बल्कि एचआईवी संक्रमण के कारण मानव शरीर भी उसी तेज़ी से इस लड़ाई के लिए अपने को बदल रहा हैं. खोज शोधकर्ताओं ने अपना अध्ययन ह्यूमन ल्यूकोसाइट ऐंटीजेंन (एचएलए) नामक अणु पर केंद्रित रखा, जो शरीर की रोग प्रतिरोधक प्रणाली को यह बताता है कि कौन सी कोशिकाएँ एचआईवी से संक्रमित हैं और उन्हें नष्ट किया जाना है. इस विशेष तरह के मॉलिक्यूल एचएलए की तीन किस्में होती हैं, लेकिन कुछ समय से यह स्पष्ट हो गया है कि ‘बी’ किस्म के जीन ‘ए’ या ‘सी’ किस्म के जीन की तुलना में काफी तेज़ी से बढ़ते है. अध्ययन के दौरान यह पाया गया कि ‘बी’ किस्म के जीन ही एचआईवी से संक्रमित कोशिकाओं को ढ़ूँढ़ कर उन्हें समाप्त करने का काम कर पाते हैं. इसलिए एचआईवी संक्रमित जिन महिलाओं में यह जीन पाया गया उनके जीवित रहने की ज़्यादा संभावना रही और उनके बच्चों के भी वायरस से संक्रमित होने की संभावना काफ़ी कम थी. शोधकर्ताओं ने यह आंकड़े दक्षिण अफ़्रीका में डरबन के एक प्रसव-पूर्व उपचारगृह में आने वाली एचआईवी संक्रमित महिलाओं से एकत्र किए. अध्ययन के प्रमुख वैज्ञानिक डॉक्टर फ़िलिप गोउल्डर का कहना है, "हमें कुछ समय से पता था कि एचएलए-बी किस्म के मॉलिक्यूल दूसरी अन्य किस्मों की तुलना में तेज़ी से बढ़ रहें है, लेकिन ऐसा क्यों हो रहा है इसका पता नहीं चल पा रहा था." उन्होंने बताया कि इन आंकड़ों से अब यह साफ हो गया है कि न केवल एचआईवी संक्रमण बल्कि अन्य रोगों के संक्रमण के दौरान भी एचएलए-बी किस्म के मॉलिक्यूल क्यों तेज़ी से विकसित होते हैं. टेरेस हिग्गिन्स ट्रस्ट की वरिष्ठ विशेषज्ञ जो रॉबिंसन ने इस अध्ययन का स्वागत किया है. लेकिन उनका कहना है, "हमें यह जान लेना चाहिए कि हम अभी एचआईवी संक्रमण के लिए टीका बनाने से कई वर्ष दूर हैं और एचआईवी से संक्रमित व्यक्तियों को उनके स्वास्थ और उपचार में इस तरह के अध्ययन से लाभ उठाने में अभी लंबा वक्त लगेगा." |
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